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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

सूत्र-५२ 273 भूपरिग्रहणे चैव वास्तुविद्याविशारदैः। वास्तुस्थानं पुरा ज्ञात्वा खनेच्चैवं प्रदक्षिणम्॥ 10 ॥ भूमि का परिग्रहण करते समय भी सभी वास्तुविद्या विशारद सूत्रधार, गजधरों को चाहिए कि वे उस वास्तु-स्थान की पहले की पुरानी जानकारी अच्छी तरह कर लें, उसके बाद ही उसकी प्रदक्षिणा करके खुदाई आरम्भ करें। मर्मवेधविचार – पिता माता च पुत्राश्च नाशं गच्छन्ति मस्तकै। पृष्ठे चात्मविनाशश्च देशत्यागश्च जायते॥ 11 ॥ क्योंकि, यदि पुरानी जानकारी न की जाए और उस वास्तु-स्थान में मर्मवेध रह जाए तो बड़ा अनर्थ हो जाता है। जैसे— मस्तक की ओर मर्मवेध रह जाए तो उस गृहपति के माता-पिता व पुत्रों का नाश हो जाता है तथा यदि पीठ की ओर मर्मवेध रह जाए तो स्वयं गृहस्वामी का ही नाश हो जाता है अथवा उसे देश त्याग करके जाना पड़ सकता है। स्त्रीस्वगोत्रविनाशश्च चतुःपादेषु वै क्रमात्। जायते धननाशश्च मर्मवेधे कृते सति॥ 12 ॥ और, इसी क्रम में स्त्री, स्वगोत्र बन्धुजन, चौपायों और धन का भी विनाश हो जाता है— यदि मर्म वेध बने रहे तो ऐसा फल जाने। शुभं पुत्रो धनं धान्यं ज्ञात्वा कुक्षिं यदा खनेत्। कृत्वा प्रदक्षिणं कुम्भं गृहीत्वा स्थापितं ततः॥ 13 ॥ कुक्षिं चातोदकैर्भृत्वा शान्तिमुच्चार्यशोभनाम्। तथोदकैर्वन्दनीयं वास्तुदेवं विसर्जयेत्॥ 14 ॥ इसलिए यदि पुत्र, धन, धान्यादि के लिए शुभ मुहूर्त निकलवाकर शुभ, मङ्गल जान लिया जाए तभी नींव-कुक्षी को खोदना चाहिए। इसके लिए हाथ में कुम्भ लेकर उस स्थान की प्रदक्षिणा करके उस कुम्भ को उस स्थान पर स्थापित करें। तदोपरान्त नींव की खुदाई को कुम्भ के जल से भरकर, बड़े प्रेम से शान्तिपाठ का उच्चारण करें और इस प्रकार जल को वन्दन करके वास्तुदेव का विसर्जन करें। विदिक्षु दिक्षु खातानि प्राच्यादिषु प्रदक्षिणम्। तथा घटोदकैर्भृत्वा वन्दयेच्छान्तिपाठकैः॥ 15 ॥ इत्यन्तं तु समुद्दिष्टं वास्तुस्थानविसर्जनम्। इसी तरह विदिशाओं और दिशाओं के नींवों के खात को भी पूर्व दिशा से

274 अपराजितपृच्छा प्रारम्भ करते हुए प्रदक्षिण क्रम से आगे करते जाए और घड़ों में जल भर-भरकर शान्ति पाठ के साथ वन्दन करते जाए। इस प्रकार वास्तुस्थान का विसर्जन बताया गया है। खात्पूर्वकशल्यादीनोद्धारनिर्देशं — शिलान्तं वा जलान्तं वा खात्वा शल्यं समुद्धरेत् ॥ 16 ॥ नींव की खुदाई करते समय ध्यान रखें कि उसकी खुदाई करते-करते या तो नीचे नींव में कठोर शिला आ जाए अथवा खुदाई करते भूमि में जल का स्रोत आ जाए, वहाँ तक उसे खोदते जाए। खोदते समय जो भी शल्य (अस्थि, केश, कोयला आदि) मिलते जाएँ उन्हें भी निकालते जाना चाहिए। जलान्तेषु यदा खातो गोविप्रौदक ? पालनम्। वास्तु पूजां ततः कृत्वा मध्ये कूर्मं तु स्थापयेत् ॥ 17 ॥ अब नींव के खात की भराई के बारे में कहा जा रहा है। जो नींव की खुदाई जलान्त अर्थात जल आ जाने तक की गई हो, वह उत्तम होती है और गो, ब्राह्मण को पालने वाली कही गई है। अस्तु, वास्तुपूजा करके उसके मध्य में कूर्म की स्थापना करनी चाहिए। तत्र कूर्मलक्षणं — हिरण्मयो भवेत्कूर्मो वास्तुविस्तारधारणः। उरोरत्नैर्नेत्ररत्नैः पृष्ठरत्नैश्च शोभितः ॥ 18 ॥ समुपेतैः सर्वगात्रै रौप्यपादोपशोभितः। एवं वै सूत्रितं सर्व रत्नकाञ्चनरूप्यकम् ॥ 19 ॥ तत्रैव स्थापिताः सूत्र पर्वता द्वीपसागराः। शिलाभिरिष्टिकाभिश्च ततः खातं प्रपूरयेत् ॥ 20 ॥ वह कूर्म सोने का बना हो। वह वास्तु के पूरे विस्तार को धारण करने वाला होता है। उस कूर्म की छाती पर, नेत्र पर, पीठ पर रत्न जड़े हुए शोभायुक्त हों। इसी तरह वे बताए गए सभी रत्नों से, सोने से और चाँदी से बने हुए पर्वत, सागर द्वीपादि भी वहाँ सूत्रधार, गजधर के द्वारा ठीक तरह से स्थापित किए जाने चाहिए। इस सबके बाद ही शिलाओं से और ईंटों से उस खात की भराई आरम्भ की जानी चाहिए। इष्टकाचयनं कृत्वा पूरयेच्च स्तरं स्तरम्। कपिशीर्षे च पाषाणे मृगश्श्राष्टाङ्गुला दहेत् ॥ 21 ॥

सूत्र-५२ 275 इस तरह नींव के खात मुहूर्त की समारोह पूर्वक भराई हो जाने पर जब नींव की ईंटों से चुनाई की जाए तो ध्यान रखें कि भित्ति की चुनाई की पूर्ति स्तरवार हो अर्थात् पूरी नींव की एक स्तर चुनाई हो जाए। उसके बाद ही उसके ऊपर के दूसरे स्तर की चुनाई करनी चाहिए। इस चुनाई कार्य में काम आने वाले पाषाणों का आकार कपिशीर्ष के समान (बन्दर के कपाल के बराबर) टुकड़ों में होना चाहिए और इनकी चुनाई करते समय जिस मिट्टी में इनकी चुनाई की जाए, उसका स्तर भी लगभग आठ अङ्गुल का हो और उस मिट्टी में ये पाषाण पूरी तरह से गच्छ करके चुने जाएँ ताकि कहीं से भी खाली स्थान नहीं रहे और वे पाषाण हिले-डुले नहीं। जलेन प्लावितास्ताश्च मुहूरस्या हनेत्ततः। पालाशस्वस्थसम्भूतैर्हनेत्ताः सुदृढं ततः ॥ २२ ॥ फिर, चुनी गई दीवार पर किनारी बनाकर उस पर जल भर दें ताकि दीवार पूरी तरह से तर रहे और बाद में उसे ठोस रूप देने के लिए मोहरी, घूँसे से कूटते जाए और इसके उपरान्त उस दीवार को पलाश (खाखरे) की स्वस्थ, हरी-भरी शाखाओं कामड़ियों से तड़ा-तड़ पीट-पीटकर सुदृढ़ बनाएँ। पादोनं पूरयेत्प्रान्तं तत्घनं च प्रदायिकम् ?। ह्रस्वं ह्रस्वं तु कर्तव्यं प्रासादस्य तलं तथा ॥ २३ ॥ प्रासाद के नींव के प्रान्त भाग को एक चतुर्थांश पूरा हो जाने पर उसे घन के द्वारा धीरे-धीरे कूटते जाना चाहिए जिससे प्रासाद का तल भाग पक्का, दृढ हो जाए। इत्यमनन्तर प्रासादस्य कूर्मलक्षणं — एक हस्ते तु प्रासादे कूर्मः स्याच्चतुरङ्गुलः। अर्धाङ्गुला भवेद्वृद्धिः प्रतिहस्तं दशावधि ॥ २४ ॥ (अब प्रासाद की नींव रचना के समय रखे जाने वाले कूर्म के बारे में पूरी जानकारी दी जा रही है) इस नियम को सदा ही ध्यान में रखें कि यदि प्रासाद की ऊँचाई 1 हाथ की अर्थात् एक गज (चौबीस अङ्गुल) हो, तो उसके प्रमाणानुसार कूर्म का आकार 4 अङ्गुल का होना चाहिए। इसके उपरान्त ज्यों-ज्यों प्रासाद की ऊँचाई की वृद्धि होती जाए, तो दश हाथ (दस गज) की वृद्धि तक प्रति हाथ (प्रति गज) के प्रमाण में कूर्म का प्रमाण भी आधा अङ्गुल बढ़ाते जाएँ। इस तरह एक हाथ से दस हाथ तक बढ़ते कूर्म का प्रमाण 4 अङ्गुल के बाद और साढ़े चार अङ्गुल बढ़ जाएगा अर्थात् दस हाथ के प्रासाद का कूर्म साढ़े आठ अङ्गुल का हो जाएगा।

