अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 296, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५० 249 बुद्धिकामी भवेन्नित्यं सर्वत्रैवापराजित। व्यवहारे निर्मला ये ते भृत्या वसुधाधिपाः ॥ १८ ॥ हे अपराजित ! सर्वत्र जो व्यक्ति बुद्धि का सदा प्रयोग करता रहे और अपना व्यवहार निर्मल रखे, वे ही अपने सेवक और वसुधा के स्वामी कहे जा सकते हैं। अर्थेन वर्धते चार्थ सन्मानैर्वन्दिता भया ? । व्यवहारे वर्धते लोकश्चतुरङ्गः प्रियागमः ॥ १९ ॥ यह तो एक ध्रुव सत्य है कि अर्थ से ही अर्थ की वृद्धि होती है और सम्मान से और वन्दन से निर्भयता बढ़ती है। इसी तरह सद्व्यवहार से परस्पर प्रेम और निर्मलता बढ़ती है और लोक के चारों अङ्ग— धर्म, अर्थ, काम, मोक्षादि तथा प्रियजनों का आगमन बना रहता है। तेषां सुसिद्ध्यति सर्वमसाध्यं साध्यं नित्यशः। दानसन्मानमात्रेण देवोऽपि च सन्मानयेत् ॥ २० ॥ ऐसे ही मनुष्यों के सब साध्य और असाध्य काम नित्य साध्य होते रहते हैं क्योंकि दान और सम्मान मात्र ही देवताओं का भी सम्मान हो जाता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां सूत्रधारपरीक्षाधिकारो नामैकोनपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ४९ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सूत्रधार परीक्षा अधिकार नामक उनचासवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ४९ ॥ सूत्रधारलक्षणात्मकं पञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५० ॥ विश्वकर्मावाच — शृणु वत्स यथान्यायं सूत्रधारस्य लक्षणम्। शास्त्रज्ञः कुशलो दक्षो वास्तुविद्याविबोधकः ॥ १ ॥ विश्वकर्मा ने कहा— हे वत्स ! न्यायतः सूत्रधार के जो लक्षण होते हैं उन्हें सुनो ! सूत्रधार शास्त्रज्ञ हो, कुशल हो, दक्ष हो और वास्तुविद्या को समझने-समझाने वाला होना चाहिए। सूत्रधारो महाप्राज्ञः षट्कर्मसु निरन्तरम्। यो नित्यं त्यमरतत्त्वं ¹सादृष्टोऽपि महालयम् ॥ २ ॥
- 'सामृष्टोऽपि तधालयम् ?' इति प्रकाशित पाठः।