अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५३ 283 भूः क्रान्ता पादतलतो ब्रह्मलोकं गतं शिरः ॥ ३३ ॥ वे सोचने लगे कि यह दुर्जय और दुर्निरीक्ष्य, महाघोर दारुण भयानक रूप, जो बिजली के समान चमकते व कड़कते नेत्रों वाला है और इसका पदतल भूमि से भी क्रान्त, अतिक्रमण कर रहा है और सिर ब्रह्मलोक तक जा पहुँचा है। तस्य रूपभयाद्भीताः त्रिदशासुरराक्षसाः । नष्टाश्च ऋत्विजो ब्रह्मा शक्राद्या द्वारपालकाः ॥ ३४ ॥ उसके ऐसे रूप से सभी देवता, राक्षस और असुरगण भी भयभीत है और सभी ऋत्विजगण, ब्रह्मा, इन्द्रादि सभी द्वारपाल नष्ट प्रायः हो गए। तत्र देवा द्विजा राजा आश्रयन्ति महेश्वरम् । 'रक्ष रक्ष महादेव-भयभीतान् जगत्प्रभो ॥ ३५ ॥ यह सब विचित्रता देखकर सभी द्विज और राजा भी भगवान् महेश्वर के आश्रय में जा पहुँचे और पुकार करने लगे कि हे महादेव ! जगत्प्रभो ! ! हम भयभीत लोगों की रक्षा कीजिए। महद्भूतं मर्त्यलोके यज्ञे च रिपुक्रोधजम् । सुरराजद्विजानां च भूमौ रक्षाकरो भवान् ॥ ३६ ॥ (सभी ने कहा कि) हे प्रभु ! मृत्युलोक में यज्ञों में महान् क्रोध से रिपु द्वारा महान् सङ्कट उत्पन्न कर दिया गया है। अस्तु, सुरराज इन्द्र और ब्राह्मणों की तथा इस भूमि की आप रक्षा कीजिए। प्रत्यक्षं भव ईशान सुरार्थे द्विजभूपते । महद्भूतं महादेवं दैत्यानां दहनं परम् ॥ ३७ ॥ हे ईशान ! महादेव शिव !! कृपा करके आप देवताओं, ब्राह्मणों और भूपति राजाओं के लिए प्रत्यक्ष प्रकट होकर हे महद्भूत महादेव ! आप दैत्यों का पूर्ण दहन कर दीजिएगा। ललाटनेत्रसङ्क्रुद्धं कालरूपमिवापरम् । वलोकितो भवो भद्रे असाध्ये वृद्धताङ्गतः ॥ ३८ ॥ आपके ललाट के तीसरे नेत्र के संक्रुद्ध होने पर तो महाकालरूप से भी परम भयानक दृष्टि के सामने असाध्य भी भद्र होकर वृद्धि को प्राप्त करने लगते हैं। मूलकल्पोद्भवं यत्र निग्राह्यमस्तकोभवम् ।' वलोकितं तदा चक्रं त्रिषु लोकेषु मध्यतः । लीयते शिवदेहे तु यत्र स्यात्सुरसम्भवः ॥ ३९ ॥