276 अपराजितपृच्छा पादवृद्धिः पुनः कुर्याद्विंशतिहस्ततः करे। ऊर्ध्वं वै त्रिंशद्धस्तान्तं वसुहस्तैकमङ्गुलम् ॥ २५ ॥ इसके बाद, प्रासाद की ऊँचाई 11 से 20 हाथ (गज) तक बढ़ती जाए तो कूर्म का प्रमाण प्रति गज चतुर्थांश अङ्गुल की वृद्धि पाता जाए अर्थात् अगले दस हाथ, गज की ऊँचाई प्रासाद की बढ़ने पर कूर्म के प्रमाण में ढाई अङ्गुल और जुड़ जाएँगे और कूर्म का प्रमाण साढ़े आठ से बढ़कर 11 अङ्गुल हो जाएगा और 20 हाथ (गज) से 30 हाथ (गज) तक प्रासाद के बढ़ने तक हर आठवें गज पर एक अङ्गुल प्रमाण कूर्म में वृद्धि होगी। ततः परं शतार्द्धान्तं सूर्यहस्तैकमङ्गुलम्। अनेन क्रमयोगेन मन्वङ्गुलं₁₄ शतार्धके ॥ २६ ॥ इससे भी ऊपर, यदि प्रासाद 31 हाथ से 50 हाथ (गज) की ऊँचाई तक बढ़े तो कूर्म का प्रमाण प्रति 12 हाथ (गज) पर मात्र एक अङ्गुल प्रमाण ही बढ़ेगा। एक तरह से इस क्रम योग से 50 हाथ तक के प्रासाद के लिए कूर्म का प्रमाण 14 अङ्गुल का होगा। कनिष्ठादित्रिविधकूर्मप्रमाणं — कनिष्ठं पादहीनं च ज्येष्ठं पादाधिकं तथा। साधारणमिदं मानं त्रिविधं कूर्ममानतः ॥ २७ ॥ इस तरह कूर्म के मान-प्रमाण को देखें तो 14 अङ्गुल में चतुर्थांश अङ्गुल की कमी वाला कूर्म कनिष्ठ माना जाएगा, 14 अङ्गुल से एक चतुर्थांश अङ्गुल अधिक वाला कूर्म ज्येष्ठ माना जाएगा और 14 अङ्गुलमान का कूर्म प्रमाण साधारण माना जाएगा। इस तरह कूर्म का यह तीन तरह का मान प्रमाण बताया गया है। धात्वानुसारेंणकूर्मफलं — हैमो रौप्यश्च कर्त्तव्यः सर्वपापप्रणाशनः। इत्थं कूर्म यः करोति सर्वयज्ञफलं भजेत् ॥ २८ ॥ अब विविध धातुओं से बनने वाले कूर्मों के फल बताते है। सोने और चाँदी से बने हुए कूर्म सभी प्रकार के कोपों का शमन करते हैं। जो व्यक्ति ऐसे सोने-चाँदी के कूर्म बनवाते हैं, उनको सभी प्रकार के यज्ञों का फल मिल जाता है। स्नानं पञ्चामृतैः कार्यं कूर्मस्य च यथाविधि। अर्चयित्वा प्रयत्नेन धूपयित्वा सुगन्धिना ॥ २९ ॥

सूत्र-५३ 277 तिलैर्यवैस्तथा होमं कुर्यात् पूर्णाहूतिं तथा। निवेशयेदिमं कूर्मं वेद-वादित्र-मङ्गलैः ॥ ३० ॥ ऐसे बने हुए कूर्म को यथाविधि पञ्चामृतादि से स्नान कराएँ और प्रयत्नपूर्वक अर्चना करके सुगन्धित द्रव्यों से धूप दें। फिर, तिलों से, यवों से होम करके बाजे- गाजे के साथ वेदपाठ (स्वस्तिवाचन¹), मङ्गलगान करते हुए पूर्णाहूति देने के साथ ही कूर्म को भी वहाँ निवेश करवाना चाहिए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां कूर्मप्रमाणपदप्रतिष्ठाधिकारो नाम द्विपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५२ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में कूर्मप्रमाण पद प्रतिष्ठा अधिकार नामक बावनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ५२ ॥ देवासुरसङ्ग्रामादिवास्तूद्भवो नाम त्रिपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५३ ॥ अथ पुराख्यानं कथ्यते — गन्धमादनपृष्ठेऽथ शैलराजमहोत्सवे । सुरविद्याधरै रम्भे ऋषिसङ्घसमाकुले ॥ १ ॥ सिद्धचारणसङ्गीते ह्यप्सरोगणसेविते । दिग्विदिग्वासिभीरम्ये सरिताद्वयसङ्गमे ॥ २ ॥ पूर्वकाल में गन्धमादन पर्वत पर देवताओं, विद्याधरों तथा ऋषि सङ्घों की भीड़-भाड़ में आयोजित होने वाले सुन्दर 'शैलराज महोत्सव' में सिद्ध चारणों के सङ्गीत और अप्सराओं के नृत्य-गान से सेवित दिग्दिगन्त के निवासी वहाँ प्रवहमान

  1. मयादि शास्त्रों में भी भूपरिग्रहावसर पर वेदपाठ या स्वस्तिवाचन करते हुए मङ्गल स्वरोच्चार करने पर जोर दिया है। भूमिपूजन के लिए शास्त्रों में निम्न मन्त्र आता है— समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले । विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पुण्यकर्म समारभे ॥ स्वस्तिवाचन वैदिक परम्परा है। अनेकत्र स्वस्त्ययन का निर्देश मिलता है। यह पाठ इस प्रकार किया जाना चाहिए— 'ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्ताक्ष्यों अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभं यावानो विदथेषु जग्मयः। अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसागमन्निहः ॥ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳ सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायूः ॥ शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्। पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥ अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः। विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितर्जातमदितिर्जनित्वम् ॥ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षꣳ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्ति। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्ति सर्वꣳ शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ॥ यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु। नं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः॥' सुशान्तिर्भवतु ॥ (यजु. वाजसनेयी. 25,6-12)

