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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

280 अपराजितपृच्छा शैलेन्द्रात् दैत्येन्द्रागमनं — अनन्तरं महाभूता दैत्याश्चैव महोत्कटाः । (अ)वतरिताः शैलेन्द्रेषु दैत्येन्द्राश्च महोत्कटाः ॥ 16 ॥ इसके अनन्तर, महाभूता विशालकाय प्राणियों के रूप में महान्, उत्कट विकराल दैत्यगण उस पर्वतराज शैलेन्द्र से अवतरित होकर महोत्कट दैत्येन्द्र आए। शैलरूपैश्च सम्भूय सपक्षाः क्रोधपर्वताः । तथा पतन्त्युत्पतन्ति यत्र भूर्जनसङ्कुला ॥ 17 ॥ वह सभी पहाड़ों के रूप धारण किए हुए थे और उनके पङ्ख थे जिनसे ये पर्वत क्रोध करके उड़ते रहते और जहाँ कहीं भी भूमि पर लोगों की भीड़ या समूह होता उन पर बार-बार घड़ाघड़ गिर पड़ते। निर्दहन्ति धराधार्य खेटग्रामपुरादिकम्। नरोरगसुरेन्द्राश्च पर्वतैर्भस्मसात्कृताः ॥ 18 ॥ और, इस तरह भूमि का आधार ही आग से जला देते जिससे खेट, ग्राम, पुर आदि सभी आ जाते और उन स्थानों में रहने वाले नर, उरग और सुरेन्द्र आदि उन पर्वतों से चकनाचूर हो जाते और भस्मसात् हो जाते। ततो देवादिकाः सर्वे मरुत्वत्पुरमाश्रिताः । व्यज्ञापयन् सहस्त्राक्षं धराधरविनाशिनम् ॥ 19 ॥ इससे समस्त देवादिकों ने मरुतवत पुरमाश्रित होकर अर्थात् हवा की-सी शीघ्रता का आश्रय लेकर हजार आँखों वाले इन्द्रदेव को जाकर निवेदन किया कि ये धराधर अर्थात् पहाड़ विनाश करने पर उतारु हो गए हैं, उनसे हमें प्राण दिलाएँ। क्रोधादिन्द्रेण वज्रेण स्थापिता भुवि पर्वताः । छेदिताश्च ततः पक्षा अचला यत्र संस्थिताः ॥ 20 ॥ इन्द्र ने क्रोधावेश में आकर इन पर्वतों पर वज्र से प्रहार किया और उनके पङ्खों को काट गिराया जिससे वे इधर-उधर उड़कर उत्पात नहीं मचा सके और उन्हें जहाँ के तहाँ अचल होकर रहना पड़ा।¹ गङ्गायमुनयोर्मध्ये प्रारब्धो यज्ञ उत्तमः । निर्जिताश्च सुरैर्यज्ञरक्षा वज्रायुधैः कृता ॥ 21 ॥

  1. इन्द्र द्वारा पर्वतों का संहार करने का वर्णन ऋग्वेद और श्रीमद्भागवतपुराण में आया है। देवराज इन्द्र का नाम शक्र इसलिए पड़ा।

