भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-५४ 285 सामर्थ्यतो विसृजता पुरुषं यज्ञध्वंसकम्। इन्द्राद्या असुरपार्श्वे निग्राह्य इति निश्चयात् ॥ २॥ इस यज्ञध्वंश कार्य को पुनः सुधारने में समर्थ जो इन्द्रादि देव और असुरगण हैं, वे भी तुम्हारे पास में निश्चय ही निग्राहावस्था या कैदी तुल्य हो चुके हैं। शुक्र उवाच - पुरा चाऽऽराधितो दिव्यं वर्षसहस्रकम्। तदाज्ञया मया लभ्या विद्यामरत्वदायिनी ॥ ३॥ इन्द्र ने कहा कि पूर्वकाल में जिस देवता की मैंने सहस्र दिव्य वर्ष तक आराधना की थी, उसी की आज्ञा से मुझे अमरत्वदायिनी विद्या का लाभ हुआ है।¹ रुद्र उवाच - दिव्यं वर्षसहस्रं च तपः कृत्वा सुदारुणम्। तोषितोऽहं तथा विष्णुः शुक्रेण मुनिना त्वया ॥ ४॥ रुद्र ने कहा कि हजारों दिव्य वर्षों तक का जो इतना कठोर तप है, शुक्र मुनि आपके द्वारा किया गया है। उससे मैं और भगवान विष्णु भी बहुत ही सन्तुष्ट और प्रसन्न हुए हैं। त्वया लिङ्गोद्भवे² व्योम्नि तुष्टो देवो जगत्पतिः । ध्यानं मन्त्रजपं कृत्वा प्रीणय त्वं परेश्वरम् ॥ ५॥ तुम्हारे द्वारा व्योम तक उद्भव को प्राप्त लिङ्ग स्वरूप जगत्पति देव तुष्ट हुए हैं और ध्यान तथा मन्त्र जाप करके तुमने परमेश्वर की प्रसन्नता प्राप्त की है। प्रासादान्मान्त्रिकी विद्या सप्ताक्षर्यथ संहिता। तुष्टेन कथिता विद्या सर्वकर्मानुसारिणी ॥ ६ ॥ और, उस प्रसन्नता के फलस्वरूप ही तुम्हें यह 'प्रासादमान्त्रिकी विद्या' और 'सप्ताश्चर्य संहिता' मिली है। यह 'सर्वकर्मानुसारिणी विद्या' भी उनकी प्रसन्नता से, तुष्टि मिलने के कारण ही तुम्हें कही गई है। साधयामि यत्कृते च सर्वदेवभयङ्करम्। मन्त्रैः स्तुत्या च युद्धैश्च दायं दास्यन्ति देवताः ॥ ७॥

  1. इत्यमनन्तर 'सदा च भवतुष्टित वेष्ट्य तदधासुरासुरैध। आज्ञालोपं भव प्रभो तवशास्त्रमयोच्छेद। उदकस्या प्रीतप्रियते अग्रिमध्ये समुत्पन्नां आबाधादेवदानवैः ॥' इत्यादयो... 'न' पाठः ।
  2. 'जरा ? लिङ्गोद्भवे' इति प्रकाशित पाठः । न पाठे नोपलब्धते ।