अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें265 सूत्र-५१ सूर्यचन्द्रनक्षत्रसाधनम् — गतघटि ऋक्षभघ्नाः₂₇ (हताः ? ) षष्ठिहते₆₀ च शेष कम्। रविशशिभुक्तकालं रविचन्द्रर्क्षलग्नकम् ॥ 49 ॥ भूमिस्थ निधि प्राप्ति के लिए प्रश्न की गत घटियों को 27 से गुणा करें और उसमें 60 का भाग दें तो प्राप्त फल सूर्य व चन्द्रमा का भुक्तकाल होगा और यही सूर्य व चन्द्रमा के नक्षत्रों से लग्न होगा । (यदि प्राप्त नक्षत्र की संख्या में अश्विन्यादि गत नक्षत्र जोड़ा जाएगा तो अश्विन्यादि क्रम से चन्द्रमा के नक्षत्र का पता चलेगा।)² अपने-अपने नक्षत्र में हों तो दोनों पदार्थ होंगे व इनके विपरीत हो तो कुछ नहीं होता है। नवांश के अनुमान से भूमि का अनुमान किया जाना चाहिए। यदि चन्द्रमा क्रूर ग्रह से युक्त हो तो द्रव्य नहीं मिलता है। पूर्ण चन्द्रमा हो तो पूर्ण द्रव्य, क्षीण चन्द्रमा हो तो अल्पद्रव्य होता है। ग्रह दृष्टि के अनुरूप द्रव्य नव प्रकार का होता है। सूर्यादि ग्रहों का क्रम से स्वर्ण, रजत, ताम्र, पित्तल, रत्न, काँसा, लोहा, शीशा और नाग। चन्द्रमा को जो ग्रह देखता है उसके अनुसार द्रव्य होता है। मिश्र ग्रह देखते हैं तो मिश्रद्रव्य होगा। यथा— चन्द्रऋक्षे यदाऽर्केन्दू तत्रास्ति निश्चितं निधिः। भानुऋक्षे स्थितौ तौ चेत्तदा शल्यं च नान्यथा। स्वस्वभे द्वितयं ज्ञेयं नास्ति किञ्चिद्विपर्यये। नवांशकानुमानेन भूमानं तस्य कल्पयेत्। स्थितं न लभते द्रव्यं चन्द्रे क्रूरग्रहान्विते॥ पुष्टे चन्द्रे भवेन्मुद्रा क्षीणे चन्द्रेऽल्पको निधिः। ग्रहदृष्टिवशात्सोपि विज्ञेयो नवधा बुधैः ॥ हेमं तारं च ताम्रारं रत्नं कांस्यायसं त्रपु। नागं चन्द्रे विजानीयाद्भास्करादिगृहेक्षिते ॥ मित्रैर्मित्रं भवेद् द्रव्यं शून्यं दृष्टिविपर्यये। सर्वग्रहेक्षिते चन्द्रे निर्दिष्टोऽसौ महानिधिः ॥ शुभक्षेत्रगते चन्द्रे लाभः स्यान्नात्र संशयः । पापक्षेत्रे न लाभो हि विज्ञेयः स्वरपारगैः ॥ हेमं तारं च ताम्रं च पाषाणं मृन्मयायसम्। सूर्यादिगृहगे चन्द्रे द्रव्यभाण्डं प्रजायते ॥ भुक्तराश्यंशमानेन भूमानं काम्बिकैः करैः। नीचे द्विघ्नं परं नीचे जलस्थोऽसौ भवेन्निधिः ॥ स्वोच्चस्थे भूर्ध्वगं द्रव्यं नवांशक क्रमेण च। परमोच्चे परे तुङ्गे भित्तिस्थमृक्षसङ्क्रमे ॥ (नरपति. वही 11-21)
- वास्तुमण्डनम् और नरपतिजयचर्या में आया है कि निधि की प्राप्ति के लिए प्रश्नकालिक नक्षत्र में उदय से जितनी घड़ी बीत गई हो अर्थात् भयात घटिकाओं को 27 से गुणाकर 60 से या भभोग से भाग देने पर लब्धि नक्षत्र, घटीपल मिलें, उस नक्षत्र की संख्या में अश्विन्यादि गत नक्षत्र की संख्या को जोड़ने पर अश्विन्यादि क्रम से चन्द्रमा के स्पष्ट नक्षत्र का ज्ञान होता है। मूल श्लोक में ग्रन्थकार 60 की कल्पना भभोग के स्थान पर करता है किन्तु टीकाकार ने भभोग से ही भाजित करना उचित माना है। नाक्षत्रिय साठ घटिकात्मक चक्रानुसार नक्षत्रों का परिभ्रमण ध्यान में रखकर उक्त प्रकार से ही गणना की जानी उचित है— उदयादिगता नाड्यो भघ्नाः षष्ट्यावशेषके। दिनेन्दुर्भुक्तियुक्तोऽसौ भवेत्तात्कालचन्द्रमाः ॥ (वास्तु. 1,164 एवं नरपति. वही 10) जिस तरह चन्द्र नक्षत्र के भयात भभोग से स्पष्ट चन्द्रमा का साधन कहा गया, उसी प्रकार इष्ट समय में नक्षत्र स्थित सूर्य का साधन किया जाना चाहिए। अर्थ यह है कि जिस नक्षत्र में सूर्य हो, उसमें सूर्य के प्रवेश काल से इष्टकाल तक गत दिनादि को सूर्य सम्बन्धी भयात माने और आगे के नक्षत्र में सूर्य के प्रवेश दिन से पूर्व तक भभोग दिन समझकर क्रिया कनी चाहिए। फिर यह देखना चाहिए कि ये दोनों अपने-अपने नक्षत्र में अथवा भिन्न-भिन्न नक्षत्र में हैं— चन्द्रवत् साधयेत् सूर्यमिष्टर्क्षं चेष्टकालिकम्। पश्चाद्विलोकयेत्तो चेत्स्वर्क्षे वा चान्यभे स्थितौ ॥ (वास्तु. 1, 165, एवं नरपति. वही 11)