278 अपराजितपृच्छा सुन्दर, दोनों सरिताओं के सङ्गम स्थान में एकत्र हुए थे। तत्रस्थं च सुखासीनं विश्वकर्ममहीजसम्। वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम् ॥ ३ ॥ शिरसा प्रणिपत्याथ जानुभ्यां धरणीगतः । दण्डवच्चाग्रतो भूत्वा पप्रच्छ त्वपराजितः ॥ ४ ॥ उसी काल में वहाँ पर वेद वेदाङ्ग के तत्त्व को जानने वाले और सभी शास्त्रों के विशारद महान् तेजस्वी भगवान् विश्वकर्मा सुख से विराजमान थे। उनको अपराजित ने दण्डवत प्रणाम किया, धरती पर अपने घुटने टेककर प्राणपत्य होकर, सिर झुकाकर प्रणिपात् होकर प्रश्न किया। अपराजित उवाच – कथं वास्तु समुत्पन्नं निर्मितं वा कुतः कदा। वास्तोरुत्पत्तिस्तात देवादेश्च निघण्डुकम् ॥ ५ ॥ एकपादादिकं वास्तु यावत्पदसहस्रगम्। मर्मोपमर्मवंशांश्च रेखासन्धिसुरादिकम् ॥ ६ ॥ अपराजित बोले— हे तात! यह वास्तु कैसे समुत्पन्न हुआ, कब और कहाँ निर्मित हुआ, वास्तु की उत्पत्ति, उसके सम्बन्धित निघण्टु (कोश) आदि के बारे में हे देव! आदि से बताएँ। एकपद से आरम्भ होकर जब तक एकसहस्र पद तक जाएँ उतने वास्तु के पद, मर्म, वंश, रेखा, सन्धि और सुरादिकों के विषय में भी कहें। बलिकर्मविधिं चैव वास्तुपादनिवासिनाम्। एतत्सर्वं प्रयत्नेन कथयस्व जगत्पते ॥ ७ ॥ हे जगत्पते ! इसी प्रकार बलिकर्म विधि, वास्तु पदानुसार विन्यसित होने वाले सभी दैवतगणों के बारे में भी प्रयत्नपूर्वक मुझ पर कृपा करके कहिए। देवासुरमहाघोरसङ्ग्रामवर्णनं विश्वकर्मोवाच — शृणु वत्स महाप्राज्ञ यत्त्वया परिपृच्छितम्। कथयामि न सन्देहो वास्तोरुत्पत्तिलक्षणम् ॥ ८ ॥ विश्वकर्मा बोले कि हे वत्स! महाप्राज्ञ जो कुछ तुमने पूछा है उसे कहता हूँ जिसे सुनो जिससे वास्तु की उत्पत्ति के लक्षणों के बारे में कोई सन्देह न रहे। पूर्वं देवासुरे युद्धे महाघोरे सुदारुणे। सङ्घट्टे नरसङ्कीर्णे श्रोणीगात्रेः परस्परम् ॥ ९ ॥

सूत्र-५३ 279 पूर्वकाल की बात है। महाघोर व सुदारुण रूप देव और असुरों में युद्ध छिड़ा। वहाँ मनुष्यों के बड़े-बड़े सङ्घट्टों की भीड़-भाड़ हुई जिसमें सभी परस्पर युद्ध में रत होने से अपने शरीरों को रक्त से लथपथ किए हुए थे। महारौद्रैः कटाक्षैश्च शस्त्रघातैः परस्परम्। महाबलोत्कटा वीराः सङ्ग्रामे हेतिकाङ्क्षिणः ॥ 10 ॥ वे महान् रौद्र रूप में, कटाक्षपूर्वक एक दूसरे पर बारम्बार शस्त्राघात कर रहे थे। वे महान् उत्कट वीर थे और संग्राम में एक दूसरे को जीतने की आकांक्षा लिए हुए थे। निर्जिताश्च ततो देवा दैत्येन्द्राः प्रबलाः स्थिताः। तथा किलकिलायन्ति पूर्वदेवात्मसम्भवाः ॥ 11 ॥ उस युद्ध में दैत्येन्द्रगण प्रबल पड़ते थे और देवतागण हार गये थे। पूर्वदेवा अर्थात् दैत्यगण अपनी जीत की खुशी में किल-किली मारते हुए उछल रहे थे। भूमिकम्पं प्रकुर्वन्ति ह्यचाल्याः पर्वता इव। अनन्तरं सुरा इन्द्रो मन्त्रयित्वा परस्परम् ॥ 12 ॥ इससे इतना भूमिकम्प हुआ कि मानो पर्वत ही चलायमान हो गए हैं। इसके बाद, देवराज इन्द्र ने देवताओं को आमन्त्रित किया और परस्पर विचार-विनिमय किया। ततः स्मृत्वात्मशक्तीश्च ज्ञानदेहसमुद्भवाः। त्रयस्त्रिंशत्कोटयश्च सुरास्ते च महोत्कटाः ॥ 13 ॥ इन्द्र ने यह कहकर उन सभी देवताओं में बड़े उत्साह से उनमें अपनी ज्ञान देह से समुद्भव होने वाली आत्मशक्ति की स्मृति जगाई कि 'हे देवगणो! यह न भूलो कि तुम तैंतीस कोटि संख्या के महोत्कट योद्धा हो जिस पर सुरों को गर्व है। पुनरायेज्यसङ्ग्रामं दैत्येन्द्रैश्च परस्परम्। सकोपाश्चैव सङ्ग्रामे सुरासुरमहोत्कटाः ॥ 14 ॥ इसलिए निराश मत हो वो और पुनः संग्राम का आयोजन करें।' और, दैत्येन्द्रों से परस्पर सकोप संग्राम करके सभी सुर-असुर इस महोत्कट युद्ध में कूद पड़े। निर्जिता असुरा युद्धे देवाश्च प्रबलाः स्थिताः। तदाव्याप धरास्वेवं सुरराज्यं महोत्सवम् ॥ 15 ॥ इस तरह उत्साहवर्धन से देवताओं की स्थिति प्रबलतर हो गई और असुरगण उस युद्ध में हार गए। तभी से इस धरा पर यह 'सुरराज्य महोत्सव' गन्धमादन पर्वत पर मनाया जाता रहा है।

280 अपराजितपृच्छा शैलेन्द्रात् दैत्येन्द्रागमनं — अनन्तरं महाभूता दैत्याश्चैव महोत्कटाः । (अ)वतरिताः शैलेन्द्रेषु दैत्येन्द्राश्च महोत्कटाः ॥ 16 ॥ इसके अनन्तर, महाभूता विशालकाय प्राणियों के रूप में महान्, उत्कट विकराल दैत्यगण उस पर्वतराज शैलेन्द्र से अवतरित होकर महोत्कट दैत्येन्द्र आए। शैलरूपैश्च सम्भूय सपक्षाः क्रोधपर्वताः । तथा पतन्त्युत्पतन्ति यत्र भूर्जनसङ्कुला ॥ 17 ॥ वह सभी पहाड़ों के रूप धारण किए हुए थे और उनके पङ्ख थे जिनसे ये पर्वत क्रोध करके उड़ते रहते और जहाँ कहीं भी भूमि पर लोगों की भीड़ या समूह होता उन पर बार-बार घड़ाघड़ गिर पड़ते। निर्दहन्ति धराधार्य खेटग्रामपुरादिकम्। नरोरगसुरेन्द्राश्च पर्वतैर्भस्मसात्कृताः ॥ 18 ॥ और, इस तरह भूमि का आधार ही आग से जला देते जिससे खेट, ग्राम, पुर आदि सभी आ जाते और उन स्थानों में रहने वाले नर, उरग और सुरेन्द्र आदि उन पर्वतों से चकनाचूर हो जाते और भस्मसात् हो जाते। ततो देवादिकाः सर्वे मरुत्वत्पुरमाश्रिताः । व्यज्ञापयन् सहस्त्राक्षं धराधरविनाशिनम् ॥ 19 ॥ इससे समस्त देवादिकों ने मरुतवत पुरमाश्रित होकर अर्थात् हवा की-सी शीघ्रता का आश्रय लेकर हजार आँखों वाले इन्द्रदेव को जाकर निवेदन किया कि ये धराधर अर्थात् पहाड़ विनाश करने पर उतारु हो गए हैं, उनसे हमें प्राण दिलाएँ। क्रोधादिन्द्रेण वज्रेण स्थापिता भुवि पर्वताः । छेदिताश्च ततः पक्षा अचला यत्र संस्थिताः ॥ 20 ॥ इन्द्र ने क्रोधावेश में आकर इन पर्वतों पर वज्र से प्रहार किया और उनके पङ्खों को काट गिराया जिससे वे इधर-उधर उड़कर उत्पात नहीं मचा सके और उन्हें जहाँ के तहाँ अचल होकर रहना पड़ा।¹ गङ्गायमुनयोर्मध्ये प्रारब्धो यज्ञ उत्तमः । निर्जिताश्च सुरैर्यज्ञरक्षा वज्रायुधैः कृता ॥ 21 ॥

