भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-५५ 291 एक कोहनी पर मृग, अन्तरिक्ष और दूसरी कोहनी पर नाग, बाँयें घुटने पर रोग और दाहिने घुटने पर अग्नि देवता का निवास है। महेन्द्रादित्यसत्यादि भृशान्ता दक्षिणे भुजे। मुख्यभल्लाटसोमादि गिर्यन्ता वामके भुजे ॥ 6 ॥ महेन्द्र, आदित्य, सत्य, भृशान्तगण दाहिनी भुजा पर तथा मुख्य, भल्लाट, सोम, गिर्यन्तगण (शैल) बाँयी भुजा पर वास करते हैं। सविता याम्यतो बाहौ रुद्रश्चैव द्वितीयके। मित्रश्च वामत ऊरौ विवस्वांश्चैव दक्षिणे ॥ 7 ॥ सविता बायीं बाँह पर और रुद्र दूसरी दायीं बाँह पर तथा मित्र बायें उरु भाग पर और विवस्वान दायें उरु भाग पर निवास करते हैं। सुग्रीवः पुष्पदन्तश्च वरुणासुरशोषकाः। पापयक्ष्मा षडेते वै नलके वामके स्थिताः ॥ 8 ॥ सुग्रीव, पुष्पदन्त, वरुण, असुर, शोषका और पापयक्ष्मा- ये छहों बायें नलके में स्थित कहे गए हैं। पूषा च वितथश्चैव गृहक्षतयमो तथा। गन्धर्वभृङ्गा देवाः षड् दक्षिणे नलके स्थिताः ॥ 9 ॥ इसी प्रकार पूषा, वितथ, गृहक्षत, यम, गन्धर्व, भृङ्ग देवता- ये छहों दक्षिण नलके में अवस्थित हैं। ईशोर्ध्वे चरकीं विद्यात् पावकोर्ध्वे विदारिकाम्। निर्ऋत्यूर्ध्वं पूतनां च रोगोर्ध्वं पापराक्षसीम् ॥ 10 ॥ ईश के ऊपर (बाहर) चरकी और अग्नि के ऊपर विदारिका, नैर्ऋत्य के ऊपर पूतना और रोग के ऊपर पापराक्षसी का निवास है। प्राच्यां तु पिलिपिच्छां स्याज्जृम्भा स्याद्याम्यतो दिशि। वारुण्यां विन्यसेत्स्कन्दामर्यमा चोत्तरस्थिता ॥ 11 ॥ पूर्व दिशा की ओर पिलिपिच्छा एवं पश्चिम दिशा में जृम्भा, वारुणी दिशा में स्कन्द तथा उत्तर दिशा में अर्यमा का निवास है। नास्ति चासां पदविधिः पूजां गृह्णन्ति केवलम्। निवासः सर्वदेवानां वास्तु वै स्थानतो विदुः ॥ 12 ॥ इन सभी बाह्य देवताओं की कोई पद विधि नहीं है, ये केवल पूजा ही ग्रहण