अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें274 अपराजितपृच्छा प्रारम्भ करते हुए प्रदक्षिण क्रम से आगे करते जाए और घड़ों में जल भर-भरकर शान्ति पाठ के साथ वन्दन करते जाए। इस प्रकार वास्तुस्थान का विसर्जन बताया गया है। खात्पूर्वकशल्यादीनोद्धारनिर्देशं — शिलान्तं वा जलान्तं वा खात्वा शल्यं समुद्धरेत् ॥ 16 ॥ नींव की खुदाई करते समय ध्यान रखें कि उसकी खुदाई करते-करते या तो नीचे नींव में कठोर शिला आ जाए अथवा खुदाई करते भूमि में जल का स्रोत आ जाए, वहाँ तक उसे खोदते जाए। खोदते समय जो भी शल्य (अस्थि, केश, कोयला आदि) मिलते जाएँ उन्हें भी निकालते जाना चाहिए। जलान्तेषु यदा खातो गोविप्रौदक ? पालनम्। वास्तु पूजां ततः कृत्वा मध्ये कूर्मं तु स्थापयेत् ॥ 17 ॥ अब नींव के खात की भराई के बारे में कहा जा रहा है। जो नींव की खुदाई जलान्त अर्थात जल आ जाने तक की गई हो, वह उत्तम होती है और गो, ब्राह्मण को पालने वाली कही गई है। अस्तु, वास्तुपूजा करके उसके मध्य में कूर्म की स्थापना करनी चाहिए। तत्र कूर्मलक्षणं — हिरण्मयो भवेत्कूर्मो वास्तुविस्तारधारणः। उरोरत्नैर्नेत्ररत्नैः पृष्ठरत्नैश्च शोभितः ॥ 18 ॥ समुपेतैः सर्वगात्रै रौप्यपादोपशोभितः। एवं वै सूत्रितं सर्व रत्नकाञ्चनरूप्यकम् ॥ 19 ॥ तत्रैव स्थापिताः सूत्र पर्वता द्वीपसागराः। शिलाभिरिष्टिकाभिश्च ततः खातं प्रपूरयेत् ॥ 20 ॥ वह कूर्म सोने का बना हो। वह वास्तु के पूरे विस्तार को धारण करने वाला होता है। उस कूर्म की छाती पर, नेत्र पर, पीठ पर रत्न जड़े हुए शोभायुक्त हों। इसी तरह वे बताए गए सभी रत्नों से, सोने से और चाँदी से बने हुए पर्वत, सागर द्वीपादि भी वहाँ सूत्रधार, गजधर के द्वारा ठीक तरह से स्थापित किए जाने चाहिए। इस सबके बाद ही शिलाओं से और ईंटों से उस खात की भराई आरम्भ की जानी चाहिए। इष्टकाचयनं कृत्वा पूरयेच्च स्तरं स्तरम्। कपिशीर्षे च पाषाणे मृगश्श्राष्टाङ्गुला दहेत् ॥ 21 ॥