  1. इन्द्र द्वारा पर्वतों का संहार करने का वर्णन ऋग्वेद और श्रीमद्भागवतपुराण में आया है। देवराज इन्द्र का नाम शक्र इसलिए पड़ा।

सूत्र-५३ 281 पर्वतों के पङ्ख काटकर उन्हें अचल करने का यह यज्ञ गङ्गा-यमुना नदियों के मध्य के भूभाग में आरम्भ हुआ था¹ जिसमें वज्रायुध के प्रयोग से सुरों ने यज्ञ की रक्षा की और दैत्यों को जीता। असुराश्च ततः सर्वे चिन्तातुरतया स्थिताः । नैर्ऋत्ये कुण्डसम्भूतं ²भार्गवोरुशक्त्यात्मकम् ॥ २२ ॥ दैत्यों और असुरगण भी सभी चिन्तातुर होकर नैर्ऋत्य कुण्ड से सम्भूत होने वाले उशना पुत्र भार्गव की शरण में गए। दुर्जयं दुर्निरीक्ष्यं च महोघोरं सुदारुणम्। स्फुरन्तं विद्रुमाकारं लोचनैरग्निसन्निभैः ॥ २३ ॥ उन असुरों की पुकार और दुर्जय दुर्निरीक्षा अर्थात् देवताओं को जीतना कठिन देखकर भार्गव को महाघोर क्रोधावेश हुआ। वह महादारूण, भयानक रूप में फुफकारने लगे और अपनी आँखों में क्रोधाग्नि से मानो लाल चिनगारियाँ-सी निकालने में लगे। हुताशनगर्भसम्भूतं प्रलयान्तसमप्रभम् । स्फुरत्स्फुलिङ्गं ज्वलन्तं दुर्निरीक्ष्यं भयप्रदम् ॥ २४ ॥ उस समय उनका यह भयप्रद रूप ऐसा लग रहा था मानो अग्नि के गर्भ से ही प्रलयाग्नि के समान प्रभावाली जलती मशाल से उठती हुई स्फुलिंगों, चिनगारियाँ को देखना भयभीत होने का कारण बनता है। त्रिनेत्रं विकृतं रौद्रं जटिलं वाललोहितम्। दंष्ट्राकरालमत्युग्रं मुखे दावाग्निसन्निभम् ॥ २५ ॥ उस समय भार्गव का विकराल रूप, त्रिनेत्र, संहारक शिव के त्रिनेत्रों के समान रौद्र और जटिल तेज लाल वर्ण वाला होकर अति उग्र कराल दाँतों-दाढ़ों वाला था और मुख से दावाग्नि की ज्वालाएँ निकलती थीं। कृतान्ततुल्यं दशनैश्चण्डोष्ठकपुटान्तरे। भूतलान्ते तलं तस्य आलोके बाहुपञ्जरम् ॥ २६ ॥ उनके दाँत यमराज की दाढ़ों की भाँति भयानक थे जो होठों की विशालता में और भी भयानक लग रहे थे। उनकी काया इतनी विशाल हो गई थी कि उनके पाँव

  1. गङ्गा-यमुना के मध्य में यज्ञ होने की अवधारणा शतपथ ब्राह्मण सम्मत है। कभी इस क्षेत्र में बहुत-से पेड़ थे जिनका संहारकर भूमि को यज्ञकर्म योग्य बनाया गया था।
  2. 'भार्गवा रूशनात्मकं' पाठ स्यात्। 'भागीवेषु शक्त्यात्मकम्' मिति 'न' पाठः।

८७८ अपराजितपृच्छा के तलवे भूमि के पाताल तक और उनके हाथों और शरीर का पञ्जर आसमान को स्पर्श करता-सा लग रहा था, जो तीनों लोकों तक फैल गया। स्कन्धग्रीवाकरा व्योम्नि ब्रह्माण्डे च गतं शिरः । तेजोरूपं स्फुरन्तं च प्रलये भैरवं यथा ॥ २७ ॥ उनका कन्धा, ग्रीवा और हाथ आसमान को छू रहे थे और उनका सिर ब्रह्माण्ड की ऊँचाई तक जा लगा था और उनका तेजोमय रूप ऐसा विकराल चमक रहा था जैसे प्रलयकाल में भैरव का विकराल तेजोमय रूप हो। निनदन्तं महाभीमं मन्ये कल्पान्तगर्जितम् । त्रस्तास्तु देवताः सर्वा रूपं दृष्ट्वा सुदारुणम् ॥ २८ ॥ उनकी आवाज इतनी घोर निनादयुक्त थी मानो महाभीम कल्पान्त की गर्जना हो रही हो। इस तरह का बहुत दारुण रूप देखकर भार्गव से सभी देवता त्रस्त या भयभीत हो गए थे। ध्यानयुक्ताश्च चलिताः भयभीता महोरगाः । दिक्पाला लोकपालाश्च प्रणश्यन्ति महासुराः ॥ २९ ॥ जो सदा ध्यान युक्त रहते थे, वे भी इस भय से विचलित हो गए थे और जो महान् उरग थे वे भी भयभीत थे। दिक्पालगण, लोकपालगण आदि समस्त महान् सुर देवता भय से मरणासन्न थे। ब्रह्मराक्षसवैताला आश्रयन्ति महेश्वरम् । आदित्याद्या ग्रहाः सर्वे आश्रयन्ति जनार्दनम् ॥ ३० ॥ इस बीच, ब्रह्मराक्षस और वैतालादि भय के मारे भगवान शिव के आश्रय में जा बैठे और आदित्यादि सभी ग्रह भी भयातुर होकर जनार्दन भगवान् विष्णु की शरण में चले गए। देवराजः सुरैर्युक्तः समुपास्ते जगत्पतिम् । दुर्निरीक्ष्यं दुराराध्यं कालानलसमप्रभम् ॥ ३१ ॥ तं दृष्ट्वादूतरूपं च विरञ्चिरपि विस्मितः । इसी प्रकार देवराज इन्द्र भी सभी देवताओं के साथ जगत्पिता ब्रह्मा की पर्युपासना में लग गए। ऐसे दुर्निरीक्ष्य भयानक और दुराराध्य महाकालाग्नि के समान, अद्भुत रूप को देखकर विरञ्चि भगवान् ब्रह्मा भी विस्मित हो गए थे। दुर्जयं दुर्निरीक्ष्यं च महोघोरं सुदारुणम् ॥ ३२ ॥ स्फुरन्तं विद्युदाकारं लोचनैरपि सन्निभः ।

