भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 535 में से

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पृष्ठ 340

294 अपराजितपृच्छा महाजवः पुष्पदन्तो वरुणः सलिलाधिपः । असुरो राहुराख्यातः शोषः सौरिः शनैश्चरः ॥ ७ ॥ महाजव को पुष्पदन्त; वरुण को सलिलाधिप तथा असुर को राहु कहा है और शोष को सौरि या शनैश्चर भी कहते हैं। पापयक्ष्मा क्षयः प्रोक्तो ज्वरो रोगश्च दूषकः । नागस्तु वासुकिः प्रोक्तो मुख्यस्त्वष्टा च विश्वकृत् ॥ ८ ॥ पापयक्ष्मा को क्षय; ज्वर को रोगदूषक, नाग को वासुकी और मुख्य त्वष्टा को विश्वकृत कहा गया है। भल्लाटश्चन्द्र इत्युक्तः सोमश्चैव कुबेरकः । गिरिश्च हिमवान् शैलो ह्यदितिः श्रीः प्रकीर्तिता ॥ ९ ॥ भल्लाट को चन्द्र कहा है और सोम को कुबेर बताया गया है; गिरि को हिमवान् शैल तथा अदिति को श्री के रूप में जानना चाहिए। वृषध्वजो दितिः शर्व आपश्चैव धरार्णवः । आपवत्स उमापत्यं ह्यर्थमा स्यात्तु भास्करः ॥ १० ॥ दिति को वृषध्वज शर्व, आप को पृथ्वीपर का सागर कहा है; आपवत्स को उमापति और अर्यमा को भास्कर सूर्य कहा है। सविता जाह्नवी गङ्गा सावित्री वेदमातृका । विवस्वांस्तु भवेन्मृत्युरिन्द्र उक्तोऽमराधिपः ॥ ११ ॥ सविता को जाह्नवी, गङ्गा और सावित्री को वेदमाता तथा विवस्वान को मृत्यु कहा है। इन्द्र को अमरों (देवताओं) का राजा, अमराधिप कहा है। कालानल इन्द्रजयो मित्रश्च बलभद्रकः । रुद्रं तथेश्वरं विद्याद्रुद्रदासस्तदात्मजः ॥ १२ ॥ कालानल को इन्द्रजय; मित्र को बलभद्रक; रुद्र को ईश्वर जानो और रुद्रदास को रुद्र का पुत्र समझना चाहिए। पृथ्वीधरो भवेद् विष्णुर्हेमगर्भः पितामहः । द्वादश₁₂ ब्रह्मपरिधौ द्वात्रिंशद्₃₂ बाह्यतस्ततः ॥ १३ ॥ पृथ्वीधर को विष्णु और हेमगर्भ को पितामह ब्रह्मा समझो। ये द्वादश तो ब्रह्मा की परिधि पर और बत्तीस परिधि के बाहर रहते हैं। चरकी च विदारी च पूतना पापराक्षसी । पिलिपिच्छा तथा जृम्भा स्कन्दार्यमा दिशां प्रति ॥ १४ ॥

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