भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-५०. 251 मर्मोपमर्मवेधाश्च वंशोपवंशकानि च। सन्धिरेखाषट्कशूलं लाङ्गलं पञ्चकादिकम् ॥ 8 ॥ समुद्रोपकण्ठ प्रदेश, महाशैल, आश्रमादि भूमिभाग अनेक प्रकार के हैं जिनकी परीक्षा हेतु सूत्रकर्म के ग्रन्थ-विषय है। इसी प्रकार मर्म और उपमर्म, वेध जानने के ग्रन्थ, वंश एवं उपवंश जानने के ग्रन्थ-विषय, सन्धि, रेखादि षट्कशूल (छह प्रकार के शूल), लाङ्गल या हलकादि यन्त्रों का ज्ञान और पञ्चकादि जानने के साधन तन्त्र मूलक ग्रन्थ-विषय हैं। षण्मर्मवेधा विज्ञेया वास्तुदेहसमुद्भवाः । निघण्टुं देवतानां च जानीयात् सूत्रकर्मणि ॥ 9 ॥ वास्तुदेह भवनादि में होने वाले छह मर्मवेध वास्तुशास्त्रों में बताए गए हैं तथा वास्तुपदीय देवताओं के बारे में जानने के लिए निघण्टु (शब्दकोष) बने हैं जिनकी जानकारी सूत्रकर्म करने वाले सूत्रधार को होनी ही चाहिए। नगरग्रामखेटाद्यं वास्तुवेदसमुद्भवम्। कूटखर्वटकूप्यादि ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 10 ॥ सूत्रधार को इन वास्तुवेद से निर्मित नगर, खेट, ग्राम, कूट, खर्वट, कूपादि की भी पूरी जानकारी होनी चाहिए। पुर-प्राकार-परिखा-प्रतोली-मार्ग-गोपुरम्। गृहं च राजवेश्माद्यं ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 11 ॥ पुर, प्राकार (नगरकोट), परिक्खा (नगर कोट के बाहर की खाई), प्रतोली (नगर की पोल), राजमार्ग, गोपुर (दरवाजे), गृह, भवन, राजप्रासाद (राजमहल) को भी जानकारी सूत्रधार के लिए आवश्यक होती है ॥ 11 ॥ प्रासादप्रतिमालिङ्गजगतीपीठमण्डपम् । वेदीकुण्डं स्रुचा चैव ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 12 ॥ सूत्रकर्मी या सूत्रधार को प्रासाद, मन्दिर आदि, प्रतिमा, लिङ्ग, जगती, पीठ, मण्डप, वेदी, कुण्ड, स्रुचा (हवनार्थ स्रुवा) आदि का भी पूरा ज्ञान होना चाहिए। प्रासादा विविधाकारा वैराज्यकुलसम्भवाः । विभक्त्यूर्ध्वतलच्छन्दं ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 13 ॥ रेखानां विविधाकारा प्रासादशिखरोत्तमाः । घण्टाकलशध्वजाद्यं ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 14 ॥ मन्दिर, प्रासाद विविध आकारों के होते है, जो वैराज्यादि जाति कुलों में वर्णित