सूत्र-५३ 281 पर्वतों के पङ्ख काटकर उन्हें अचल करने का यह यज्ञ गङ्गा-यमुना नदियों के मध्य के भूभाग में आरम्भ हुआ था¹ जिसमें वज्रायुध के प्रयोग से सुरों ने यज्ञ की रक्षा की और दैत्यों को जीता। असुराश्च ततः सर्वे चिन्तातुरतया स्थिताः । नैर्ऋत्ये कुण्डसम्भूतं ²भार्गवोरुशक्त्यात्मकम् ॥ २२ ॥ दैत्यों और असुरगण भी सभी चिन्तातुर होकर नैर्ऋत्य कुण्ड से सम्भूत होने वाले उशना पुत्र भार्गव की शरण में गए। दुर्जयं दुर्निरीक्ष्यं च महोघोरं सुदारुणम्। स्फुरन्तं विद्रुमाकारं लोचनैरग्निसन्निभैः ॥ २३ ॥ उन असुरों की पुकार और दुर्जय दुर्निरीक्षा अर्थात् देवताओं को जीतना कठिन देखकर भार्गव को महाघोर क्रोधावेश हुआ। वह महादारूण, भयानक रूप में फुफकारने लगे और अपनी आँखों में क्रोधाग्नि से मानो लाल चिनगारियाँ-सी निकालने में लगे। हुताशनगर्भसम्भूतं प्रलयान्तसमप्रभम् । स्फुरत्स्फुलिङ्गं ज्वलन्तं दुर्निरीक्ष्यं भयप्रदम् ॥ २४ ॥ उस समय उनका यह भयप्रद रूप ऐसा लग रहा था मानो अग्नि के गर्भ से ही प्रलयाग्नि के समान प्रभावाली जलती मशाल से उठती हुई स्फुलिंगों, चिनगारियाँ को देखना भयभीत होने का कारण बनता है। त्रिनेत्रं विकृतं रौद्रं जटिलं वाललोहितम्। दंष्ट्राकरालमत्युग्रं मुखे दावाग्निसन्निभम् ॥ २५ ॥ उस समय भार्गव का विकराल रूप, त्रिनेत्र, संहारक शिव के त्रिनेत्रों के समान रौद्र और जटिल तेज लाल वर्ण वाला होकर अति उग्र कराल दाँतों-दाढ़ों वाला था और मुख से दावाग्नि की ज्वालाएँ निकलती थीं। कृतान्ततुल्यं दशनैश्चण्डोष्ठकपुटान्तरे। भूतलान्ते तलं तस्य आलोके बाहुपञ्जरम् ॥ २६ ॥ उनके दाँत यमराज की दाढ़ों की भाँति भयानक थे जो होठों की विशालता में और भी भयानक लग रहे थे। उनकी काया इतनी विशाल हो गई थी कि उनके पाँव

  1. गङ्गा-यमुना के मध्य में यज्ञ होने की अवधारणा शतपथ ब्राह्मण सम्मत है। कभी इस क्षेत्र में बहुत-से पेड़ थे जिनका संहारकर भूमि को यज्ञकर्म योग्य बनाया गया था।
  2. 'भार्गवा रूशनात्मकं' पाठ स्यात्। 'भागीवेषु शक्त्यात्मकम्' मिति 'न' पाठः।

