अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगया सूत्र इन सभी कीलों के चारों ओर लिपटता हुआ पुनः अग्रिकोण की कील में ले जाकर बाँध दें। गृहीत्वा मुद्गरं शिल्पी प्रहारांस्त्रीन् प्रदापयेत्। चतुर्थांशे गते कीले सा मही चोत्तमा मता॥ 24 ॥ इसके बाद, शिल्पी अपने हाथ में हथौड़ा (मुद्गर) लेकर तीनों कीलों पर प्रहार करें और परीक्षा करें कि यदि कीलें भूमि में केवल चतुर्थांश तक ही गड़ी हों तो उस भूमि को उत्तम भूमि समझें। मध्यमा स्यात्त्रिभागेन कनिष्ठार्धेन च स्मृता। अत ऊर्ध्वं गते कीले विद्यान्न शिवमालयम्॥ 25 ॥ यदि कीलें तीसरे भाग तक गड़ गई हों, तो उस भूमि को मध्यमा समझें तथा यदि कील आधे तक गड़ गई हो, तो उस भूमि को कनिष्ठा समझें और आधे से ऊपर तक यदि कील भूमि में गड़ जाए तो समझ लें कि वहाँ भूमि शिवालय के निर्माण योग्य नहीं है। हन्यमानो यदा कीलो नमितः कां दिशां प्रति। तन्माहात्म्यमथाख्यास्ये नमिते कीलके फलम्॥ 26 ॥ प्राच्यां स्यादर्थसम्पत्तिः सन्तापो ह्यग्निगोचरे। दक्षिणे विपुला भोगा नैर्ऋत्ये कलहः सदा ॥ 27 ॥ अब हम कील को प्रहार करते समय वह जिस दिशा की ओर झुक जाए तो उसका फल बताते हैं और उसके नमित होने या झुक जाने का माहात्म्य भी बताते हैं। यदि कील पूर्व दिशा की ओर झुक जाय तो अर्थ, धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है परन्तु कील यदि अग्रिकोण की ओर नमित हो जाए तो सन्ताप का कारण बनती है। वही कील यदि दक्षिण की ओर नमित हो जाए तो शुभ है और विपुल भोगों की देने वाली सिद्ध होती है परन्तु, नैर्ऋत्य कोण की ओर नमित कील से तो महान कलह सदा ही बना रहता है। वारुण्यां धनधान्यं च वायव्यां स्त्रीप्रदूषणम्। उत्तरे सर्वभद्राणि हीशाने मरणं ध्रुवम्॥ 28 ॥ इसी प्रकार यदि कील वारुणी (पश्चिम) दिशा की ओर नमित हो जाए तो धन-धान्य का भरपूर लाभ देती है परन्तु यदि कील वायव्य कोण की ओर नमित हो जाए तो समझो कि घर की स्त्रियों में दूषण अर्थात् दुराचार होने का भय उत्पन्न होगा। इसी तरह उत्तर दिशा की ओर यदि कील नमित हो जाए तो सभी ओर से