सूत्र-५३ 283 भूः क्रान्ता पादतलतो ब्रह्मलोकं गतं शिरः ॥ ३३ ॥ वे सोचने लगे कि यह दुर्जय और दुर्निरीक्ष्य, महाघोर दारुण भयानक रूप, जो बिजली के समान चमकते व कड़कते नेत्रों वाला है और इसका पदतल भूमि से भी क्रान्त, अतिक्रमण कर रहा है और सिर ब्रह्मलोक तक जा पहुँचा है। तस्य रूपभयाद्भीताः त्रिदशासुरराक्षसाः । नष्टाश्च ऋत्विजो ब्रह्मा शक्राद्या द्वारपालकाः ॥ ३४ ॥ उसके ऐसे रूप से सभी देवता, राक्षस और असुरगण भी भयभीत है और सभी ऋत्विजगण, ब्रह्मा, इन्द्रादि सभी द्वारपाल नष्ट प्रायः हो गए। तत्र देवा द्विजा राजा आश्रयन्ति महेश्वरम् । 'रक्ष रक्ष महादेव-भयभीतान् जगत्प्रभो ॥ ३५ ॥ यह सब विचित्रता देखकर सभी द्विज और राजा भी भगवान् महेश्वर के आश्रय में जा पहुँचे और पुकार करने लगे कि हे महादेव ! जगत्प्रभो ! ! हम भयभीत लोगों की रक्षा कीजिए। महद्भूतं मर्त्यलोके यज्ञे च रिपुक्रोधजम् । सुरराजद्विजानां च भूमौ रक्षाकरो भवान् ॥ ३६ ॥ (सभी ने कहा कि) हे प्रभु ! मृत्युलोक में यज्ञों में महान् क्रोध से रिपु द्वारा महान् सङ्कट उत्पन्न कर दिया गया है। अस्तु, सुरराज इन्द्र और ब्राह्मणों की तथा इस भूमि की आप रक्षा कीजिए। प्रत्यक्षं भव ईशान सुरार्थे द्विजभूपते । महद्भूतं महादेवं दैत्यानां दहनं परम् ॥ ३७ ॥ हे ईशान ! महादेव शिव !! कृपा करके आप देवताओं, ब्राह्मणों और भूपति राजाओं के लिए प्रत्यक्ष प्रकट होकर हे महद्भूत महादेव ! आप दैत्यों का पूर्ण दहन कर दीजिएगा। ललाटनेत्रसङ्क्रुद्धं कालरूपमिवापरम् । वलोकितो भवो भद्रे असाध्ये वृद्धताङ्गतः ॥ ३८ ॥ आपके ललाट के तीसरे नेत्र के संक्रुद्ध होने पर तो महाकालरूप से भी परम भयानक दृष्टि के सामने असाध्य भी भद्र होकर वृद्धि को प्राप्त करने लगते हैं। मूलकल्पोद्भवं यत्र निग्राह्यमस्तकोभवम् ।' वलोकितं तदा चक्रं त्रिषु लोकेषु मध्यतः । लीयते शिवदेहे तु यत्र स्यात्सुरसम्भवः ॥ ३९ ॥

284 अपराजितपृच्छा

मूलकल्प से उत्पन्न इस आपत्ति को निग्रह करके उसको अस्तगत कर दीजिए। तब तीनों लोकों के मध्य में इस चक्र को देखकर भगवान् शिव ने अपनी शिवदेह में लीनकर लिया और तब से देवताओं का जीवन पुनः सम्भव हो सका।¹ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां देवासुरसंग्रामादिवास्तूद्भवाधिकारो नाम त्रिपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५३ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में देवासुरसंग्रामादि वास्तु उद्भव अधिकार नामक तिरपनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ५३ ॥

वास्तूत्पत्तिर्नाम चतुःपञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ ५४ ॥ रुद्र उवाच — भो भार्गव महावीर कस्मात्स्थानादुपागतः । कृतं त्वया त्वद्भुतं हि धराधर्मविनाशनम् ॥ १ ॥ (पूर्व सूत्रानुसार) रुद्र बोले कि हे भार्गव महावीर! आप कहाँ से आए हैं और आपके द्वारा किया गया यह धराधर्म का विनाश कार्य भी बहुत ही अद्भुत है।


  1. एष वास्तुपुरुषकथावस्तुसङ्क्षेपः— पुरा किल देवासुरे युद्धे विष्णुसाह्येन पराजितानां स्वशिष्याणां विजयाय सलक्षणम् छागमभिचारविधानेन जुह्वतः शुक्रस्य स्वेदाम्भःकणिकायामग्नौ पतितायां तत एको महासुरोऽतिभीषणाकारः समुदभूत्। छागाननत्वाच्छागासुर इति प्रख्यातः स चासुरसम्राट स्वपितुः शुक्रस्याज्ञया देवान् भुजबलेन विद्राव्य तदाश्रयाणां लोकानामपि महत् कदनमुपजनयन्नवर्तत। अथ शुक्रतपःप्रभावात् क्षणे-क्षणे वर्धिष्णुनामुना वीर्योत्सिक्तेन महासुरेण बहु कदर्शिता देवाः कालपर्यायात् किञ्चिदपि प्रतिकर्तुमपारयन्तो दुष्टदमनदीक्षितं भगवन्तं त्रिपुरान्तकं शरणमापुः। ततः स्वभक्तेभ्यो द्रुह्यतेऽस्मै क्रूराय क्रुध्यन् कृपानिधिर्महादेवोऽस्य प्रशमनाय स्वतृतीयनेत्रात् सर्वसंहारक्षमं प्रलयानलमुत्थाप्य तमभि प्राहिणोत्। ज्वालामालया व्याप्तदिगन्तराले तस्मिंश्च कालानले त्रिलोकीं भ्रमन्तमपि तमभिद्रुत्य दग्धुमुपस्थिते स छागासुरो भीतभीतः प्रशान्तमनाः शरणकामनया तनीयसीं तनुमाश्रित्य महेश्वरस्योदरं प्रविवेश। तेन तुष्टो भगवानप्यस्मै अभयं प्रदाय शुक्लरूपेण स्वोदरात् तं निर्गन्तुमाज्ञापयत्। तथा निर्गतत्वात् तदाप्रभृति शुक्र इति प्रथितः स भगवन्तं दण्डवत् प्रणत एव सन् क्षोणीतले वस्तुं, स्वशरीरे ब्रह्मादिका नवस्थापयितुं च वरमयाचत। तदनुसारेण भगवानपि— 'वस्तुं वरं त्वया। वृतोऽहं यत् ततो नाम्ना वास्तुकोऽसि तथास्तु ते। वसन्तु च त्वयि प्रीताः शतानन्दादिदेवताः ॥ अद्यप्रभृति भूलोके दैवं वान्यच्च मानुषम्। कुर्वते वास्तु वासार्थं प्रथमं त्वां यजन्तु ते॥ पुष्पैश्च धूपदीपैश्च बलिभिश्च विलक्षणैः। त्वं च त्वद्देहसंस्थाश्च पूज्याः स्युर्देवताः क्रमात्॥ एवं मयैव विहितं कुर्वतां वास्तुपूजनम्। तदायतनवेश्मादौ वसतां सन्तु सम्पदः ॥ अकृत्वा वास्तुयजनं प्रासादभवनादिकम्। कृतं तदासुरं सर्वं भूयात् तत्र च यत् कृतम् ॥' (ईशानशिवगुरुदेवपद्धति क्रियापाद, उत्तरार्ध 26, 117-123) इति तस्मै वरं दत्तवान्। तच्छरीरे वस्तुं देवान् न्ययोजयच्च। तेन स महेशं प्रणत एवाद्यापि क्षोणीतले शेत इति। एषा च कथा शैवसम्प्रदायप्रवृत्तानां गुरुदेवादीनां मतमनुसृत्य विवृता।

सूत्र-५४ 285 सामर्थ्यतो विसृजता पुरुषं यज्ञध्वंसकम्। इन्द्राद्या असुरपार्श्वे निग्राह्य इति निश्चयात् ॥ २॥ इस यज्ञध्वंश कार्य को पुनः सुधारने में समर्थ जो इन्द्रादि देव और असुरगण हैं, वे भी तुम्हारे पास में निश्चय ही निग्राहावस्था या कैदी तुल्य हो चुके हैं। शुक्र उवाच - पुरा चाऽऽराधितो दिव्यं वर्षसहस्रकम्। तदाज्ञया मया लभ्या विद्यामरत्वदायिनी ॥ ३॥ इन्द्र ने कहा कि पूर्वकाल में जिस देवता की मैंने सहस्र दिव्य वर्ष तक आराधना की थी, उसी की आज्ञा से मुझे अमरत्वदायिनी विद्या का लाभ हुआ है।¹ रुद्र उवाच - दिव्यं वर्षसहस्रं च तपः कृत्वा सुदारुणम्। तोषितोऽहं तथा विष्णुः शुक्रेण मुनिना त्वया ॥ ४॥ रुद्र ने कहा कि हजारों दिव्य वर्षों तक का जो इतना कठोर तप है, शुक्र मुनि आपके द्वारा किया गया है। उससे मैं और भगवान विष्णु भी बहुत ही सन्तुष्ट और प्रसन्न हुए हैं। त्वया लिङ्गोद्भवे² व्योम्नि तुष्टो देवो जगत्पतिः । ध्यानं मन्त्रजपं कृत्वा प्रीणय त्वं परेश्वरम् ॥ ५॥ तुम्हारे द्वारा व्योम तक उद्भव को प्राप्त लिङ्ग स्वरूप जगत्पति देव तुष्ट हुए हैं और ध्यान तथा मन्त्र जाप करके तुमने परमेश्वर की प्रसन्नता प्राप्त की है। प्रासादान्मान्त्रिकी विद्या सप्ताक्षर्यथ संहिता। तुष्टेन कथिता विद्या सर्वकर्मानुसारिणी ॥ ६ ॥ और, उस प्रसन्नता के फलस्वरूप ही तुम्हें यह 'प्रासादमान्त्रिकी विद्या' और 'सप्ताश्चर्य संहिता' मिली है। यह 'सर्वकर्मानुसारिणी विद्या' भी उनकी प्रसन्नता से, तुष्टि मिलने के कारण ही तुम्हें कही गई है। साधयामि यत्कृते च सर्वदेवभयङ्करम्। मन्त्रैः स्तुत्या च युद्धैश्च दायं दास्यन्ति देवताः ॥ ७॥

