अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें256 अपराजितपृच्छा भूमि परीक्षा की एक अन्य विधि इस प्रकार है— उस खात, खड्डे को पानी से भरपूर भर दें और शिल्पी सौ कदम तक चलें। उतने समय में देखें कि यदि उसमें पानी घट कर आधा तक रह गया है तो उस भूमि को कनिष्ठ समझे, यदि पानी पूरा का पूरा भरा रहे तो समझे कि भूमि श्रेष्ठ, उत्तम है और यदि पानी पौन भाग तक ही उतर पाए तो उस भूमि को मध्यमा समझना चाहिए। अन्यदप्याह — पुण्योदकैर्भृतं खातमूर्ध्वं बाणं समुत्क्षिपेत्। भृते मही चोत्तमा स्यान्मध्यमाङ्गुलहीनतः ॥ 10 ॥ द्व्यङ्गुलोने कनिष्ठा स्यात् त्रिविधं भूमिलक्षणम्। अल्पोदकेऽतिहीना स्याद्वर्जयेदधमाधमम् ॥ 11 ॥ इसी तरह एक और विधि से भी भूमि परीक्षा की जाती है— इसमें खात अर्थात् खड्डे को पवित्र जल से पूरा भरकर तत्काल खात से ऊपर एक बाण छोड़े और बाण पुनः भूमि पर आकर गिरे, उतने समय में यदि खात में पानी पूरा का पूरा भरा पाया जाए तो समझें कि वह भूमि उत्तम है, यदि खात में भरा पानी उतने समय में एक अङ्गुल प्रमाण से घट जाय तो उस भूमि को मध्यमा समझे और यदि उतने समय में ही खात का भरा पानी दो अङ्गुल प्रमाण से घट जाए तो उस भूमि को कनिष्ठा समझें। इस तरह ये तीन अन्य प्रकार से भी भूमि परीक्षा के कहे हैं और यह भी देखें कि उस खात में पानी यदि बहुत थोड़ा रह जाए उतने ही समय में तो उस भूमि को अति हीना समझें, ऐसी भूमि को अधमाधम समझकर पूरी तरह त्याग देनी चाहिए। ततः सम्पूरयेद्वत्स सुदिने सम्प्रधार्यते। परीक्षयेच्च भूम्याद्यं वर्णगन्धैश्च स्वादतः ॥ 12 ॥ इसके उपरान्त, हे वत्स ! अच्छा दिन देखकर उस खड्डे को वापस भर दें, खुला न छोड़ें और भूमि की वर्ण, गन्ध और स्वाद से भी तीन प्रकार की परीक्षा करें।¹ अथ प्लवानुसारेण गुणदोषादीनां — भूमीनामष्टप्लवादि गुणदोषान् ब्रवीमि ते। पूर्वप्लवा धरा श्रेष्ठा ह्यायुः श्रीबलवर्द्धिनी ॥ 13 ॥
- इसके बाद का वर्णन श्लोक 49 के बाद प्राप्त होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसके बीच के श्लोक प्रक्षिप्त हैं, अथवा कोई सूत्र बीच में जोड़ा गया है क्योंकि 49वें श्लोक के बाद पुनः श्लोक 1 से गणना आरम्भ हो जाती है। वैसे इस सूत्र के नामकरण में भी इस विषय का उल्लेख नहीं है। किन्तु, 'न' मातृका में भी आगे श्लोकों के क्रम में अन्तर नहीं है।