८७८ अपराजितपृच्छा के तलवे भूमि के पाताल तक और उनके हाथों और शरीर का पञ्जर आसमान को स्पर्श करता-सा लग रहा था, जो तीनों लोकों तक फैल गया। स्कन्धग्रीवाकरा व्योम्नि ब्रह्माण्डे च गतं शिरः । तेजोरूपं स्फुरन्तं च प्रलये भैरवं यथा ॥ २७ ॥ उनका कन्धा, ग्रीवा और हाथ आसमान को छू रहे थे और उनका सिर ब्रह्माण्ड की ऊँचाई तक जा लगा था और उनका तेजोमय रूप ऐसा विकराल चमक रहा था जैसे प्रलयकाल में भैरव का विकराल तेजोमय रूप हो। निनदन्तं महाभीमं मन्ये कल्पान्तगर्जितम् । त्रस्तास्तु देवताः सर्वा रूपं दृष्ट्वा सुदारुणम् ॥ २८ ॥ उनकी आवाज इतनी घोर निनादयुक्त थी मानो महाभीम कल्पान्त की गर्जना हो रही हो। इस तरह का बहुत दारुण रूप देखकर भार्गव से सभी देवता त्रस्त या भयभीत हो गए थे। ध्यानयुक्ताश्च चलिताः भयभीता महोरगाः । दिक्पाला लोकपालाश्च प्रणश्यन्ति महासुराः ॥ २९ ॥ जो सदा ध्यान युक्त रहते थे, वे भी इस भय से विचलित हो गए थे और जो महान् उरग थे वे भी भयभीत थे। दिक्पालगण, लोकपालगण आदि समस्त महान् सुर देवता भय से मरणासन्न थे। ब्रह्मराक्षसवैताला आश्रयन्ति महेश्वरम् । आदित्याद्या ग्रहाः सर्वे आश्रयन्ति जनार्दनम् ॥ ३० ॥ इस बीच, ब्रह्मराक्षस और वैतालादि भय के मारे भगवान शिव के आश्रय में जा बैठे और आदित्यादि सभी ग्रह भी भयातुर होकर जनार्दन भगवान् विष्णु की शरण में चले गए। देवराजः सुरैर्युक्तः समुपास्ते जगत्पतिम् । दुर्निरीक्ष्यं दुराराध्यं कालानलसमप्रभम् ॥ ३१ ॥ तं दृष्ट्वादूतरूपं च विरञ्चिरपि विस्मितः । इसी प्रकार देवराज इन्द्र भी सभी देवताओं के साथ जगत्पिता ब्रह्मा की पर्युपासना में लग गए। ऐसे दुर्निरीक्ष्य भयानक और दुराराध्य महाकालाग्नि के समान, अद्भुत रूप को देखकर विरञ्चि भगवान् ब्रह्मा भी विस्मित हो गए थे। दुर्जयं दुर्निरीक्ष्यं च महोघोरं सुदारुणम् ॥ ३२ ॥ स्फुरन्तं विद्युदाकारं लोचनैरपि सन्निभः ।

सूत्र-५३ 283 भूः क्रान्ता पादतलतो ब्रह्मलोकं गतं शिरः ॥ ३३ ॥ वे सोचने लगे कि यह दुर्जय और दुर्निरीक्ष्य, महाघोर दारुण भयानक रूप, जो बिजली के समान चमकते व कड़कते नेत्रों वाला है और इसका पदतल भूमि से भी क्रान्त, अतिक्रमण कर रहा है और सिर ब्रह्मलोक तक जा पहुँचा है। तस्य रूपभयाद्भीताः त्रिदशासुरराक्षसाः । नष्टाश्च ऋत्विजो ब्रह्मा शक्राद्या द्वारपालकाः ॥ ३४ ॥ उसके ऐसे रूप से सभी देवता, राक्षस और असुरगण भी भयभीत है और सभी ऋत्विजगण, ब्रह्मा, इन्द्रादि सभी द्वारपाल नष्ट प्रायः हो गए। तत्र देवा द्विजा राजा आश्रयन्ति महेश्वरम् । 'रक्ष रक्ष महादेव-भयभीतान् जगत्प्रभो ॥ ३५ ॥ यह सब विचित्रता देखकर सभी द्विज और राजा भी भगवान् महेश्वर के आश्रय में जा पहुँचे और पुकार करने लगे कि हे महादेव ! जगत्प्रभो ! ! हम भयभीत लोगों की रक्षा कीजिए। महद्भूतं मर्त्यलोके यज्ञे च रिपुक्रोधजम् । सुरराजद्विजानां च भूमौ रक्षाकरो भवान् ॥ ३६ ॥ (सभी ने कहा कि) हे प्रभु ! मृत्युलोक में यज्ञों में महान् क्रोध से रिपु द्वारा महान् सङ्कट उत्पन्न कर दिया गया है। अस्तु, सुरराज इन्द्र और ब्राह्मणों की तथा इस भूमि की आप रक्षा कीजिए। प्रत्यक्षं भव ईशान सुरार्थे द्विजभूपते । महद्भूतं महादेवं दैत्यानां दहनं परम् ॥ ३७ ॥ हे ईशान ! महादेव शिव !! कृपा करके आप देवताओं, ब्राह्मणों और भूपति राजाओं के लिए प्रत्यक्ष प्रकट होकर हे महद्भूत महादेव ! आप दैत्यों का पूर्ण दहन कर दीजिएगा। ललाटनेत्रसङ्क्रुद्धं कालरूपमिवापरम् । वलोकितो भवो भद्रे असाध्ये वृद्धताङ्गतः ॥ ३८ ॥ आपके ललाट के तीसरे नेत्र के संक्रुद्ध होने पर तो महाकालरूप से भी परम भयानक दृष्टि के सामने असाध्य भी भद्र होकर वृद्धि को प्राप्त करने लगते हैं। मूलकल्पोद्भवं यत्र निग्राह्यमस्तकोभवम् ।' वलोकितं तदा चक्रं त्रिषु लोकेषु मध्यतः । लीयते शिवदेहे तु यत्र स्यात्सुरसम्भवः ॥ ३९ ॥

