अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें250 अपराजितपृच्छा सूत्रधार महाप्राज्ञ होना चाहिए। वह निरन्तर षट्कर्म में संलग्न रहकर नित्य आत्मतत्त्व को अपने हृदय मन्दिर में अमरसत्त्व के रूप में दर्शन करता रहे। माधुर्यवांस्तथालापे वास्तुविद्यादिकौशलः। ज्ञानचक्षुः सुहृदयः प्रारम्भादिरुजापहः ॥ ३ ॥ उसका वार्तालाप माधुर्यतायुक्त हो, वह वास्तुविद्यादि शास्त्रकर्म में कुशल हो, उसमें ज्ञानचक्षु की अन्तःचेतना दृष्टि की सूझ-बूझ हो, वह सरल हृदय हो और प्रारम्भ से ही निरोगी स्वस्थ देह वाला हो। हस्तलाघवसम्पन्नो घाट्यचित्रादिकौशलः। चक्षुः प्रत्यक्षकृच्चैव ह्यदृष्टं ज्योतिषो यथा ॥ ४ ॥ सूत्रधार में अपनी हस्तकला में अनन्य कुशलता ऐसी हो कि वह अपने हाथ से घड़ी गई मूर्ति अथवा चित्रकला से ऐसा प्रभाव उत्पन्न कर दें कि उन्हें देखने वाला - मानो उन वस्तुओं को नहीं वरन उनमें प्रतिबिम्बित रूपों को साकार प्रत्यक्ष देख रहा हो, जिसका प्रकाश उसके हृदय में भी ज्योतिस्वरूप में प्रकट हो रहा है। ग्रन्थार्थगुणसंयुक्तो वास्तुमर्मादिबोधकः। आत्ममत्युद्भवं रूपं ससूत्रं स च कर्मणा ॥ ५ ॥ सूत्रधार की प्रमुख विशेषता यह होनी चाहिए कि वह शिल्प-वास्तुग्रन्थों के ठीक-ठीक अर्थ को समझने के गुण से सम्पन्न हो तथा वास्तु में जो भी मर्म-दोष होते है, उनको बता सकने में समर्थ हो, इस तरह से वह अपने आत्मोद्भव ज्ञान को स्वरूप देकर उसे अपनी कार्य कुशलता से ससूत्र, सटीक सिद्ध कर सके। सूत्रधारोपयोगार्थं¹ वास्तुशास्त्रादिबोधनम्। भुवनकोशविज्ञानं प्रमाणं सूत्रकर्मणि ॥ ६ ॥ वास्तुशास्त्रादि को समझने व समझाने के लिए सूत्रधारों के उपयोगार्थ अनेकों ग्रन्थ-विषय हैं यथा— भुवनकोश विज्ञान, प्रमाणसूत्रकर्मणि ² समुद्रोपकण्ठदेशमहाशैलाश्रमादिकम्। भूमिभागैरनेकैश्र्च परीक्षा सूत्रकर्मणाम् ॥ ७ ॥
- 'सूत्रधारोपचारार्थ ?' इति प्रकाशित पाठः।
- इस श्लोक से ग्रन्थकार वास्तु के जिन ग्रन्थों के विषयों, नामों का उल्लेख करता है, ऐसा लगता है कि वह समराङ्गणसूत्रधार की ओर सङ्केत कर रहा है क्योंकि वास्तुशास्त्रबोधन के बाद भुवनकोश, सूत्रकर्म के प्रमाणादि विषयों से ही समराङ्गणसूत्रधार का आरम्भ होता है। आगे के विषय भी समराङ्गणसूत्रधार के अनुसार ही है। वैसे भी अपराजितपृच्छा पर समरांगणसूत्रधार का पर्याप्त प्रभाव विद्यमान है।