भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-५२ 271 लाभ और शुभ की ही सम्भावना रहती है और यदि कील ईशान कोण की ओर नमित हो जाए तो निश्चित ही मृत्यु की आशङ्का बन जाएगी। प्राञ्जलः सिद्धिदः प्रोक्तोऽन्यथा चैवमसिद्धिदः । भग्नश्च मृत्युदः प्रोक्तः कीलकस्य महात्म्यकम् ॥ २९ ॥ यदि कील प्रहार के साथ ही सरलता से भूमि में गड़ जाए तो वह सिद्धि देने वाली होती है, अन्यथा वह सिद्धि देने वाली नहीं कही जाती। इसी तरह यदि कील हथौड़े से प्रहार के समय भूमि में गड़ने के समय टूट जाए तो उसको अवश्य ही मृत्युदायक कष्टपूर्ण समझें। इस तरह यहाँ मैंने कीलक के माहात्म्य को बताया है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां भूपरिग्रहकीलकारोपणाधिकारो नामैकपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५१ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में भू परिग्रह, कीलक आरोपण अधिकार नामक इकावनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥ कूर्मप्रमाणपदप्रतिष्ठा नाम द्विपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५२ ॥ विश्वकर्मोवाच – शस्ते मासे सिते पक्षे ह्यतीते चोत्तरायणे। ताराचन्द्रबले चैव योगे चामृतसम्भवे ॥ १ ॥ सूत्रपातस्तु कर्त्तव्यः प्राची साध्या ततो भवेत्। विश्वकर्मा ने कहा कि शुभ माह में, शुक्ल पक्ष हों और उत्तरायण का अतीत हो चुका हो, उस समय ताराबल और चन्द्रबल देखकर और अमृतयोग आने पर कार्य का सूत्रपात करना चाहिए। ऐसा करते समय प्राची-दिक्साधन का अवश्य ध्यान रखना चाहिए। दिग्मूढनिषेधमाह – चतुरश्रं समं कृत्वा दिग्मूढं परिवर्जयेत् ॥ २ ॥ पूर्वपश्चिमदिग्मूढं वास्तु स्त्रीनाशकं स्मृतम्। दक्षिणोत्तरदिग्मूढं सर्वनाशकरं भवेत् ॥ ३ ॥ भूमि के चतुरस्र बनाते समय कभी दिग्मूढ़, दिशाओं में भूल न आने देना चाहिए। जो वास्तु पूर्व-पश्चिम दिशा में दिग्मूढ़ होता है अर्थात् गलत दिक्साधनयुक्त होता है, उसका फल स्त्रीजन के नाश का कारण बनता है। इसी तरह दक्षिण-उत्तर में जो वास्तु दिग्मूढ़ हो, वह भी सर्व नाशकारक होता है।

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