भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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286 अपराजितपृच्छा परन्तु, हे सर्वभयङ्कर देव! मैं तुम्हारे द्वारा किए गए विनाश को सुधारने हेतु मन्त्रों द्वारा तुम्हारी स्तुति की साधना करके अथवा तुमसे साक्षात् युद्ध करके देवताओं का दायभाग उन्हें वापस दिलाऊँगा। अहो ये मुनः सर्वे रुद्रेशं पुरुषोत्तमम्। उपाश्रयन्ति देवेशं भयं जयन्ति निर्जराः ॥ 8 ॥ देखो, ये सभी मुनिगण भी भय से परास्त होकर पुरुषोत्तम भगवान् रुद्र देवेश के उपाश्रय में आ गए हैं। पद्मासन शृणु त्वं च विष्णुर्वचनमब्रवीत्। न त्वया वध्यते साधो अस्माभिर्न च दैवतैः ॥ 9 ॥ तब भगवान् शिव की युद्ध से या आराधना से शुक्राचार्य को जीतने की यह प्रतिज्ञा सुनकर भगवान् विष्णु ने इन वचनों को कहा- 'हे पद्मासनस्थ, आप यह ध्यान देकर सुने कि न तो यह साधु शुक्राचार्य तुमसे वध को प्राप्त हो सकते हैं न मुझसे और न ही अन्य देवताओं से इनका वध हो सकता है। मन्त्रमूर्तिरियं वास्तू रुद्रदेहसमुद्भवः। इदं तु वास्तुरूपं च दुर्धरं च पुनः शिवात् ॥ 10 ॥ 'क्योंकि, ये स्वयं मन्त्रमूर्ति रूप में वास्तु है, जो रुद्र भगवान् शिव की देह से समुद्भूत हुए हैं। इसलिए अब तो ये वास्तु रूप होकर स्वयं भगवान् शिव से भी पुनः अधिक दुर्धर, असाध्य और अजेय हो गए हैं। अतः शिव भी इन्हें नहीं जीत सकते।' इदं च वचन श्रुत्वा पद्मभूः पुरुषोत्तमात्। शरणं वद देवानां विष्णुरद्भुतविक्रमः ॥ 11 ॥ भगवान् विष्णु के ये वचन सुनकर पद्मभूः ब्रह्मा ने देवताओं को कहा कि अब तो तुम सब अद्भुत विक्रमी भगवान् विष्णु की ही शरण में जाओ। रुद्रलोके ततो गत्वा ध्यात्वा देवं महेश्वरम्। अद्भुतं भूतमभ्यर्च्य भूतं दृष्ट्वा च भूतले ॥ 12 ॥ तब वे सभी देवगण रुद्रलोक में पहुँचकर भगवान् महेश्वर का ध्यान करने लगे और भूतल पर भूतों को देखकर सब से अद्भुत भूत भगवान् रुद्र की अभ्यर्थना करने लगे। यदा सत्त्वं भवेद् ज्ञानं ¹भवेत्तुष्टिभवोऽवृथा। तदा सुरासुरैर्वन्ध्य आज्ञालोपो भवेत्प्रभोः ॥ 13 ॥

  1. 'भवेत्तुष्टिर्भवो ? वृथा' प्रकाशित पाठः।