अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५१ 261 अस्तु, इन छाया से भयभीत रहते हुए ही, इन छायाओं को छोड़कर ही घर बनाएँ क्योंकि यह एक ध्रुव सत्य मानकर चलें कि वृक्षों की और देव मन्दिरों की छाया घरों पर नहीं पड़े। यही शुभप्रद है। ऐसे में छायाओं को त्यागकर ही घर बनाएँ। द्वयोः प्रहरयोश्च्छाया वृक्षप्रासादगुल्मजा। हर्म्यगृहे तथैवं स्यादधःस्तान्नैव निन्दिता ॥ ३३ ॥ जिन वृक्षों, प्रासादों और गुल्मों से दोपहर में होने वाली छाया हवेलियों और घरों पर पड़ती है, वह अवश्य ही त्याज्य है परन्तु जो छाया उन घरों और हवेलियों से नीचे ही रह जाती है, वह निन्दित नहीं समझी जाती है। अका अशोका अश्वत्थाः केतकीबीजपूरकाः। यस्मिन् गृहे प्ररोहन्ति तद् गृहं नैव वर्द्धते ॥ ३४ ॥ जिस घर में आक, अशोक, अश्वत्थ, केतकी, बीजोरा (बीजपूरक, जम्बीर) के वृक्ष उगते हैं, उस घर में कभी भी वृद्धि, सम्पन्नता, सुख आदि नहीं बढ़ते। दाडिमं च हरिद्रां च श्वेतां च गिरिकर्णिकाम्। यदिच्छेदात्मनः श्रेयो गृहद्वारे न रोपयेत् ॥ ३५ ॥ दाड़िम, हल्दी, श्वेता, गिरिकर्णिका आदि वृक्षों को अपनी भलाई चाहने वाले व्यक्ति कभी भी अपने गृह के द्वार के पास रोपण न करें। त्यक्त्वा चोग्रतमं वृक्षं कटुकं कण्टकान्वितम्। अपि सौवर्णिकान्वृक्षान् गृहाश्रये न रोपयेत् ॥ ३६ ॥ इसी तरह उग्रतम समझे जाने वाले वृक्ष, कड़वे वृक्ष, काँटों वाले वृक्ष, सुनहरे पुष्पों वाले, कनेर के वृक्ष भी घर के पास नहीं रोपण करें। न्यग्रोधोदुम्बरप्लक्षांस्तथा वै कार्मुकादिकान्। वर्जयेद् गृहमाश्रित्य हर्म्यवृद्धिर्न विद्यते ॥ ३७ ॥ बरगद, उदुम्बर, पलाश और सुपाड़ी के वृक्ष घरों के पास हों तो वे भी वर्जनीय है क्योंकि इनके रहते हवेली और घरों में सम्पन्नता की वृद्धि नही होती है। खर्जूरी दाडिमी रम्भा कर्कन्धू बीजपूरिका। यस्मिन् गृहे प्ररोहन्ति तद् गृहं नैव वर्द्धते ॥ ३८ ॥¹
- तुलनीय- बदरी कदली चैव दाडिमी बीजपूरिका। प्ररोहन्ति गृहे यत्र तद् गृहं न प्ररोहति ॥' (वृक्षायुर्वेद : सुरपालकृत, सम्पादक - श्रीकृष्ण 'जुगनू', चौखम्बा, वाराणसी, 2004, 29, समराङ्गणसूत्रधार 48, 131)