अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६९ सूत्र-५१ सूत्रलक्षणं — विप्रस्य दर्भजं सूत्रं मौञ्जं तु क्षत्रियस्य च। कासजं तु भवेद् वैश्ये शाणं शूद्रस्य कीर्तितम्॥ १९॥ अब सूत्र के बारे में कहते हैं— यदि ब्राह्मण हो तो उसको दर्भ या दाभ का सूत्र काम में लेना चाहिए, क्षत्रिय हो तो मूँज का, वैश्य हो तो कास अर्थात् कपास का बना हुआ तथा शूद्र हो तो शण का बना हुआ सूत्र काम में लिया जाना चाहिए। न काष्ठलोहाङ्गारैश्च नखपादैरुद्घाटनम्। शस्त्रे शस्त्रभयं विन्द्यात् सूत्रच्छेदे तु मृत्युदम्॥ २०॥ कभी भी केवल काष्ठ, केवल लोह, अङ्गारों, नखों, पाँवों, शस्त्रों और सूत्रच्छेद से भी भूमि का उद्घाटन अर्थात् खुदाई कार्य उचित नहीं है क्योंकि शस्त्र से शस्त्र भय और सूत्रच्छेद से मृत्यु की आशङ्का रहती है।¹ सूत्रपातनमाह — आलिख्य होमशालायां धर्मकामार्थसाधकम्। कृत्वा पुष्पाक्षतं पात्रे जलेरेखां समुद्धरेत्॥ २१॥ इसके बाद, नक्शे के अनुसार जहाँ होमशाला बनाने का विधान हो, उस भूभाग पर धर्म-काम आदि की साधक होमशाला के लिए निशानदेही (डाकवेल) डालकर लिख दें और पात्र में पुष्पाक्षतयुक्त जल से उसके चारों ओर जलेरेखा बना दें। बलिं दद्याद्यथान्यायं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा। आफालयेत् ततः कीलं प्रथमं वह्निगोचरम्॥ २२॥ फिर वहाँ शास्त्रीय दृष्टि अनुसार कर्म करके यथान्याय बलि प्रदान करें और प्रथम कील को अग्निकोण में गाड़ना चाहिए। नैर्ऋत्यान्ते द्वितीयं च वायव्यं तदनन्तरम्। ईशान्यां च पुनर्द्दद्यात् सूत्रं यावच्चवह्निगम्॥ २३॥ दूसरी कील को नैर्ऋत्य कोण में गाड़े और उसके बाद की कील वायव्य कोण में गाड़े और बाद में ईशान कोण में गाड़े। इस प्रकार अग्निकोण की कील से बाँधा
- इस सम्बन्ध में कई शास्त्रीय प्रमाण है। यथा— नखान् खादयेच्छिन्द्यान्न तृणं न महीं लिखेत्॥ न श्मश्रु भक्षयेल्लोष्टं न मृद्रीयाविचक्षणः। (विष्णुपुराण तृतीयांश, 12, 10-11) तुलनीय : लोष्टमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः। स विनाशं व्रजत्याशु सूचकोऽशुचिरेव च॥ (मनुस्मृति 4, 71) तथा : लोष्टमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः। नित्योच्छिष्टः शङ्कुशुको नेहायुर्विन्दते महत्॥ (महाभारत शान्तिपर्व 193; अनु. 104, 15)