अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें258 अपराजितपृच्छा शोकदाहं कुलं तत्र यत्र भूः पश्चिमप्लवा ॥ 18 ॥ अब पश्चिमी दिशा में ढलान वाली भूमि को देखें जो धन-धान्य का विनाश करने वाली होती है। ऐसी भूमि में शोक, दाह आदि गृहकर्ता के कुल में बने ही रहते हैं जो पश्चिम की ओर प्लव वाली होती है। वायव्यप्लवाफलमाह — शत्रुकर्त्री विरागा च गोत्रक्षयकरी तथा। गृहे च कन्यकाहन्त्री सदा दुःखभयावहा ॥ 19 ॥ अब वायव्य कोण की ओर ढलान वाली भूमि के दोषों को देखें। ऐसी भूमि शत्रुओं को बढ़ाने, वाली वैराग्य बढ़ाने वाली, गोत्र के परिजनों का क्षय करने वाली और ऐसे घरों में रहने वालों की कन्याओं को हनन करने वाली तथा सदा दुःख और भय देने वाली होती है। भुक्तं न जीर्यते तस्य मह्यां तत्र तु यो वसेत्। एतान् दोषानवहति दोषदा वायुदिक्प्लवा ॥ 20 ॥ इस भूमि पर जो भी बसता है, उसका खाया-पीया कभी नहीं पचता। इतने दोष इस वायव्य की ओर ढलान वाली भूमि के कहे हैं। उत्तरप्लवाभूफलं — पूज्या लाभकरी नित्यं पुत्रपौत्रविवर्धिनी। कामदा भोगदा चैव धनदा चोत्तरप्लवा ॥ 21 ॥ इन सबके विपरीत देखें कि उत्तर में प्लव या ढलान वाली भूमि कितनी शुभ होती है। ऐसी भूमि पूज्या होती है, नित्य लाभकारी होती है। वहाँ रहने वालों के परिवार में पुत्र-पौत्रों की वृद्धि होती है। यह भूमि सब कामनाओं को पूर्ण करने वाली होती है और इसमें सभी प्रकार के भोग उपलब्ध होते रहते हैं। ईशानप्लवाभूफलं — नरसौख्यसतीसत्यसौभाग्यादिविवर्द्धिनी। धनार्थैश्वर्यसम्पन्ना धर्मदेशानकप्लवा ॥ 22 ॥ इसी प्रकार ईशान कोण की दिशा में ढलान वाली भूमि भी बहुत ही शुभ मानी गई है। यह भूमि अपने यहाँ रहने वाले लोगों में सुख, सत्, सत्य और सौभाग्य बढ़ाने वाली होती है। इसमें धन, अर्थ, ऐश्वर्यों से सम्पन्नता प्रदान करने वाली, धर्म भावना बढ़ाने वाली सभी प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं।