अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५१ 263 यत्र ना दृश्यते शल्यं द्रव्यं तत्र तथोच्यते। तत्र स्थाने महीं खात्वा द्रव्यं तिष्ठति निश्चयम्॥ ४२॥ जिस स्थान में किसी भी प्रकार का शल्य न पाया जाए तो समझो कि वहाँ भी द्रव्य है। अतः उस स्थान पर भी भूमि को खोदने पर धन, द्रव्य निश्चय ही मिलता है। अथाहिबलचक्रम् - अष्ट₈ पूर्वायता रेखा भिन्नाः पञ्च₅ समुद्धरेत्। पदैरष्टाविंशति₂₈ भिर्भृर्ऋक्षसङ्ख्यया तथैव च॥ द्वारमध्ये कृत्तिका च शाखयोर्भरणीमघे॥ ४३॥ (भूमिस्थनिधि के अवलोकन के लिए अहिचक्र की विधि कही जा रही है) इसके लिए सर्वप्रथम पूर्वापर आठ रेखाएँ खींचनी चाहिए और तिर्यक् या आड़ी पाँच रेखाएँ डालें। यह रचना इस प्रकार से की जाए कि अन्दर 28 कोष्ठक बन जाएँ। इन पदों में (अभिजित सहित) सभी 28 नक्षत्रों का इस प्रकार से न्यास किया जाना चाहिए कि द्वार के मध्य में कृत्तिका नक्षत्र और दोनों शाखाओं में मघा और भरणी नक्षत्र आ जाए। चन्द्रे द्रव्यं तथा सूर्ये शल्यं चैव विनिर्दिशेत्। अहिबलचक्रे प्रोक्ता ¹सारोद्धृत्यां च केवली॥ ४४॥ इस प्रकार केवली के स्वरशास्त्र में कहे गए अहिबल चक्र में विन्यसित नक्षत्रों में चन्द्रमा के नक्षत्रों से द्रव्य और सूर्य के नक्षत्रों से शल्य का ज्ञान करना चाहिए। अश्विन्यादि त्रिकं₃ चैव आर्द्रादि पञ्चकं₅ तथा। पूर्वाषाढा चतुष्कं₄ च रेवती चोत्तरात्रयम्॥ ४५॥ शशिभानि किलैतानि शिष्टानि रविभानि च।²
- 'स्वसरो धृत्याश्च केवली?' प्रकाशित पाठः। 'स्वरोधृत्यां च केवली' सुझाव पाठः। यहाँ ग्रन्थकार ने सारोद्धार नामक स्वरशास्त्र के साथ ही 'केवली' का उल्लेख किया है। बहुत सम्भव है कि यह केवली कवि नरपति हो। नरपति का नरपतिजयचर्या नामक ग्रन्थ स्वरशास्त्रों में बहुत प्राचीन और महत्वपूर्ण माना जाता है जिसका रचनाकाल शङ्करबालकृष्ण दीक्षित (भारतीयज्योतिष, पृष्ठ 624) ने विक्रम संवत् 1232 (शकाब्द 1097 तद्नुसार 1175 ई.) माना है। नरपति को जैन मतावलम्बी कहा गया है, इसलिए भुवनदेव ने सम्भवतः उन्हें केवली कहा हो। वे अन्हिलपट्टन के थे और उनके पिता आम्रदेव धारानगरी में रहते थे। इस ग्रन्थ को सारोद्धार भी कहा जाता है- पुस्तकेन्द्रं पटौकश्रीदर्पणं ज्योतिपार्णवम्॥ सारोद्धारं प्रवक्ष्यामि...। प्रस्तुत वर्णन नरपति के आधार पर किया गया प्रतीत होता है।
- सूत्रधारमण्डनकृत वास्तुमण्डनम् में ये श्लोक इस रूप में आए हैं- अश्विन्यादित्रिकं₃ चैव आर्द्राद्याश्चैवपञ्चकम् ₅। पूर्वाषाढाचतुष्टं₄ च उत्तरारेवतीद्वयम् ₂॥ एतानि शशिधिष्ण्यानि शेषाणि रविभानि च। (वास्तुमण्डनम् 1, 160-161)