भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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262 अपराजितपृच्छा खर्जूर, दाड़म, केला, कर्कन्धू (करौन्दा) और बीजोरा जिन घरों में उगते हैं, वे कभी वृद्धि नहीं पाते हैं। अथ भूमिस्थनिधिसाधनं — नकुलश्चोरगो यत्र क्रीडतः स्नेहत उभौ। तत्रस्थाने महीं खात्वा द्रव्यं तिष्ठति निश्चयम् ॥ ३९ ॥ अब भूमि में गड़े धन आदि द्रव्यों को जानने के लक्षण बताये जा रहे हैं— जिस स्थान में नेवले और सर्प आपस में दोनों स्नेहपूर्वक क्रीड़ा करते पाए जाएँ ऐसे स्थान की भूमि को खोदने पर निश्चय ही द्रव्य, धन होने का पता लगता है।¹ बिडाला मूषकाः स्नेहाद्रमन्ते च परस्परम्। तत्र स्थाने महीं खात्वा द्रव्यं तिष्ठति निश्चयम् ॥ ४० ॥ जिस स्थान पर बिल्लियाँ और चूहे आपस में, परस्पर स्नेहपूर्वक रमण करते हों, उस स्थान की भूमि खोदने पर भी निश्चय ही धन और द्रव्य मिलता है। सर्पाश्च मूषकाः स्नेहात् क्रीडन्त्यानन्दरूपकाः। तत्र स्थाने महीं खात्वा द्रव्यं तिष्ठति निश्चयम् ॥ ४१ ॥ इसी तरह जिस स्थान पर सर्प और चूहे भी प्रेमपूर्वक और आनन्द में क्रीड़ा करते पाए जाएँ, उस स्थान में भी भूमि खोदने पर निश्चय ही धन और द्रव्य की प्राप्ति होती है।

  1. भूमिगत द्रव्य या दफीनों की खोज का बहुत रोचक विषय रहा है। प्राचीन भारत में तान्त्रिकों ने इस प्रकार की विधियों के अनुसन्धान में ही अपने को लगाए रखा है। रुद्रादि यामलों, स्वरशास्त्रों में भी इस विषय का वर्णन मिल जाता है। 'नरपतिजयचर्यास्वरोदय' में यह वर्णन आया है। वराहमिहिर, मेघमालाकार ने काकाण्ड, खञ्जनदर्शन आदि का वर्णन करते हुए निधि प्राप्ति का वर्णन किया है जिसे मुहूर्त्ततत्त्वकार केशव दैवज्ञ ने भी दिया है। अपराजितपृच्छा के इस विषय के श्लोकों को सूत्रधार मण्डन ने वास्तुमण्डनम् के पहले अध्याय में उद्धृत किया है। कौतुकचिन्तामणि में भी उड़ीसा के राजा प्रतापरुद्रदेव ने इस विधि को दिया है। 'न' पाठ में इसके बाद श्लोक इस क्रम से मिलते हैं— नकुलोरुद्रभोश्च क्रीडास्ते हिस्तजोत्तमा। सूत्रस्थाने मर्हयित्वा द्रव्यं तिष्ठन्ति निश्चय ॥ ३८ ॥ यत्र ना दृश्यते शल्यं द्रव्यं वामं च योच्यते। सूत्रस्थाने महर्षित्वा द्रव्यं तिष्ठन्तिनिश्चयम् ॥ ३९ ॥ द्वारमध्ये कृतिकाश्च भरणीविशाखयो। शेषं पूर्वं विधातव्यं सनन्द सर्वकामयम् ॥ ४० ॥ इति मन्दवेदयुगैका वेदाश्च गर्भस्फुरितरा। स्वकीयौभित्तिभ्रमन्युक्ता च पदैकैका प्रकल्पयेत् ॥ ४१ ॥ द्विभागं कर्णमित्युक्तं भागद्वे तु च कर्णिका। प्रतिरथं सार्धभागं निर्गमं विस्तरं तथा ॥ ४२ ॥ पुनरंगरी अर्धभागं त्रिभागं अर्द्धविस्तरम्। निर्गमं भागमेकेन शिखराधो समुद्भवैत् ॥ ४३ ॥ वेदासभद्रविस्तारं तद्विस्तु विनिर्गमम्। चन्द्रावलोकनं कुर्याद् छाद्यघण्टा समन्वितम् ॥ ४४ ॥ शेषं पूर्वं विधातव्यं पीषदेच्छाद्यके कथम्। नागरोक्तं विधमानं च प्रयक्तं वास्तवेविधिः ॥ ४५ ॥ ('न' संज्ञक मातृका पत्र 51)