भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

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सूत्र-५४ 289 सङ्कल्प्यपुण्यस्थानानि पूजा चास्य निवेदिता ॥ २२ ॥ देवतागृह, प्रासाद-मन्दिर और गृह आदि को स्वयं शिव ने साक्षात् देकर भृगु में वास्तुविद्या के प्रकाश से उदित किया है जिससे पुण्य स्थानों की सङ्कल्पना हुई और उनकी पूजा के साथ यह विद्या (वास्तुविद्या की पूजा) निवेदित की गई। तदा तत्सूक्ष्मतां याति विद्यारूपं महासनम् । सुरैराक्रम्यते स्मैवमधोवक्त्रं निपातितम् ॥ २३ ॥ (यहाँ वास्तु की उत्पति कही जा रही है) इसके बाद, सूक्ष्मता से यह विद्या विस्तृतविद्या का स्वरूप धारण कर सकी। इस विद्या पर देवताओं ने आक्रमण करके इसे औंधे मुख गिरा दिया। संस्थाप्य मध्यपाताले सुहितैः सुरसङ्घटैः । तद्वच्च संस्थिताः पूज्या ब्रह्माद्या देवतास्तथा ॥ २४ ॥ और, इसे मध्य पाताल में स्थापित करके देवताओं के समूह एवं संगठन का सुहित, भलाई, साधी परन्तु वहाँ संस्थित करके भी इसे ब्रह्मादि सभी देवताओं द्वारा पूज्या ही माना जाता रहा। शिरस्तस्यैवमीशाने पादौ नैर्ऋत्यगोचरौ। अग्निकोणे च वायव्ये प्रकोष्ठजानुसंस्थितिः ॥ २५ ॥ इस वास्तु का शिर ईशानकोण में और पाँव नैर्ऋत्य कोण में और अग्निकोण और वायव्यकोण में इसकी कमर कोहनी और जङ्घाएँ स्थित हैं। पञ्चचत्वारिंशद्देवा₄₅ देव्राष्टकमथापि₈ च। त्रिपञ्चाशच्च₅₃ त्रिदशाः पूज्यास्तत्र क्रमोदिताः ॥ २६ ॥ इसके देह में पैंतालीस देवता और आठ देवियाँ स्थित हुईं। इस प्रकार कुल तिरेपन देवताओं की क्रमोदित पूजा इसमें उदित हुई।¹ इस श्लोक में भृगु के वास्तुशास्त्र का सङ्केत आया है। मत्स्यपुराण में भृगु के वास्तुशास्त्र का विवरण है— भृगुरत्रिवसिष्ठश्च विश्वकर्मा मयस्तथा। नारदो नग्नजिच्चैव विशालाक्षः पुरन्दरः ॥ ब्रह्मा कुमारो नन्दीशः शौनको गर्ग एव च। वासुदेवोऽनिरुद्धश्च तथा शुक्रबृहस्पती ॥ अष्टादशैते विख्याता वास्तुशास्त्रोपदेशका। (मत्स्य. 252, 2-4) शुक्रनीति से यह विवरण मिलता है, किन्तु वह परवर्ती ग्रन्थ है।

  1. वास्तुपुरुष की उत्पत्ति और उसके पूजा विधान की आवश्यकता पर उपरोक्त प्रकाश पड़ता है। मत्स्यपुराण में आया है कि अन्धकासुरवध के समय शिव के ललाट से गिरे स्वेदबिन्दु से विकराल मुख वाले उत्कट प्राणी की उत्पत्ति हुई। उसके क्षुधातुर होने पर शिव ने उस पर अनुग्रह किया। उक्त प्राणी भूमण्डल और आकाश को अवरुद्ध करता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा, देवताओं ने उसे स्तम्भित किया और जो देवता जहाँ था, वहीं पर उस प्राणी की देह पर स्थित हो गया— स्वदेहानान्तरिक्षं च रुन्धानं