भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 326

280 अपराजितपृच्छा शैलेन्द्रात् दैत्येन्द्रागमनं — अनन्तरं महाभूता दैत्याश्चैव महोत्कटाः । (अ)वतरिताः शैलेन्द्रेषु दैत्येन्द्राश्च महोत्कटाः ॥ 16 ॥ इसके अनन्तर, महाभूता विशालकाय प्राणियों के रूप में महान्, उत्कट विकराल दैत्यगण उस पर्वतराज शैलेन्द्र से अवतरित होकर महोत्कट दैत्येन्द्र आए। शैलरूपैश्च सम्भूय सपक्षाः क्रोधपर्वताः । तथा पतन्त्युत्पतन्ति यत्र भूर्जनसङ्कुला ॥ 17 ॥ वह सभी पहाड़ों के रूप धारण किए हुए थे और उनके पङ्ख थे जिनसे ये पर्वत क्रोध करके उड़ते रहते और जहाँ कहीं भी भूमि पर लोगों की भीड़ या समूह होता उन पर बार-बार घड़ाघड़ गिर पड़ते। निर्दहन्ति धराधार्य खेटग्रामपुरादिकम्। नरोरगसुरेन्द्राश्च पर्वतैर्भस्मसात्कृताः ॥ 18 ॥ और, इस तरह भूमि का आधार ही आग से जला देते जिससे खेट, ग्राम, पुर आदि सभी आ जाते और उन स्थानों में रहने वाले नर, उरग और सुरेन्द्र आदि उन पर्वतों से चकनाचूर हो जाते और भस्मसात् हो जाते। ततो देवादिकाः सर्वे मरुत्वत्पुरमाश्रिताः । व्यज्ञापयन् सहस्त्राक्षं धराधरविनाशिनम् ॥ 19 ॥ इससे समस्त देवादिकों ने मरुतवत पुरमाश्रित होकर अर्थात् हवा की-सी शीघ्रता का आश्रय लेकर हजार आँखों वाले इन्द्रदेव को जाकर निवेदन किया कि ये धराधर अर्थात् पहाड़ विनाश करने पर उतारु हो गए हैं, उनसे हमें प्राण दिलाएँ। क्रोधादिन्द्रेण वज्रेण स्थापिता भुवि पर्वताः । छेदिताश्च ततः पक्षा अचला यत्र संस्थिताः ॥ 20 ॥ इन्द्र ने क्रोधावेश में आकर इन पर्वतों पर वज्र से प्रहार किया और उनके पङ्खों को काट गिराया जिससे वे इधर-उधर उड़कर उत्पात नहीं मचा सके और उन्हें जहाँ के तहाँ अचल होकर रहना पड़ा।¹ गङ्गायमुनयोर्मध्ये प्रारब्धो यज्ञ उत्तमः । निर्जिताश्च सुरैर्यज्ञरक्षा वज्रायुधैः कृता ॥ 21 ॥

  1. इन्द्र द्वारा पर्वतों का संहार करने का वर्णन ऋग्वेद और श्रीमद्भागवतपुराण में आया है। देवराज इन्द्र का नाम शक्र इसलिए पड़ा।