284 अपराजितपृच्छा

मूलकल्प से उत्पन्न इस आपत्ति को निग्रह करके उसको अस्तगत कर दीजिए। तब तीनों लोकों के मध्य में इस चक्र को देखकर भगवान् शिव ने अपनी शिवदेह में लीनकर लिया और तब से देवताओं का जीवन पुनः सम्भव हो सका।¹ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां देवासुरसंग्रामादिवास्तूद्भवाधिकारो नाम त्रिपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५३ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में देवासुरसंग्रामादि वास्तु उद्भव अधिकार नामक तिरपनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ५३ ॥

वास्तूत्पत्तिर्नाम चतुःपञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ ५४ ॥ रुद्र उवाच — भो भार्गव महावीर कस्मात्स्थानादुपागतः । कृतं त्वया त्वद्भुतं हि धराधर्मविनाशनम् ॥ १ ॥ (पूर्व सूत्रानुसार) रुद्र बोले कि हे भार्गव महावीर! आप कहाँ से आए हैं और आपके द्वारा किया गया यह धराधर्म का विनाश कार्य भी बहुत ही अद्भुत है।


  1. एष वास्तुपुरुषकथावस्तुसङ्क्षेपः— पुरा किल देवासुरे युद्धे विष्णुसाह्येन पराजितानां स्वशिष्याणां विजयाय सलक्षणम् छागमभिचारविधानेन जुह्वतः शुक्रस्य स्वेदाम्भःकणिकायामग्नौ पतितायां तत एको महासुरोऽतिभीषणाकारः समुदभूत्। छागाननत्वाच्छागासुर इति प्रख्यातः स चासुरसम्राट स्वपितुः शुक्रस्याज्ञया देवान् भुजबलेन विद्राव्य तदाश्रयाणां लोकानामपि महत् कदनमुपजनयन्नवर्तत। अथ शुक्रतपःप्रभावात् क्षणे-क्षणे वर्धिष्णुनामुना वीर्योत्सिक्तेन महासुरेण बहु कदर्शिता देवाः कालपर्यायात् किञ्चिदपि प्रतिकर्तुमपारयन्तो दुष्टदमनदीक्षितं भगवन्तं त्रिपुरान्तकं शरणमापुः। ततः स्वभक्तेभ्यो द्रुह्यतेऽस्मै क्रूराय क्रुध्यन् कृपानिधिर्महादेवोऽस्य प्रशमनाय स्वतृतीयनेत्रात् सर्वसंहारक्षमं प्रलयानलमुत्थाप्य तमभि प्राहिणोत्। ज्वालामालया व्याप्तदिगन्तराले तस्मिंश्च कालानले त्रिलोकीं भ्रमन्तमपि तमभिद्रुत्य दग्धुमुपस्थिते स छागासुरो भीतभीतः प्रशान्तमनाः शरणकामनया तनीयसीं तनुमाश्रित्य महेश्वरस्योदरं प्रविवेश। तेन तुष्टो भगवानप्यस्मै अभयं प्रदाय शुक्लरूपेण स्वोदरात् तं निर्गन्तुमाज्ञापयत्। तथा निर्गतत्वात् तदाप्रभृति शुक्र इति प्रथितः स भगवन्तं दण्डवत् प्रणत एव सन् क्षोणीतले वस्तुं, स्वशरीरे ब्रह्मादिका नवस्थापयितुं च वरमयाचत। तदनुसारेण भगवानपि— 'वस्तुं वरं त्वया। वृतोऽहं यत् ततो नाम्ना वास्तुकोऽसि तथास्तु ते। वसन्तु च त्वयि प्रीताः शतानन्दादिदेवताः ॥ अद्यप्रभृति भूलोके दैवं वान्यच्च मानुषम्। कुर्वते वास्तु वासार्थं प्रथमं त्वां यजन्तु ते॥ पुष्पैश्च धूपदीपैश्च बलिभिश्च विलक्षणैः। त्वं च त्वद्देहसंस्थाश्च पूज्याः स्युर्देवताः क्रमात्॥ एवं मयैव विहितं कुर्वतां वास्तुपूजनम्। तदायतनवेश्मादौ वसतां सन्तु सम्पदः ॥ अकृत्वा वास्तुयजनं प्रासादभवनादिकम्। कृतं तदासुरं सर्वं भूयात् तत्र च यत् कृतम् ॥' (ईशानशिवगुरुदेवपद्धति क्रियापाद, उत्तरार्ध 26, 117-123) इति तस्मै वरं दत्तवान्। तच्छरीरे वस्तुं देवान् न्ययोजयच्च। तेन स महेशं प्रणत एवाद्यापि क्षोणीतले शेत इति। एषा च कथा शैवसम्प्रदायप्रवृत्तानां गुरुदेवादीनां मतमनुसृत्य विवृता।

