अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें272 अपराजितपृच्छा विसूत्रं च भवेत्तच्चेत् सूत्रसन्तापकारकम्। प्रासादस्य प्रमाणेन सूत्रैः क्षेत्रं प्रसाधयेत् ॥ ४ ॥ प्रासादे भित्तिसंयुक्तो गृहे भित्तिस्तु बाह्यतः। कर्त्तव्यो मण्डपैर्युक्तो जगत्यायाम एव च ॥ ५ ॥ और जो वास्तु विसूत्र हो, सीधवत सूत्र में न होकर टेढ़ा-मेढ़ा हो, वह सूत्रधार को सन्तापकारक होता है। अतः प्रासाद, मन्दिर के प्रमाणानुसार ही सूत्रधारों को उस भूमि क्षेत्र की ठीक-ठीक साधना चाहिए। यह ध्यान रहे कि प्रासाद, मन्दिरों में भित्ति से संयत अर्थात् भित्ति के नाप के साथ ही मण्डप का नाप और जगती, पीठिका का नाप होता है, परन्तु मकानों, भवनों में भित्ति के नाप के बाहर मण्डप का नाप और जगती पीठ का नाप होता है। अथ जीर्णप्रासादलक्षणं — अथाख्यास्ये पुनश्चान्यद् जीर्णप्रासादलक्षणम्। भग्नं द्रव्यादिकं वापि उद्धारेऽष्टगुणं फलम् ॥ ६ ॥ अब हम पुनः दूसरे जीर्ण प्रासादों के लक्षण कहते हैं जिनके द्रव्यादिक अङ्ग- उपाङ्ग भग्न हो गए हो, उनका पुनः उद्धार करने अर्थात् जीर्णोद्धार करके पुनः नवीन करने का फल नवीन निर्माण किए गए से आठ गुणा अधिक पुण्य होता है। पूर्वमानप्रमाणं च कारयेत्तद्विचक्षणः। तद्रूपं तत्प्रमाणं च पूर्वसूत्रं च चालयेत् ॥ ७ ॥ जिन-जिन भग्न वस्तुओं का जीर्णोद्धार किया जाए, उनमें विचक्षण सूत्रधार या गजधर को चाहिए कि उन वास्तुओं का पहले का मान-प्रमाण नींव-सीम से वैसा ही सही रखें, उन्हे तद्रूप और तत्प्रमाण रखते हुए पूर्व के सूत्र में, सूत-सावल में अन्तर नहीं आने दें। चलिते चालिते वापि दिङ्मूढे स्थानवास्तुषु। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पूर्वसूत्रं च चालयेत् ॥ ८ ॥ चलिते चालिते चैव सूत्रस्थाने च विग्रहम्। हीने हानिं प्रकुर्वीत चाधिके स्वजनक्षयम् ॥ ९ ॥ क्योंकि, सूत्र प्रमाण में न्यूनाधिकता, हेर-फेर से उस सूत्रस्थान में विग्रह खड़े हो जाते हैं, जैसे कम रखने पर हानि होती है और वेशी रखने पर अपने ही परिवार जनों का क्षय होता है।