अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें264 अपराजितपृच्छा अश्विन्यादि तीन (अश्विनी, भरणी व कृत्तिका), आर्द्रा आदि पाँच (आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा व मघा), पूर्वाषाढादि चार (पूर्वाषाढा, उत्तराषाढ, अभिजित् व श्रवण) तथा रेवती और उत्तरात्रय नक्षत्रों को मिला कर कुल सोलह नक्षत्र चन्द्रमा के नक्षत्र होते हैं और शेष नक्षत्र (रोहिणी, मृगशिरा, पूर्वाफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, धनिष्ठा, शतभिषा) सूर्य के हैं। चन्द्रर्क्षे च स्थिते सूर्ये चन्द्रे सूर्यर्क्षसंस्थिते ॥ 46 ॥ तत्र शून्यं भवेत्स्थानं द्रव्यशल्यविवर्जितम्। जब चन्द्र के नक्षत्र सूर्य के नक्षत्र में और सूर्य के नक्षत्र चन्द्र में समागत हों, ऐसे योग में उक्त स्थान पर कुछ भी नहीं होता है, न द्रव्य और न शल्य ही मिलता है। द्रव्यशल्यविना त्वेतं ¹शल्यद्रव्यं विनिर्दिशेत् ॥ 47 ॥ चन्द्रः पूर्वं परं भानुस्तत्र शल्यं विनिर्दिशेत्। भानुः पूर्वं परं चन्द्रस्तत्र शल्यं विनिर्दिशेत् ॥ 48 ॥² किन्तु यदि सूर्य व चन्द्रमा अपने अपने-अपने नक्षत्र में हों तो वहाँ धन व शल्य दोनों ही कहना चाहिए। गणना से यह ज्ञात करें कि यदि चन्द्र पूर्व नक्षत्र में और सूर्य परवर्ती नक्षत्र में हो तो उस भूमि में हड्डी होती है और सूर्य पूर्व तथा चन्द्रमा परवर्ती नक्षत्र में स्थित हो तो भी वहाँ शल्य बताना चाहिए।³ नरपति में यह श्लोक इस प्रकार है जिसका आशय है कि अश्विनी से तीन, आर्द्रा से पाँच एवं पूर्वाषाढ़ा से चार व रेवती-पूर्वाभाद्रपद- ये चन्द्रमा के नक्षत्र है और शेष सूर्य के नक्षत्र हैं-अधींशपूर्वाषाढादित्रिं पञ्च चतुष्टयम्। रेवती पूर्वाभाद्रेन्दोर्भानि शेषाणि भास्वतः ॥ (नरपति. नाडीचक्रप्रकरणम् 1, 9) नरपति ने सम्पूर्ण चक्र इस प्रकार बताया है— अहिचक्रं प्रवक्ष्यामि यथा सर्वज्ञभाषितम्। द्रव्यं शल्यं तथा शून्यं येन जानन्ति साधकाः॥ निधिर्निर्वर्तनैकस्थः सम्भ्रान्तो यत्र भूतले। तत्र चक्रमिदं स्थाप्यं स्थानद्वारमुखस्थितम्॥ ऊर्ध्वरेखाष्टकं लेख्यं तिर्यक् पञ्च तथैव च। अहिचक्रं भवेत्येवमष्टाविंशति कोष्ठकम्॥ तत्र पौष्णाश्वि याम्यर्क्षं कृत्तिकार्पितृभाग्यकम्। उत्तराफाल्गुनी लेख्यं पूर्वपङ्क्त्यां भसप्तकम्॥ अहिर्बुध्न्याजपादक्षं शतभं ब्राह्मसार्पभम्। पुष्यं हस्तं समालेख्यं द्वितीयां पङ्क्तिमास्थितम्॥ विधिविष्णुर्धनिष्ठाख्यं सौम्यरोद्रेन्द्रपुनर्वसू। चित्राभं च तृतीयायां पङ्क्तौ धिष्ण्यस्य सप्तकम्॥ विश्वक्षं तोयभं मूलं ज्येष्ठा मैत्रविशाखिके। स्वाती पङ्क्त्यां चतुर्थ्यां च कृत्वा चक्रे प्रस्तारः पन्नगाकृतिः। द्वारशाखामघायाम्ये द्वारस्था कृत्तिका मता॥ (नरपति. पूर्वोक्त 1, 8)
- 'शल्यद्रव्यादि कथ्यते?' प्रकाशित पाठः।
- वास्तुमण्डनम् में उक्त श्लोक इस रूप में मिलते हैं— चन्द्रधिष्णैस्थितेसूर्ये सूर्यचन्द्रसमागते॥ तत्र शून्यं भवेस्थानं द्रव्यशल्य विवर्जितम्। द्रव्यशल्यविना ह्येवशल्यद्रव्यं विनिर्दिशेत्॥ चन्द्रपूर्वापरोभानुस्तत्र शल्यं विनिर्दिशेत्। भानुपूर्वापरश्चन्द्रस्तत्र द्रव्यां विनिर्दिशेत्॥ (वास्तु. 1, 161-163)
- उक्त प्रसङ्ग में नरपति. का मत विचारणीय है चन्द्र व सूर्य के नक्षत्र को जानकर देखें कि दोनों अपने नक्षत्र में हैं अथवा दूसरे के नक्षत्र में, यदि चन्द्रमा के नक्षत्र में सूर्य व चन्द्रमा दोनों हों तो उस स्थान में निश्चय ही द्रव्य होता है। सूर्य के नक्षत्र में दोनों हों तो शल्य होगा और कोई पदार्थ नहीं। यदि दोनों