सूत्र-५४ 285 सामर्थ्यतो विसृजता पुरुषं यज्ञध्वंसकम्। इन्द्राद्या असुरपार्श्वे निग्राह्य इति निश्चयात् ॥ २॥ इस यज्ञध्वंश कार्य को पुनः सुधारने में समर्थ जो इन्द्रादि देव और असुरगण हैं, वे भी तुम्हारे पास में निश्चय ही निग्राहावस्था या कैदी तुल्य हो चुके हैं। शुक्र उवाच - पुरा चाऽऽराधितो दिव्यं वर्षसहस्रकम्। तदाज्ञया मया लभ्या विद्यामरत्वदायिनी ॥ ३॥ इन्द्र ने कहा कि पूर्वकाल में जिस देवता की मैंने सहस्र दिव्य वर्ष तक आराधना की थी, उसी की आज्ञा से मुझे अमरत्वदायिनी विद्या का लाभ हुआ है।¹ रुद्र उवाच - दिव्यं वर्षसहस्रं च तपः कृत्वा सुदारुणम्। तोषितोऽहं तथा विष्णुः शुक्रेण मुनिना त्वया ॥ ४॥ रुद्र ने कहा कि हजारों दिव्य वर्षों तक का जो इतना कठोर तप है, शुक्र मुनि आपके द्वारा किया गया है। उससे मैं और भगवान विष्णु भी बहुत ही सन्तुष्ट और प्रसन्न हुए हैं। त्वया लिङ्गोद्भवे² व्योम्नि तुष्टो देवो जगत्पतिः । ध्यानं मन्त्रजपं कृत्वा प्रीणय त्वं परेश्वरम् ॥ ५॥ तुम्हारे द्वारा व्योम तक उद्भव को प्राप्त लिङ्ग स्वरूप जगत्पति देव तुष्ट हुए हैं और ध्यान तथा मन्त्र जाप करके तुमने परमेश्वर की प्रसन्नता प्राप्त की है। प्रासादान्मान्त्रिकी विद्या सप्ताक्षर्यथ संहिता। तुष्टेन कथिता विद्या सर्वकर्मानुसारिणी ॥ ६ ॥ और, उस प्रसन्नता के फलस्वरूप ही तुम्हें यह 'प्रासादमान्त्रिकी विद्या' और 'सप्ताश्चर्य संहिता' मिली है। यह 'सर्वकर्मानुसारिणी विद्या' भी उनकी प्रसन्नता से, तुष्टि मिलने के कारण ही तुम्हें कही गई है। साधयामि यत्कृते च सर्वदेवभयङ्करम्। मन्त्रैः स्तुत्या च युद्धैश्च दायं दास्यन्ति देवताः ॥ ७॥

