भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-५३ 277 तिलैर्यवैस्तथा होमं कुर्यात् पूर्णाहूतिं तथा। निवेशयेदिमं कूर्मं वेद-वादित्र-मङ्गलैः ॥ ३० ॥ ऐसे बने हुए कूर्म को यथाविधि पञ्चामृतादि से स्नान कराएँ और प्रयत्नपूर्वक अर्चना करके सुगन्धित द्रव्यों से धूप दें। फिर, तिलों से, यवों से होम करके बाजे- गाजे के साथ वेदपाठ (स्वस्तिवाचन¹), मङ्गलगान करते हुए पूर्णाहूति देने के साथ ही कूर्म को भी वहाँ निवेश करवाना चाहिए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां कूर्मप्रमाणपदप्रतिष्ठाधिकारो नाम द्विपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५२ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में कूर्मप्रमाण पद प्रतिष्ठा अधिकार नामक बावनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ५२ ॥ देवासुरसङ्ग्रामादिवास्तूद्भवो नाम त्रिपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५३ ॥ अथ पुराख्यानं कथ्यते — गन्धमादनपृष्ठेऽथ शैलराजमहोत्सवे । सुरविद्याधरै रम्भे ऋषिसङ्घसमाकुले ॥ १ ॥ सिद्धचारणसङ्गीते ह्यप्सरोगणसेविते । दिग्विदिग्वासिभीरम्ये सरिताद्वयसङ्गमे ॥ २ ॥ पूर्वकाल में गन्धमादन पर्वत पर देवताओं, विद्याधरों तथा ऋषि सङ्घों की भीड़-भाड़ में आयोजित होने वाले सुन्दर 'शैलराज महोत्सव' में सिद्ध चारणों के सङ्गीत और अप्सराओं के नृत्य-गान से सेवित दिग्दिगन्त के निवासी वहाँ प्रवहमान

  1. मयादि शास्त्रों में भी भूपरिग्रहावसर पर वेदपाठ या स्वस्तिवाचन करते हुए मङ्गल स्वरोच्चार करने पर जोर दिया है। भूमिपूजन के लिए शास्त्रों में निम्न मन्त्र आता है— समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले । विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पुण्यकर्म समारभे ॥ स्वस्तिवाचन वैदिक परम्परा है। अनेकत्र स्वस्त्ययन का निर्देश मिलता है। यह पाठ इस प्रकार किया जाना चाहिए— 'ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्ताक्ष्यों अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभं यावानो विदथेषु जग्मयः। अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसागमन्निहः ॥ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳ सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायूः ॥ शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्। पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥ अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः। विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितर्जातमदितिर्जनित्वम् ॥ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षꣳ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्ति। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्ति सर्वꣳ शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ॥ यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु। नं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः॥' सुशान्तिर्भवतु ॥ (यजु. वाजसनेयी. 25,6-12)