भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 324

278 अपराजितपृच्छा सुन्दर, दोनों सरिताओं के सङ्गम स्थान में एकत्र हुए थे। तत्रस्थं च सुखासीनं विश्वकर्ममहीजसम्। वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम् ॥ ३ ॥ शिरसा प्रणिपत्याथ जानुभ्यां धरणीगतः । दण्डवच्चाग्रतो भूत्वा पप्रच्छ त्वपराजितः ॥ ४ ॥ उसी काल में वहाँ पर वेद वेदाङ्ग के तत्त्व को जानने वाले और सभी शास्त्रों के विशारद महान् तेजस्वी भगवान् विश्वकर्मा सुख से विराजमान थे। उनको अपराजित ने दण्डवत प्रणाम किया, धरती पर अपने घुटने टेककर प्राणपत्य होकर, सिर झुकाकर प्रणिपात् होकर प्रश्न किया। अपराजित उवाच – कथं वास्तु समुत्पन्नं निर्मितं वा कुतः कदा। वास्तोरुत्पत्तिस्तात देवादेश्च निघण्डुकम् ॥ ५ ॥ एकपादादिकं वास्तु यावत्पदसहस्रगम्। मर्मोपमर्मवंशांश्च रेखासन्धिसुरादिकम् ॥ ६ ॥ अपराजित बोले— हे तात! यह वास्तु कैसे समुत्पन्न हुआ, कब और कहाँ निर्मित हुआ, वास्तु की उत्पत्ति, उसके सम्बन्धित निघण्टु (कोश) आदि के बारे में हे देव! आदि से बताएँ। एकपद से आरम्भ होकर जब तक एकसहस्र पद तक जाएँ उतने वास्तु के पद, मर्म, वंश, रेखा, सन्धि और सुरादिकों के विषय में भी कहें। बलिकर्मविधिं चैव वास्तुपादनिवासिनाम्। एतत्सर्वं प्रयत्नेन कथयस्व जगत्पते ॥ ७ ॥ हे जगत्पते ! इसी प्रकार बलिकर्म विधि, वास्तु पदानुसार विन्यसित होने वाले सभी दैवतगणों के बारे में भी प्रयत्नपूर्वक मुझ पर कृपा करके कहिए। देवासुरमहाघोरसङ्ग्रामवर्णनं विश्वकर्मोवाच — शृणु वत्स महाप्राज्ञ यत्त्वया परिपृच्छितम्। कथयामि न सन्देहो वास्तोरुत्पत्तिलक्षणम् ॥ ८ ॥ विश्वकर्मा बोले कि हे वत्स! महाप्राज्ञ जो कुछ तुमने पूछा है उसे कहता हूँ जिसे सुनो जिससे वास्तु की उत्पत्ति के लक्षणों के बारे में कोई सन्देह न रहे। पूर्वं देवासुरे युद्धे महाघोरे सुदारुणे। सङ्घट्टे नरसङ्कीर्णे श्रोणीगात्रेः परस्परम् ॥ ९ ॥