  1. इत्यमनन्तर 'सदा च भवतुष्टित वेष्ट्य तदधासुरासुरैध। आज्ञालोपं भव प्रभो तवशास्त्रमयोच्छेद। उदकस्या प्रीतप्रियते अग्रिमध्ये समुत्पन्नां आबाधादेवदानवैः ॥' इत्यादयो... 'न' पाठः ।
  2. 'जरा ? लिङ्गोद्भवे' इति प्रकाशित पाठः । न पाठे नोपलब्धते ।

286 अपराजितपृच्छा परन्तु, हे सर्वभयङ्कर देव! मैं तुम्हारे द्वारा किए गए विनाश को सुधारने हेतु मन्त्रों द्वारा तुम्हारी स्तुति की साधना करके अथवा तुमसे साक्षात् युद्ध करके देवताओं का दायभाग उन्हें वापस दिलाऊँगा। अहो ये मुनः सर्वे रुद्रेशं पुरुषोत्तमम्। उपाश्रयन्ति देवेशं भयं जयन्ति निर्जराः ॥ 8 ॥ देखो, ये सभी मुनिगण भी भय से परास्त होकर पुरुषोत्तम भगवान् रुद्र देवेश के उपाश्रय में आ गए हैं। पद्मासन शृणु त्वं च विष्णुर्वचनमब्रवीत्। न त्वया वध्यते साधो अस्माभिर्न च दैवतैः ॥ 9 ॥ तब भगवान् शिव की युद्ध से या आराधना से शुक्राचार्य को जीतने की यह प्रतिज्ञा सुनकर भगवान् विष्णु ने इन वचनों को कहा- 'हे पद्मासनस्थ, आप यह ध्यान देकर सुने कि न तो यह साधु शुक्राचार्य तुमसे वध को प्राप्त हो सकते हैं न मुझसे और न ही अन्य देवताओं से इनका वध हो सकता है। मन्त्रमूर्तिरियं वास्तू रुद्रदेहसमुद्भवः। इदं तु वास्तुरूपं च दुर्धरं च पुनः शिवात् ॥ 10 ॥ 'क्योंकि, ये स्वयं मन्त्रमूर्ति रूप में वास्तु है, जो रुद्र भगवान् शिव की देह से समुद्भूत हुए हैं। इसलिए अब तो ये वास्तु रूप होकर स्वयं भगवान् शिव से भी पुनः अधिक दुर्धर, असाध्य और अजेय हो गए हैं। अतः शिव भी इन्हें नहीं जीत सकते।' इदं च वचन श्रुत्वा पद्मभूः पुरुषोत्तमात्। शरणं वद देवानां विष्णुरद्भुतविक्रमः ॥ 11 ॥ भगवान् विष्णु के ये वचन सुनकर पद्मभूः ब्रह्मा ने देवताओं को कहा कि अब तो तुम सब अद्भुत विक्रमी भगवान् विष्णु की ही शरण में जाओ। रुद्रलोके ततो गत्वा ध्यात्वा देवं महेश्वरम्। अद्भुतं भूतमभ्यर्च्य भूतं दृष्ट्वा च भूतले ॥ 12 ॥ तब वे सभी देवगण रुद्रलोक में पहुँचकर भगवान् महेश्वर का ध्यान करने लगे और भूतल पर भूतों को देखकर सब से अद्भुत भूत भगवान् रुद्र की अभ्यर्थना करने लगे। यदा सत्त्वं भवेद् ज्ञानं ¹भवेत्तुष्टिभवोऽवृथा। तदा सुरासुरैर्वन्ध्य आज्ञालोपो भवेत्प्रभोः ॥ 13 ॥