  1. इत्यमनन्तर 'सदा च भवतुष्टित वेष्ट्य तदधासुरासुरैध। आज्ञालोपं भव प्रभो तवशास्त्रमयोच्छेद। उदकस्या प्रीतप्रियते अग्रिमध्ये समुत्पन्नां आबाधादेवदानवैः ॥' इत्यादयो... 'न' पाठः ।
  2. 'जरा ? लिङ्गोद्भवे' इति प्रकाशित पाठः । न पाठे नोपलब्धते ।

286 अपराजितपृच्छा परन्तु, हे सर्वभयङ्कर देव! मैं तुम्हारे द्वारा किए गए विनाश को सुधारने हेतु मन्त्रों द्वारा तुम्हारी स्तुति की साधना करके अथवा तुमसे साक्षात् युद्ध करके देवताओं का दायभाग उन्हें वापस दिलाऊँगा। अहो ये मुनः सर्वे रुद्रेशं पुरुषोत्तमम्। उपाश्रयन्ति देवेशं भयं जयन्ति निर्जराः ॥ 8 ॥ देखो, ये सभी मुनिगण भी भय से परास्त होकर पुरुषोत्तम भगवान् रुद्र देवेश के उपाश्रय में आ गए हैं। पद्मासन शृणु त्वं च विष्णुर्वचनमब्रवीत्। न त्वया वध्यते साधो अस्माभिर्न च दैवतैः ॥ 9 ॥ तब भगवान् शिव की युद्ध से या आराधना से शुक्राचार्य को जीतने की यह प्रतिज्ञा सुनकर भगवान् विष्णु ने इन वचनों को कहा- 'हे पद्मासनस्थ, आप यह ध्यान देकर सुने कि न तो यह साधु शुक्राचार्य तुमसे वध को प्राप्त हो सकते हैं न मुझसे और न ही अन्य देवताओं से इनका वध हो सकता है। मन्त्रमूर्तिरियं वास्तू रुद्रदेहसमुद्भवः। इदं तु वास्तुरूपं च दुर्धरं च पुनः शिवात् ॥ 10 ॥ 'क्योंकि, ये स्वयं मन्त्रमूर्ति रूप में वास्तु है, जो रुद्र भगवान् शिव की देह से समुद्भूत हुए हैं। इसलिए अब तो ये वास्तु रूप होकर स्वयं भगवान् शिव से भी पुनः अधिक दुर्धर, असाध्य और अजेय हो गए हैं। अतः शिव भी इन्हें नहीं जीत सकते।' इदं च वचन श्रुत्वा पद्मभूः पुरुषोत्तमात्। शरणं वद देवानां विष्णुरद्भुतविक्रमः ॥ 11 ॥ भगवान् विष्णु के ये वचन सुनकर पद्मभूः ब्रह्मा ने देवताओं को कहा कि अब तो तुम सब अद्भुत विक्रमी भगवान् विष्णु की ही शरण में जाओ। रुद्रलोके ततो गत्वा ध्यात्वा देवं महेश्वरम्। अद्भुतं भूतमभ्यर्च्य भूतं दृष्ट्वा च भूतले ॥ 12 ॥ तब वे सभी देवगण रुद्रलोक में पहुँचकर भगवान् महेश्वर का ध्यान करने लगे और भूतल पर भूतों को देखकर सब से अद्भुत भूत भगवान् रुद्र की अभ्यर्थना करने लगे। यदा सत्त्वं भवेद् ज्ञानं ¹भवेत्तुष्टिभवोऽवृथा। तदा सुरासुरैर्वन्ध्य आज्ञालोपो भवेत्प्रभोः ॥ 13 ॥

  1. 'भवेत्तुष्टिर्भवो ? वृथा' प्रकाशित पाठः।

सूत्र-५४ 287 वे कहने लगे कि हे प्रभु! यदि आप हम पर तुष्ट हो गए हो तो कृपा करके आप सत्य रूप में प्रकट होकर हमें ऐसा ज्ञान दें, जो अवृथा हो, अचूक हो। तभी सुर और असुरों के द्वारा वध्य होने की आज्ञा का लोप हो सकता है। शास्त्रच्छेदो न च भवेत् म्रियते न तथोदके। अग्निदेवात्समुत्पन्नो ह्यवन्ध्यो देवदानवैः ॥ 14 ॥ तब न तो कोई शस्त्र से छेदन या मारण होगा न ही जल में डुबोकर मारना सम्भव होगा क्योंकि अग्निदेव से समुत्पन्न होने से देव-दानव सभी से अवध्य ही है। ईश्वर उवाच — शृणु भार्गव दैत्येन्द्र विद्याप्रस्तारनिर्णयम्। त्रिषु स्थानेषु प्रस्तार्य्य गुरुस्थाने नियोजितः ॥ 15 ॥ ईश्वर ने कहा कि हे भार्गव दैत्येन्द्र सुनो ! हमारा विद्या प्रस्तार निर्णय यह है कि तीन स्थानों में प्रस्तार करके हम तुम्हें गुरु स्थान में नियोजित करते हैं। अविद्यागुरुलब्धाऽङ्गदोषपापानुसङ्ग्रहे। ज्ञानोन्मीलनं तद्भक्त्वा विद्यासिद्धिश्च वृद्धतः ॥ 16 ॥ अविद्यागुरु, लोभी-अङ्गदोषी और पाप की कमाई से संग्रह करने वाले इन तीन प्रकार के गुरुओं से ज्ञान उन्मीलन होगा तब तुम्हारी भक्ति से विद्यासिद्धि भी बढ़ेगी।

288 अपराजितपृच्छा पुण्य प्रतिष्ठावसर सात प्रकार के हैं¹ और शान्तिकर्म भी चौदह प्रकार के हैं² अस्तु, समस्त पुण्यस्थानों में इस विद्या की भी पूजा होनी चाहिए। एषां वृद्धिं च सन्त्यज्य ? ततो यान्ति स सूक्ष्मतः ? । ब्रह्माद्याश्च सुराः सर्वे निवसन्त्यस्यदेहके ॥ 20 ॥ इसकी अच्छी प्रकार पूजा करके (संपूज्य?) वृद्धि को प्राप्त करके फिर वह सूक्ष्म दृष्टि युक्त होता है अथवा (धीमतः ?) बुद्धिमान होता है जिससे ब्रह्मा से लेकर सभी देवता उसके देह में आकर निवास कर लेते हैं। यदा विमुक्तो देवैस्तु अस्य पूजा न दीयते । ततः काले समुद्भूतः सुरासुरभयङ्करः ॥ 21 ॥ यदि इस विद्या को पूजा न दी जाए और व्यक्ति देवों से भी विमुक्त हो जाए तो ऐसी दशा में भयङ्कर सुर-असुरों का समुद्भव हो जाता है। देवतागृह आद्यानां³ शिवः साक्षाद्भूगोदितः ।

