अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 325, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५३ 279 पूर्वकाल की बात है। महाघोर व सुदारुण रूप देव और असुरों में युद्ध छिड़ा। वहाँ मनुष्यों के बड़े-बड़े सङ्घट्टों की भीड़-भाड़ हुई जिसमें सभी परस्पर युद्ध में रत होने से अपने शरीरों को रक्त से लथपथ किए हुए थे। महारौद्रैः कटाक्षैश्च शस्त्रघातैः परस्परम्। महाबलोत्कटा वीराः सङ्ग्रामे हेतिकाङ्क्षिणः ॥ 10 ॥ वे महान् रौद्र रूप में, कटाक्षपूर्वक एक दूसरे पर बारम्बार शस्त्राघात कर रहे थे। वे महान् उत्कट वीर थे और संग्राम में एक दूसरे को जीतने की आकांक्षा लिए हुए थे। निर्जिताश्च ततो देवा दैत्येन्द्राः प्रबलाः स्थिताः। तथा किलकिलायन्ति पूर्वदेवात्मसम्भवाः ॥ 11 ॥ उस युद्ध में दैत्येन्द्रगण प्रबल पड़ते थे और देवतागण हार गये थे। पूर्वदेवा अर्थात् दैत्यगण अपनी जीत की खुशी में किल-किली मारते हुए उछल रहे थे। भूमिकम्पं प्रकुर्वन्ति ह्यचाल्याः पर्वता इव। अनन्तरं सुरा इन्द्रो मन्त्रयित्वा परस्परम् ॥ 12 ॥ इससे इतना भूमिकम्प हुआ कि मानो पर्वत ही चलायमान हो गए हैं। इसके बाद, देवराज इन्द्र ने देवताओं को आमन्त्रित किया और परस्पर विचार-विनिमय किया। ततः स्मृत्वात्मशक्तीश्च ज्ञानदेहसमुद्भवाः। त्रयस्त्रिंशत्कोटयश्च सुरास्ते च महोत्कटाः ॥ 13 ॥ इन्द्र ने यह कहकर उन सभी देवताओं में बड़े उत्साह से उनमें अपनी ज्ञान देह से समुद्भव होने वाली आत्मशक्ति की स्मृति जगाई कि 'हे देवगणो! यह न भूलो कि तुम तैंतीस कोटि संख्या के महोत्कट योद्धा हो जिस पर सुरों को गर्व है। पुनरायेज्यसङ्ग्रामं दैत्येन्द्रैश्च परस्परम्। सकोपाश्चैव सङ्ग्रामे सुरासुरमहोत्कटाः ॥ 14 ॥ इसलिए निराश मत हो वो और पुनः संग्राम का आयोजन करें।' और, दैत्येन्द्रों से परस्पर सकोप संग्राम करके सभी सुर-असुर इस महोत्कट युद्ध में कूद पड़े। निर्जिता असुरा युद्धे देवाश्च प्रबलाः स्थिताः। तदाव्याप धरास्वेवं सुरराज्यं महोत्सवम् ॥ 15 ॥ इस तरह उत्साहवर्धन से देवताओं की स्थिति प्रबलतर हो गई और असुरगण उस युद्ध में हार गए। तभी से इस धरा पर यह 'सुरराज्य महोत्सव' गन्धमादन पर्वत पर मनाया जाता रहा है।