भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-५६ 293 वास्तुदेवतानिघण्टुर्नाम षट्पञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ ५६ ॥ विश्वकर्मोवाच — निघण्टुः प्रोच्यते नानावास्तुपदनिवासिनाम्। ईशादीनां च देवानां प्रदक्षिणमनुक्रमम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा ने कहा कि वास्तुपदों के निवासी नाना देवताओं के वास्तुपद के निवास को ईशादि देवताओं के प्रदक्षिणा क्रम से निघण्टु को कहा जा रहा है। ईशश्च शङ्करो देवः पर्जन्यो वृष्टिकारकः। जयन्तः काश्यपो देवः स्वयं ¹वृष्टिकरो मुनिः ॥ २ ॥ (निघण्टु के अनुसार) ईश शङ्कर देव है; पर्जन्य वृष्टिकारक देव है; जयन्त काश्यपदेव भी स्वयं वृष्टिकर्ता मुनि है। महेन्द्रश्च सुराधीश आदित्यश्च प्रभाकरः । सत्यश्चैव स्वयं धर्मो भृशो मन्मथ उच्यते ॥ ३ ॥ महेन्द्र सुराधीश इन्द्र है और आदित्य प्रभाकर (सूर्य) है; सत्य तो स्वयं धर्मराज ही है तथा भृश को मन्मथ कामदेव कहते हैं। नमोऽन्तरिक्ष आकाशमग्निस्तेजः समुद्भवः। पूषा मातृगणाश्चैव चाधर्मो वितथाभिधः ॥ ४ ॥ नम, अन्तरिक्ष, आकाश तथा अग्नि को तेज समुद्भव भी कहते हैं; पूषा को मातृगण और अधर्म को वितथ नाम दिया गया है। गृहक्षतो बुधश्चैव यमः प्रेताधिपस्तथा । गन्धर्वो नारदः प्रोक्तो भृङ्गीराण् निर्ऋतेः सुतः ॥ ५ ॥ गृहक्षत को बुध तथा यम को प्रेतों का राजा या प्रेताधिप भी कहते है; गन्धर्व को नारद व भृङ्गिराट् को निर्ऋति सुत कहा है। मृगोऽनन्तः स्वभूर्धर्मो विश्वेदेवास्तु पितरः । दौवारिको भवेन्नन्दी सुग्रीवो मनुदेवता ॥ ६ ॥ मृग को अनन्त; स्वभूः को धर्म; विश्वेदेवों को पितर, दौवारिक को नन्दी, सुग्रीव को मनु देवता कहा है।

  1. 'सृष्टिकरो मुनिः' स्यात्। विष्णुमार्कण्डेय प्रभृति पुराणान्तर्गते काश्यपीयसृष्टिसर्गादिवर्णनं मिलितौ। कतिपय आलोचकों ने वास्तु के अनेक देवताओं को प्रचलित देवताओं के नामों के अनुसार नहीं मानते हुए कल्पितभर कहा है, ऐसे में यह सूत्र उनके वास्तविक स्वरूप-मान्यताओं को परिभाषित करता है।