  1. प्रासादमण्डनम् में कहा गया है कि इस प्रकार देवालय के निर्माणारम्भ से लेकर निर्माणोपरान्त देवप्रतिष्ठा तक सात कर्म होते हैं जिन्हें यथा विधि, निर्देश पूरा करना चाहिए। ये कर्म हैं- 1. कूर्म स्थापना, 2. द्वार स्थापना, 3. पद्मशिला स्थापना, 4. प्रासादपुरुष की स्थापना, 5. कलश, 6. ध्वजारोहण तथा 7. देवप्रतिष्ठा। इन सभी अवसरों पर वास्तुपूजन आवश्यक है। इससे कार्य निर्विघ्न, निरापद सम्पन्न होता है। कूर्म्मसंस्थापने द्वारे पद्माख्यायां तु पौरुषे। घटे ध्वजे प्रतिष्ठायां एवं पुण्याहसप्तकम् ॥ (प्रासाद. 1, 36 एवं 8, 37) इसी प्रकार अपराजित. के मिश्रकप्रासादसप्तपुण्याहमाहात्म्यसूत्र में भी इस सम्बन्ध में निर्देश किया गया है- कृते कूर्मप्रतिष्ठायाः खाते पूर्णे च संस्थितौ। भूमिलोके तथा राज्यं सर्वजन्मसु शाश्वतम् ॥ प्रतिष्ठायां शिलायास्तु दैवतैस्सत्यमुच्यते। इच्छास्थाने स्वर्गलोके राज्यं जन्मनि जन्मनि ॥ द्वारे प्रतिष्ठामाने तु स्तम्भोच्छ्रयसमन्विते। महापुरं च लभते काञ्चनं शतयोजनम् ॥ पद्मशिला प्रतिष्ठायां शिवालये भूमस्तके। एकच्छत्रं महाराज्यं जनलोके च प्राप्नुयात् ॥ पुरुषे स्थाप्य मानेत्वागमोक्तमन्त्रतस्तथा। तपालोके ब्रह्मलोके क्रीडति त्रिदशैः सह ॥ प्रस्थाप्यमाने कलशे क्षीरार्णवसमुद्भवे। काञ्चने पुष्पविमाने सत्यलोके स गच्छति ॥ कृते महाध्वजारोपे पताकाध्वजचामरैः। स गच्छेद ज्ञानलोके तु यत्र शम्भुश्च देवता। बलीवर्दाः कर्मकरा अपराश्च शिवालये। ते यान्ति परमं लोकं यत्र देव उमापतिः ॥ मृत्काष्ठलोहशैला वा ये लग्नाश्च शिवालये। दिव्यमूर्तिधराः सर्वे शिवलोक व्रजन्ति ते ॥ (अपराजित. 114, 11-19)
  2. शान्तिपूजादि के चौदह चरण निम्न हैं- 1. भूम्यारम्भ अथवा भूमि का चयन, 2. कूर्मन्यास, 3. शिलान्यास, 4. सूत्रपात या आरेखन, 5. खुरशिला स्थापना, 6. द्वार, 7. कुम्भ या स्तम्भ स्थापना, 8. पट्ट्यारोहण, 9. पद्मशिला, 10. शुकनासिका, 11. प्रासादपुरुष की स्थापना, 12. घण्टिका या आमलक,
  3. कलश स्थापना और 14. ध्वजारोहण, ये चौदह अवसर हैं, जबकि स्थापक को शान्तिकर्म का विधान अवश्य ही करना चाहिए- भूम्यारम्भं तथा कूर्में शिलायां सूत्रपातने। खुरे द्वारोच्छ्रये स्तम्भे पट्टे पद्मशिलासु च ॥ शुकनासे च पुरुषे घण्टायां कलशेस्तथा। ध्वजोच्छ्रायेण कुर्वीत शान्तिकानि चतुर्दशः ॥ (प्रासाद. 1, 37-38)
  4. 'देतागृहवावाद्यां?' इति प्रकाशित पाठः। 'देवतागृहवावाद्या शिवसाक्षात्भूगोदित। सांकल्पपुण्यस्थानानि पूजा चास्य निवेदितम्' इति न पाठः।

सूत्र-५४ 289 सङ्कल्प्यपुण्यस्थानानि पूजा चास्य निवेदिता ॥ २२ ॥ देवतागृह, प्रासाद-मन्दिर और गृह आदि को स्वयं शिव ने साक्षात् देकर भृगु में वास्तुविद्या के प्रकाश से उदित किया है जिससे पुण्य स्थानों की सङ्कल्पना हुई और उनकी पूजा के साथ यह विद्या (वास्तुविद्या की पूजा) निवेदित की गई। तदा तत्सूक्ष्मतां याति विद्यारूपं महासनम् । सुरैराक्रम्यते स्मैवमधोवक्त्रं निपातितम् ॥ २३ ॥ (यहाँ वास्तु की उत्पति कही जा रही है) इसके बाद, सूक्ष्मता से यह विद्या विस्तृतविद्या का स्वरूप धारण कर सकी। इस विद्या पर देवताओं ने आक्रमण करके इसे औंधे मुख गिरा दिया। संस्थाप्य मध्यपाताले सुहितैः सुरसङ्घटैः । तद्वच्च संस्थिताः पूज्या ब्रह्माद्या देवतास्तथा ॥ २४ ॥ और, इसे मध्य पाताल में स्थापित करके देवताओं के समूह एवं संगठन का सुहित, भलाई, साधी परन्तु वहाँ संस्थित करके भी इसे ब्रह्मादि सभी देवताओं द्वारा पूज्या ही माना जाता रहा। शिरस्तस्यैवमीशाने पादौ नैर्ऋत्यगोचरौ। अग्निकोणे च वायव्ये प्रकोष्ठजानुसंस्थितिः ॥ २५ ॥ इस वास्तु का शिर ईशानकोण में और पाँव नैर्ऋत्य कोण में और अग्निकोण और वायव्यकोण में इसकी कमर कोहनी और जङ्घाएँ स्थित हैं। पञ्चचत्वारिंशद्देवा₄₅ देव्राष्टकमथापि₈ च। त्रिपञ्चाशच्च₅₃ त्रिदशाः पूज्यास्तत्र क्रमोदिताः ॥ २६ ॥ इसके देह में पैंतालीस देवता और आठ देवियाँ स्थित हुईं। इस प्रकार कुल तिरेपन देवताओं की क्रमोदित पूजा इसमें उदित हुई।¹ इस श्लोक में भृगु के वास्तुशास्त्र का सङ्केत आया है। मत्स्यपुराण में भृगु के वास्तुशास्त्र का विवरण है— भृगुरत्रिवसिष्ठश्च विश्वकर्मा मयस्तथा। नारदो नग्नजिच्चैव विशालाक्षः पुरन्दरः ॥ ब्रह्मा कुमारो नन्दीशः शौनको गर्ग एव च। वासुदेवोऽनिरुद्धश्च तथा शुक्रबृहस्पती ॥ अष्टादशैते विख्याता वास्तुशास्त्रोपदेशका। (मत्स्य. 252, 2-4) शुक्रनीति से यह विवरण मिलता है, किन्तु वह परवर्ती ग्रन्थ है।

  1. वास्तुपुरुष की उत्पत्ति और उसके पूजा विधान की आवश्यकता पर उपरोक्त प्रकाश पड़ता है। मत्स्यपुराण में आया है कि अन्धकासुरवध के समय शिव के ललाट से गिरे स्वेदबिन्दु से विकराल मुख वाले उत्कट प्राणी की उत्पत्ति हुई। उसके क्षुधातुर होने पर शिव ने उस पर अनुग्रह किया। उक्त प्राणी भूमण्डल और आकाश को अवरुद्ध करता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा, देवताओं ने उसे स्तम्भित किया और जो देवता जहाँ था, वहीं पर उस प्राणी की देह पर स्थित हो गया— स्वदेहानान्तरिक्षं च रुन्धानं