  1. 'भवेत्तुष्टिर्भवो ? वृथा' प्रकाशित पाठः।

सूत्र-५४ 287 वे कहने लगे कि हे प्रभु! यदि आप हम पर तुष्ट हो गए हो तो कृपा करके आप सत्य रूप में प्रकट होकर हमें ऐसा ज्ञान दें, जो अवृथा हो, अचूक हो। तभी सुर और असुरों के द्वारा वध्य होने की आज्ञा का लोप हो सकता है। शास्त्रच्छेदो न च भवेत् म्रियते न तथोदके। अग्निदेवात्समुत्पन्नो ह्यवन्ध्यो देवदानवैः ॥ 14 ॥ तब न तो कोई शस्त्र से छेदन या मारण होगा न ही जल में डुबोकर मारना सम्भव होगा क्योंकि अग्निदेव से समुत्पन्न होने से देव-दानव सभी से अवध्य ही है। ईश्वर उवाच — शृणु भार्गव दैत्येन्द्र विद्याप्रस्तारनिर्णयम्। त्रिषु स्थानेषु प्रस्तार्य्य गुरुस्थाने नियोजितः ॥ 15 ॥ ईश्वर ने कहा कि हे भार्गव दैत्येन्द्र सुनो ! हमारा विद्या प्रस्तार निर्णय यह है कि तीन स्थानों में प्रस्तार करके हम तुम्हें गुरु स्थान में नियोजित करते हैं। अविद्यागुरुलब्धाऽङ्गदोषपापानुसङ्ग्रहे। ज्ञानोन्मीलनं तद्भक्त्वा विद्यासिद्धिश्च वृद्धतः ॥ 16 ॥ अविद्यागुरु, लोभी-अङ्गदोषी और पाप की कमाई से संग्रह करने वाले इन तीन प्रकार के गुरुओं से ज्ञान उन्मीलन होगा तब तुम्हारी भक्ति से विद्यासिद्धि भी बढ़ेगी।

288 अपराजितपृच्छा पुण्य प्रतिष्ठावसर सात प्रकार के हैं¹ और शान्तिकर्म भी चौदह प्रकार के हैं² अस्तु, समस्त पुण्यस्थानों में इस विद्या की भी पूजा होनी चाहिए। एषां वृद्धिं च सन्त्यज्य ? ततो यान्ति स सूक्ष्मतः ? । ब्रह्माद्याश्च सुराः सर्वे निवसन्त्यस्यदेहके ॥ 20 ॥ इसकी अच्छी प्रकार पूजा करके (संपूज्य?) वृद्धि को प्राप्त करके फिर वह सूक्ष्म दृष्टि युक्त होता है अथवा (धीमतः ?) बुद्धिमान होता है जिससे ब्रह्मा से लेकर सभी देवता उसके देह में आकर निवास कर लेते हैं। यदा विमुक्तो देवैस्तु अस्य पूजा न दीयते । ततः काले समुद्भूतः सुरासुरभयङ्करः ॥ 21 ॥ यदि इस विद्या को पूजा न दी जाए और व्यक्ति देवों से भी विमुक्त हो जाए तो ऐसी दशा में भयङ्कर सुर-असुरों का समुद्भव हो जाता है। देवतागृह आद्यानां³ शिवः साक्षाद्भूगोदितः ।

