अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें288 अपराजितपृच्छा पुण्य प्रतिष्ठावसर सात प्रकार के हैं¹ और शान्तिकर्म भी चौदह प्रकार के हैं² अस्तु, समस्त पुण्यस्थानों में इस विद्या की भी पूजा होनी चाहिए। एषां वृद्धिं च सन्त्यज्य ? ततो यान्ति स सूक्ष्मतः ? । ब्रह्माद्याश्च सुराः सर्वे निवसन्त्यस्यदेहके ॥ 20 ॥ इसकी अच्छी प्रकार पूजा करके (संपूज्य?) वृद्धि को प्राप्त करके फिर वह सूक्ष्म दृष्टि युक्त होता है अथवा (धीमतः ?) बुद्धिमान होता है जिससे ब्रह्मा से लेकर सभी देवता उसके देह में आकर निवास कर लेते हैं। यदा विमुक्तो देवैस्तु अस्य पूजा न दीयते । ततः काले समुद्भूतः सुरासुरभयङ्करः ॥ 21 ॥ यदि इस विद्या को पूजा न दी जाए और व्यक्ति देवों से भी विमुक्त हो जाए तो ऐसी दशा में भयङ्कर सुर-असुरों का समुद्भव हो जाता है। देवतागृह आद्यानां³ शिवः साक्षाद्भूगोदितः ।
- प्रासादमण्डनम् में कहा गया है कि इस प्रकार देवालय के निर्माणारम्भ से लेकर निर्माणोपरान्त देवप्रतिष्ठा तक सात कर्म होते हैं जिन्हें यथा विधि, निर्देश पूरा करना चाहिए। ये कर्म हैं- 1. कूर्म स्थापना, 2. द्वार स्थापना, 3. पद्मशिला स्थापना, 4. प्रासादपुरुष की स्थापना, 5. कलश, 6. ध्वजारोहण तथा 7. देवप्रतिष्ठा। इन सभी अवसरों पर वास्तुपूजन आवश्यक है। इससे कार्य निर्विघ्न, निरापद सम्पन्न होता है। कूर्म्मसंस्थापने द्वारे पद्माख्यायां तु पौरुषे। घटे ध्वजे प्रतिष्ठायां एवं पुण्याहसप्तकम् ॥ (प्रासाद. 1, 36 एवं 8, 37) इसी प्रकार अपराजित. के मिश्रकप्रासादसप्तपुण्याहमाहात्म्यसूत्र में भी इस सम्बन्ध में निर्देश किया गया है- कृते कूर्मप्रतिष्ठायाः खाते पूर्णे च संस्थितौ। भूमिलोके तथा राज्यं सर्वजन्मसु शाश्वतम् ॥ प्रतिष्ठायां शिलायास्तु दैवतैस्सत्यमुच्यते। इच्छास्थाने स्वर्गलोके राज्यं जन्मनि जन्मनि ॥ द्वारे प्रतिष्ठामाने तु स्तम्भोच्छ्रयसमन्विते। महापुरं च लभते काञ्चनं शतयोजनम् ॥ पद्मशिला प्रतिष्ठायां शिवालये भूमस्तके। एकच्छत्रं महाराज्यं जनलोके च प्राप्नुयात् ॥ पुरुषे स्थाप्य मानेत्वागमोक्तमन्त्रतस्तथा। तपालोके ब्रह्मलोके क्रीडति त्रिदशैः सह ॥ प्रस्थाप्यमाने कलशे क्षीरार्णवसमुद्भवे। काञ्चने पुष्पविमाने सत्यलोके स गच्छति ॥ कृते महाध्वजारोपे पताकाध्वजचामरैः। स गच्छेद ज्ञानलोके तु यत्र शम्भुश्च देवता। बलीवर्दाः कर्मकरा अपराश्च शिवालये। ते यान्ति परमं लोकं यत्र देव उमापतिः ॥ मृत्काष्ठलोहशैला वा ये लग्नाश्च शिवालये। दिव्यमूर्तिधराः सर्वे शिवलोक व्रजन्ति ते ॥ (अपराजित. 114, 11-19)
- शान्तिपूजादि के चौदह चरण निम्न हैं- 1. भूम्यारम्भ अथवा भूमि का चयन, 2. कूर्मन्यास, 3. शिलान्यास, 4. सूत्रपात या आरेखन, 5. खुरशिला स्थापना, 6. द्वार, 7. कुम्भ या स्तम्भ स्थापना, 8. पट्ट्यारोहण, 9. पद्मशिला, 10. शुकनासिका, 11. प्रासादपुरुष की स्थापना, 12. घण्टिका या आमलक,
- कलश स्थापना और 14. ध्वजारोहण, ये चौदह अवसर हैं, जबकि स्थापक को शान्तिकर्म का विधान अवश्य ही करना चाहिए- भूम्यारम्भं तथा कूर्में शिलायां सूत्रपातने। खुरे द्वारोच्छ्रये स्तम्भे पट्टे पद्मशिलासु च ॥ शुकनासे च पुरुषे घण्टायां कलशेस्तथा। ध्वजोच्छ्रायेण कुर्वीत शान्तिकानि चतुर्दशः ॥ (प्रासाद. 1, 37-38)
- 'देतागृहवावाद्यां?' इति प्रकाशित पाठः। 'देवतागृहवावाद्या शिवसाक्षात्भूगोदित। सांकल्पपुण्यस्थानानि पूजा चास्य निवेदितम्' इति न पाठः।