अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५२ 273 भूपरिग्रहणे चैव वास्तुविद्याविशारदैः। वास्तुस्थानं पुरा ज्ञात्वा खनेच्चैवं प्रदक्षिणम्॥ 10 ॥ भूमि का परिग्रहण करते समय भी सभी वास्तुविद्या विशारद सूत्रधार, गजधरों को चाहिए कि वे उस वास्तु-स्थान की पहले की पुरानी जानकारी अच्छी तरह कर लें, उसके बाद ही उसकी प्रदक्षिणा करके खुदाई आरम्भ करें। मर्मवेधविचार – पिता माता च पुत्राश्च नाशं गच्छन्ति मस्तकै। पृष्ठे चात्मविनाशश्च देशत्यागश्च जायते॥ 11 ॥ क्योंकि, यदि पुरानी जानकारी न की जाए और उस वास्तु-स्थान में मर्मवेध रह जाए तो बड़ा अनर्थ हो जाता है। जैसे— मस्तक की ओर मर्मवेध रह जाए तो उस गृहपति के माता-पिता व पुत्रों का नाश हो जाता है तथा यदि पीठ की ओर मर्मवेध रह जाए तो स्वयं गृहस्वामी का ही नाश हो जाता है अथवा उसे देश त्याग करके जाना पड़ सकता है। स्त्रीस्वगोत्रविनाशश्च चतुःपादेषु वै क्रमात्। जायते धननाशश्च मर्मवेधे कृते सति॥ 12 ॥ और, इसी क्रम में स्त्री, स्वगोत्र बन्धुजन, चौपायों और धन का भी विनाश हो जाता है— यदि मर्म वेध बने रहे तो ऐसा फल जाने। शुभं पुत्रो धनं धान्यं ज्ञात्वा कुक्षिं यदा खनेत्। कृत्वा प्रदक्षिणं कुम्भं गृहीत्वा स्थापितं ततः॥ 13 ॥ कुक्षिं चातोदकैर्भृत्वा शान्तिमुच्चार्यशोभनाम्। तथोदकैर्वन्दनीयं वास्तुदेवं विसर्जयेत्॥ 14 ॥ इसलिए यदि पुत्र, धन, धान्यादि के लिए शुभ मुहूर्त निकलवाकर शुभ, मङ्गल जान लिया जाए तभी नींव-कुक्षी को खोदना चाहिए। इसके लिए हाथ में कुम्भ लेकर उस स्थान की प्रदक्षिणा करके उस कुम्भ को उस स्थान पर स्थापित करें। तदोपरान्त नींव की खुदाई को कुम्भ के जल से भरकर, बड़े प्रेम से शान्तिपाठ का उच्चारण करें और इस प्रकार जल को वन्दन करके वास्तुदेव का विसर्जन करें। विदिक्षु दिक्षु खातानि प्राच्यादिषु प्रदक्षिणम्। तथा घटोदकैर्भृत्वा वन्दयेच्छान्तिपाठकैः॥ 15 ॥ इत्यन्तं तु समुद्दिष्टं वास्तुस्थानविसर्जनम्। इसी तरह विदिशाओं और दिशाओं के नींवों के खात को भी पूर्व दिशा से