290 अपराजितपृच्छा इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां महेश्वरशुक्रसंवादे वास्तूत्पत्त्यधिकारो नाम चतुःपञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ 54 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में महेश्वर- शुक्र संवाद में वास्तु उद्भव अधिकार नामक चौपनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 54 ॥ वास्तूत्पत्त्यधिकारे देवतान्यासो नाम पञ्चपञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ 55 ॥ विश्वकर्मोवाच — ईशस्तु संस्थितो मूर्ध्नि पर्जन्यः कर्णयोर्दितिः । जयादिती स्कन्धयोश्च ह्युभयोर्वामदक्षिणम् ॥ 1 ॥ (अब वास्तुपुरुष पर देवताओं की न्यास स्थिति बताई जा रही है) विश्वकर्मा बोले कि वास्तुपुरुष के मुँह पर ईश, कानों पर दिति और पर्जन्य तथा दोनों ही वाम- दक्षिण कन्धों पर अदिति और जयादिति का निवास कहा गया है। आपस्तथा च गलके आपवत्सो हृदि स्थितः । मरीचिः पृथ्वीधरश्च संस्थितौ स्तनयोर्द्वयोः ॥ 2 ॥ गले में आप और हृदय स्थान में आपवत्स तथा दोनों स्तनों पर मरीचि और पृथ्वीधर का निवास है। नाभिमध्ये स्थितो ब्रह्मा नाभिपृष्ठानुसंस्थितौ । सावित्री कुक्षिमध्ये तु रुद्रदासो द्वितीयके ॥ 3 ॥ नाभि के मध्य में ब्रह्मा और नाभि के पीठ पर सावित्री तथा काँखों के मध्य रुद्र और रुद्रदास का निवास है। इन्द्र इन्द्रजयश्चैव श्रोणीमध्ये तु संस्थितौ । अङ्गुष्ठाग्रे च पितरौ गुल्फे दौवारिको मृगः ॥ 4 ॥ इन्द्र और इन्द्रजय कुल्हों के मध्य में, अँगूठों के अग्रभाग में पितरगण और टखनों पर दौवारिक का निवास है। अन्तरिक्षः कूर्पराग्रे नागश्चैव द्वितीयके । वामे जानौ स्थितो रोगो दक्षिणे चाग्निदेवता ॥ 5 ॥ प्रपतद् भुवि ॥ भीतभीतैस्ततो देवैर्ब्रह्मणा चाथ शूलिना। दानवासुररक्षोभिरवष्टब्धं समन्ततः ॥ येन यत्रैव चाक्रान्तं स तत्रैवावसत् पुनः। निवासात् सर्वदेवानां वास्तुरित्यभिधीयते ॥ अवष्टब्धेन तेनापि विज्ञाताः सर्वदेवताः। प्रसीदध्वं सुराः सर्वे युष्माभिर्निश्चलीकृतः ॥ (मत्स्य. 252, 12-15)

सूत्र-५५ 291 एक कोहनी पर मृग, अन्तरिक्ष और दूसरी कोहनी पर नाग, बाँयें घुटने पर रोग और दाहिने घुटने पर अग्नि देवता का निवास है। महेन्द्रादित्यसत्यादि भृशान्ता दक्षिणे भुजे। मुख्यभल्लाटसोमादि गिर्यन्ता वामके भुजे ॥ 6 ॥ महेन्द्र, आदित्य, सत्य, भृशान्तगण दाहिनी भुजा पर तथा मुख्य, भल्लाट, सोम, गिर्यन्तगण (शैल) बाँयी भुजा पर वास करते हैं। सविता याम्यतो बाहौ रुद्रश्चैव द्वितीयके। मित्रश्च वामत ऊरौ विवस्वांश्चैव दक्षिणे ॥ 7 ॥ सविता बायीं बाँह पर और रुद्र दूसरी दायीं बाँह पर तथा मित्र बायें उरु भाग पर और विवस्वान दायें उरु भाग पर निवास करते हैं। सुग्रीवः पुष्पदन्तश्च वरुणासुरशोषकाः। पापयक्ष्मा षडेते वै नलके वामके स्थिताः ॥ 8 ॥ सुग्रीव, पुष्पदन्त, वरुण, असुर, शोषका और पापयक्ष्मा- ये छहों बायें नलके में स्थित कहे गए हैं। पूषा च वितथश्चैव गृहक्षतयमो तथा। गन्धर्वभृङ्गा देवाः षड् दक्षिणे नलके स्थिताः ॥ 9 ॥ इसी प्रकार पूषा, वितथ, गृहक्षत, यम, गन्धर्व, भृङ्ग देवता- ये छहों दक्षिण नलके में अवस्थित हैं। ईशोर्ध्वे चरकीं विद्यात् पावकोर्ध्वे विदारिकाम्। निर्ऋत्यूर्ध्वं पूतनां च रोगोर्ध्वं पापराक्षसीम् ॥ 10 ॥ ईश के ऊपर (बाहर) चरकी और अग्नि के ऊपर विदारिका, नैर्ऋत्य के ऊपर पूतना और रोग के ऊपर पापराक्षसी का निवास है। प्राच्यां तु पिलिपिच्छां स्याज्जृम्भा स्याद्याम्यतो दिशि। वारुण्यां विन्यसेत्स्कन्दामर्यमा चोत्तरस्थिता ॥ 11 ॥ पूर्व दिशा की ओर पिलिपिच्छा एवं पश्चिम दिशा में जृम्भा, वारुणी दिशा में स्कन्द तथा उत्तर दिशा में अर्यमा का निवास है। नास्ति चासां पदविधिः पूजां गृह्णन्ति केवलम्। निवासः सर्वदेवानां वास्तु वै स्थानतो विदुः ॥ 12 ॥ इन सभी बाह्य देवताओं की कोई पद विधि नहीं है, ये केवल पूजा ही ग्रहण

292 अपराजितपृच्छा करते हैं। इस तरह विद्वान् लोग वास्तुपुरुष में सभी देवताओं के निवास स्थान को जानते हैं और उनमें उनका निवास मानते हैं। अङ्गं सन्धि च सूत्रादिं विद्यात्पश्चाच्च वास्तुनः। समस्तपुण्यस्थानानि वास्तुपूजासु वै विदऊः ॥ 13 ॥ अङ्ग, सन्धि, सूत्रादि जानने के पश्चात् ही वास्तु के समस्त पुण्यस्थानों की वास्तुपूजा विद्वान् लोगों को करनी चाहिए। द्व्यष्टसन्धि तथाष्टाङ्गं द्व्यष्टसूत्रं तथैव च। पञ्चक्षेत्रमिदं वास्तु स्वरूपं पुरुषाकृति ॥ 14 ॥ सोलह सन्धि तथा आठ अङ्ग, सोलह सूत्र वाले वास्तु के पाँच क्षेत्र है और इनका स्वरूप पुरुषाकृति का है। वास्तोत्पत्ति अङ्गमाह — वास्तोत्पत्तिः पूर्वमङ्गं यक्षोत्पत्तिर्द्वितीयकम्। चतुर्थकं तथा सूत्रं तृतीयं भूपरिग्रहः ॥ 15 ॥ पञ्चमं वेश्माधिकारं षष्ठं च सुरसद्मकम्। सप्तमं लिङ्गमूर्त्त्याद्यं प्रतिष्ठाविधिषष्टमम् ॥ 16 ॥ पहला अङ्ग वास्तु की उत्पत्ति है, दूसरा अङ्ग यक्ष की उत्पत्ति है, तृतीय अङ्ग भूपरिग्रह है और चौथा अङ्ग सूत्र है, पाँचवाँ अङ्ग वेश्माधिकार है, छठा अङ्ग सुरसद्म, मन्दिरादि है और सातवाँ अङ्ग लिङ्ग-मूर्त्यादि है और उनकी प्रतिष्ठा विधि ही वास्तु का आठवाँ अङ्ग है। इमान्यष्टाङ्गसूत्राणि वास्तुवेदोदितानि च। वास्तुवेदोद्भवं चाद्यं समस्तं सूत्रनिर्गतम् ॥ 17 ॥ ये आठों ही अङ्गसूत्र वास्तुवेदोदित या वास्तुशास्त्र में कहे गए हैं। अस्तु, वास्तु वेद से ही आद्यादि समस्त सूत्रों का निकास हुआ है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वास्तूत्पत्यङ्गे देवतान्यासाधिकारो नाम पञ्चपञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ 55 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वास्तु उत्पत्ति, अङ्ग अधिकार नामक पचपनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 55 ॥