अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें208 अपराजितपृच्छा तो पुत्र-पौत्र की वृद्धि होती है। पूर्वे तथोत्तमं विद्यादीशाने मोक्षदायकम् । इतरासु चतुर्दिक्षु सर्वदोषसमुद्भवः ॥ 13 ॥ पूर्व की ओर से सर्वोत्तम जाने और ईशान की ओर गिरे तो मोक्षदायक मानें। इनके अलावा चारों दिशाओं में जो इतर रह जाती है, सभी प्रकार के दोषों को उत्पन्न करने वाली है। कीलकरोपणविचार - आनीय कीलकं सूत्रं रोपयेच्च चतुर्दिशम् । कीलकस्य च सूत्रस्य वर्णभेदांश्च लक्षये ॥ 14 ॥ अब कीलक के वर्ण भेद बताते हैं— पहले कीलक को लाकर स्थापित करें और उस पर चारों ओर सूत्र लपेटें। इससे कीलक और सूत्र के वर्ण भेद देखे जाते हैं। प्रशस्यन्ते ब्राह्मणानां कीला आश्वत्थकीलकाः । उदाहृता क्षत्रियाणां खादिरा रक्तचन्दनाः ॥ 15 ॥ ब्राह्मणों के लिए अश्वत्थ का कीलक प्रशस्त है और क्षत्रियों के लिए खदिर और रक्त चन्दन के कीलक शुभ हैं। शिरीषशालतालानां वैश्यजातेः प्रकीर्तिताः । सर्जकार्जुनयोस्त्वेवं शूद्राणां च सुखावहाः ॥ 16 ॥ वेश्यजनों के लिए शिरीष, शाल और ताड़ के कीलक शुभ कहे गए हैं और शूद्र समुदाय के लिए सर्जक और अर्जुन वृक्ष के कीलक सुखदायक होते हैं। कीलकस्य आयामप्रमाणं - द्वात्रिंशदङ्गुलो₃₂ विप्रे चाष्टाविंशतिः₂₈ क्षत्रिये । चतुर्विंशाङ्गुलो₂₄ वैश्ये शूद्रे विंशाङ्गुलो₂₀ भवेत् ॥ 17 ॥ अब कीलकों की लम्बाई के बारे में कहते हैं— ब्राह्मणों के लिए 32 अङ्गुल लम्बे कीकल, क्षत्रियों के लिए 28 अङ्गुल लम्बे, वैश्यों के लिए 24 अङ्गुल लम्बे और शूद्रों के लिए 20 अङ्गुल के कीलक प्रशस्त कहे गए हैं। चतुरश्रो भवेद् विप्रे चाष्टाश्रः क्षत्रिये मतः । षोडशाश्रस्तु वैश्ये स्याद् वृत्तं शूद्रे प्रकीर्तितः ॥ 18 ॥ इसी तरह ब्राह्मणों के कीलक चतुरस्र (चौकोर) हो, क्षत्रियों के कीलक अष्टाश्र (अष्टकोणीय), वेश्यों के कीलक षोडशास्र (सोलहकोणीय) हो और शूद्रों के लिए कीलक गोलाकार होने चाहिए।