अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५१ 257 हे वत्स ! अब मैं तुम्हें भूमि के आठ प्रकार के प्लव के गुण-दोष के बारे में कहता हूँ। पूर्व प्लवा भूमि अर्थात् पूर्व की ओर ढलान वाली भूमि श्रेष्ठ होती है, उसे आयु, श्री-सम्पत्ति और बल को बढ़ाने वाली समझें। सर्वसम्पत्करी पुंसां प्रासादानां विभूतिदा। राज्यपूज्या सदानन्दा प्राक्प्लवाचेद्भवेन्मही ॥ 14 ॥ इसी प्रकार लोगों के लिए सभी सम्पत्तियों को दिलाने वाली और प्रासादों, मन्दिरों के निर्माण में भी विभूति या महिमा को बढ़ाने वाली, राजाओं द्वारा पूज्या, सदा आनन्द प्रदान करने वाली कही गई है। इस तरह पूर्व दिशा के प्लव वाली भूमि के गुण बताए गए हैं। आग्नेयप्लवभूमिफलमाह - आग्नेयप्लवका भूमिरग्निदाहभयावहा। शत्रुसन्तापदा नित्यं कलिदोऽग्निप्लवः स्मृतः ॥ 15 ॥ परन्तु, जो भूमि आग्नेय कोण की ओर ढलान वाली होती है, वहाँ अग्निदाह का भय रहता है, वहाँ शत्रुओं से सन्ताप मिलता रहता है। आग्नेय प्लव वाली भूमि नित्य ही कलह कराने वाली बताई गई है। दक्षिणप्लवाफलं - नश्यन्ति पुरुषास्तत्र देवता च प्रणश्यति। धनहानिकरो नित्यं रोगकृद् दक्षिणः प्लवः ॥ 16 ॥ अब दक्षिण में प्लव या ढलान वाली भूमि को लें, ऐसी भूमि पर देवता और पुरुष नाश को प्राप्त होते हैं और उन्हें प्राणों का भय बना रहता है। वह नित्य रोग बढ़ाने वाली और धन की हानि कराने वाली होती है। नैर्ऋतिप्लवाफलं - प्रवर्तयेद् गृहे पुंसां रोगांश्च मृत्युदायकान्। धनहानिं तथा नित्यं कुरुते नैर्ऋतिप्लवा ॥ 17 ॥ इसी तरह नैर्ऋति दिशा में ढलान वाली भूमि भी वहाँ बनने वाले घरों में रहने वाले लोगों में रोगों को बढ़ाने वाली तथा मृत्युदायक कष्टों से भरी तथा नित्य धन हानि कराने वाली होती है। पराप्लवाफलं - पश्चिमप्लवका भूमिर्धनधान्यविनाशिनी।