अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८७८ अपराजितपृच्छा के तलवे भूमि के पाताल तक और उनके हाथों और शरीर का पञ्जर आसमान को स्पर्श करता-सा लग रहा था, जो तीनों लोकों तक फैल गया। स्कन्धग्रीवाकरा व्योम्नि ब्रह्माण्डे च गतं शिरः । तेजोरूपं स्फुरन्तं च प्रलये भैरवं यथा ॥ २७ ॥ उनका कन्धा, ग्रीवा और हाथ आसमान को छू रहे थे और उनका सिर ब्रह्माण्ड की ऊँचाई तक जा लगा था और उनका तेजोमय रूप ऐसा विकराल चमक रहा था जैसे प्रलयकाल में भैरव का विकराल तेजोमय रूप हो। निनदन्तं महाभीमं मन्ये कल्पान्तगर्जितम् । त्रस्तास्तु देवताः सर्वा रूपं दृष्ट्वा सुदारुणम् ॥ २८ ॥ उनकी आवाज इतनी घोर निनादयुक्त थी मानो महाभीम कल्पान्त की गर्जना हो रही हो। इस तरह का बहुत दारुण रूप देखकर भार्गव से सभी देवता त्रस्त या भयभीत हो गए थे। ध्यानयुक्ताश्च चलिताः भयभीता महोरगाः । दिक्पाला लोकपालाश्च प्रणश्यन्ति महासुराः ॥ २९ ॥ जो सदा ध्यान युक्त रहते थे, वे भी इस भय से विचलित हो गए थे और जो महान् उरग थे वे भी भयभीत थे। दिक्पालगण, लोकपालगण आदि समस्त महान् सुर देवता भय से मरणासन्न थे। ब्रह्मराक्षसवैताला आश्रयन्ति महेश्वरम् । आदित्याद्या ग्रहाः सर्वे आश्रयन्ति जनार्दनम् ॥ ३० ॥ इस बीच, ब्रह्मराक्षस और वैतालादि भय के मारे भगवान शिव के आश्रय में जा बैठे और आदित्यादि सभी ग्रह भी भयातुर होकर जनार्दन भगवान् विष्णु की शरण में चले गए। देवराजः सुरैर्युक्तः समुपास्ते जगत्पतिम् । दुर्निरीक्ष्यं दुराराध्यं कालानलसमप्रभम् ॥ ३१ ॥ तं दृष्ट्वादूतरूपं च विरञ्चिरपि विस्मितः । इसी प्रकार देवराज इन्द्र भी सभी देवताओं के साथ जगत्पिता ब्रह्मा की पर्युपासना में लग गए। ऐसे दुर्निरीक्ष्य भयानक और दुराराध्य महाकालाग्नि के समान, अद्भुत रूप को देखकर विरञ्चि भगवान् ब्रह्मा भी विस्मित हो गए थे। दुर्जयं दुर्निरीक्ष्यं च महोघोरं सुदारुणम् ॥ ३२ ॥ स्फुरन्तं विद्युदाकारं लोचनैरपि सन्निभः ।