अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें292 अपराजितपृच्छा करते हैं। इस तरह विद्वान् लोग वास्तुपुरुष में सभी देवताओं के निवास स्थान को जानते हैं और उनमें उनका निवास मानते हैं। अङ्गं सन्धि च सूत्रादिं विद्यात्पश्चाच्च वास्तुनः। समस्तपुण्यस्थानानि वास्तुपूजासु वै विदऊः ॥ 13 ॥ अङ्ग, सन्धि, सूत्रादि जानने के पश्चात् ही वास्तु के समस्त पुण्यस्थानों की वास्तुपूजा विद्वान् लोगों को करनी चाहिए। द्व्यष्टसन्धि तथाष्टाङ्गं द्व्यष्टसूत्रं तथैव च। पञ्चक्षेत्रमिदं वास्तु स्वरूपं पुरुषाकृति ॥ 14 ॥ सोलह सन्धि तथा आठ अङ्ग, सोलह सूत्र वाले वास्तु के पाँच क्षेत्र है और इनका स्वरूप पुरुषाकृति का है। वास्तोत्पत्ति अङ्गमाह — वास्तोत्पत्तिः पूर्वमङ्गं यक्षोत्पत्तिर्द्वितीयकम्। चतुर्थकं तथा सूत्रं तृतीयं भूपरिग्रहः ॥ 15 ॥ पञ्चमं वेश्माधिकारं षष्ठं च सुरसद्मकम्। सप्तमं लिङ्गमूर्त्त्याद्यं प्रतिष्ठाविधिषष्टमम् ॥ 16 ॥ पहला अङ्ग वास्तु की उत्पत्ति है, दूसरा अङ्ग यक्ष की उत्पत्ति है, तृतीय अङ्ग भूपरिग्रह है और चौथा अङ्ग सूत्र है, पाँचवाँ अङ्ग वेश्माधिकार है, छठा अङ्ग सुरसद्म, मन्दिरादि है और सातवाँ अङ्ग लिङ्ग-मूर्त्यादि है और उनकी प्रतिष्ठा विधि ही वास्तु का आठवाँ अङ्ग है। इमान्यष्टाङ्गसूत्राणि वास्तुवेदोदितानि च। वास्तुवेदोद्भवं चाद्यं समस्तं सूत्रनिर्गतम् ॥ 17 ॥ ये आठों ही अङ्गसूत्र वास्तुवेदोदित या वास्तुशास्त्र में कहे गए हैं। अस्तु, वास्तु वेद से ही आद्यादि समस्त सूत्रों का निकास हुआ है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वास्तूत्पत्यङ्गे देवतान्यासाधिकारो नाम पञ्चपञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ 55 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वास्तु उत्पत्ति, अङ्ग अधिकार नामक पचपनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 55 ॥