अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५१ 259 पुनरपि प्राक्प्लवभूमिप्रशंसामाह — सा विद्या धनसम्पन्ना सर्वलोकहितावहा। विनयाचारसम्पन्नपुत्रपौत्रादिसङ्कुला ॥ २३॥ परन्तु, इन सब में पूर्व दिशा की ओर प्लव, ढलान वाली भूमि तो बड़ी ही शोभना कही गई है क्योंकि इस भूमि में रहने वालों को धन-सम्पन्नता, सर्व लोकहितकारी भावना, विनयपूर्वक आचार की भावना, पुत्र-पौत्रादि की बहुलता होती है। नीरोगा दानशीला च विशिष्टजनसेविता। पूर्वप्लवा तु या भूमिः शोभना सा प्रकीर्तिता ॥ २४॥ यहां के निवासी सदा निरोग, दानशील और सम्माननीय, विशिष्ट जनों की सेवा करने वाले होते हैं। गृहप्रासादोचितभूमिलक्षणं — गृहप्रासादयोर्भूम्याः कथ्यतेऽनुक्रमोऽधुना। मध्यप्लवा निकृष्टा स्यात् कनिष्ठा मध्यवर्तका ॥ २५॥ सर्वनाशकरी पुंसां सा भूमिस्तु निवासिनाम्। वर्जयेद्द्विद्रुमां क्ष्मां तु करालां मस्तकोन्नताम् ॥ २६॥ अब गृह और प्रासादों अर्थात् राजमहलों, देवालयों आदि के लिए जो भूमि काम में ली जाती है, उनके बारे में क्रमपूर्वक कहने जा रहा हूँ। ध्यान रहे कि जो भूमि मध्य प्लवा है अर्थात् जो स्वयं खड्डे में है और चारों ओर का पानी उसमें आकर एकत्र होता है, वह भूमि कार्य या आवास के लिए निकृष्ट अर्थात् बिल्कुल गई बीती और व्यर्थ होती है। ऐसी 'मध्यवर्तका' भूमि कनिष्ठा कहलाती है जो वहाँ के लोगों के लिए और निवासियों के लिए सर्वनाशकारी होती है। इसी तरह यह भी ध्यान रखने की बात है कि जो भूमि पेड़ों से रहित हो अर्थात् उजाड़ हो और बड़ी कराल, कठोर ऊँचाई से युक्त हो अर्थात् जिसका मस्तक भाग बीच में उन्नत हो, ऐसी भूमि भी वर्जित कही गई है। चौरेभ्यो भयदा नित्यं द्रव्यनाशकरी स्मृता। उच्छिन्ना च देवभूमी ¹ऊर्ध्वचा अधोगन्तव्यहीनः ॥ २७॥ क्योंकि, ऐसी भूमि पर चौरों का भय बना रहता है और इसके रखरखाव में भी
- 'ऊर्ध्वसार्धस्यतव्यही?' इति प्रकाशितपाठः।