  1. प्रासादमण्डनम् में कहा गया है कि इस प्रकार देवालय के निर्माणारम्भ से लेकर निर्माणोपरान्त देवप्रतिष्ठा तक सात कर्म होते हैं जिन्हें यथा विधि, निर्देश पूरा करना चाहिए। ये कर्म हैं- 1. कूर्म स्थापना, 2. द्वार स्थापना, 3. पद्मशिला स्थापना, 4. प्रासादपुरुष की स्थापना, 5. कलश, 6. ध्वजारोहण तथा 7. देवप्रतिष्ठा। इन सभी अवसरों पर वास्तुपूजन आवश्यक है। इससे कार्य निर्विघ्न, निरापद सम्पन्न होता है। कूर्म्मसंस्थापने द्वारे पद्माख्यायां तु पौरुषे। घटे ध्वजे प्रतिष्ठायां एवं पुण्याहसप्तकम् ॥ (प्रासाद. 1, 36 एवं 8, 37) इसी प्रकार अपराजित. के मिश्रकप्रासादसप्तपुण्याहमाहात्म्यसूत्र में भी इस सम्बन्ध में निर्देश किया गया है- कृते कूर्मप्रतिष्ठायाः खाते पूर्णे च संस्थितौ। भूमिलोके तथा राज्यं सर्वजन्मसु शाश्वतम् ॥ प्रतिष्ठायां शिलायास्तु दैवतैस्सत्यमुच्यते। इच्छास्थाने स्वर्गलोके राज्यं जन्मनि जन्मनि ॥ द्वारे प्रतिष्ठामाने तु स्तम्भोच्छ्रयसमन्विते। महापुरं च लभते काञ्चनं शतयोजनम् ॥ पद्मशिला प्रतिष्ठायां शिवालये भूमस्तके। एकच्छत्रं महाराज्यं जनलोके च प्राप्नुयात् ॥ पुरुषे स्थाप्य मानेत्वागमोक्तमन्त्रतस्तथा। तपालोके ब्रह्मलोके क्रीडति त्रिदशैः सह ॥ प्रस्थाप्यमाने कलशे क्षीरार्णवसमुद्भवे। काञ्चने पुष्पविमाने सत्यलोके स गच्छति ॥ कृते महाध्वजारोपे पताकाध्वजचामरैः। स गच्छेद ज्ञानलोके तु यत्र शम्भुश्च देवता। बलीवर्दाः कर्मकरा अपराश्च शिवालये। ते यान्ति परमं लोकं यत्र देव उमापतिः ॥ मृत्काष्ठलोहशैला वा ये लग्नाश्च शिवालये। दिव्यमूर्तिधराः सर्वे शिवलोक व्रजन्ति ते ॥ (अपराजित. 114, 11-19)
  2. शान्तिपूजादि के चौदह चरण निम्न हैं- 1. भूम्यारम्भ अथवा भूमि का चयन, 2. कूर्मन्यास, 3. शिलान्यास, 4. सूत्रपात या आरेखन, 5. खुरशिला स्थापना, 6. द्वार, 7. कुम्भ या स्तम्भ स्थापना, 8. पट्ट्यारोहण, 9. पद्मशिला, 10. शुकनासिका, 11. प्रासादपुरुष की स्थापना, 12. घण्टिका या आमलक,
  3. कलश स्थापना और 14. ध्वजारोहण, ये चौदह अवसर हैं, जबकि स्थापक को शान्तिकर्म का विधान अवश्य ही करना चाहिए- भूम्यारम्भं तथा कूर्में शिलायां सूत्रपातने। खुरे द्वारोच्छ्रये स्तम्भे पट्टे पद्मशिलासु च ॥ शुकनासे च पुरुषे घण्टायां कलशेस्तथा। ध्वजोच्छ्रायेण कुर्वीत शान्तिकानि चतुर्दशः ॥ (प्रासाद. 1, 37-38)
  4. 'देतागृहवावाद्यां?' इति प्रकाशित पाठः। 'देवतागृहवावाद्या शिवसाक्षात्भूगोदित। सांकल्पपुण्यस्थानानि पूजा चास्य निवेदितम्' इति न पाठः।

सूत्र-५४ 289 सङ्कल्प्यपुण्यस्थानानि पूजा चास्य निवेदिता ॥ २२ ॥ देवतागृह, प्रासाद-मन्दिर और गृह आदि को स्वयं शिव ने साक्षात् देकर भृगु में वास्तुविद्या के प्रकाश से उदित किया है जिससे पुण्य स्थानों की सङ्कल्पना हुई और उनकी पूजा के साथ यह विद्या (वास्तुविद्या की पूजा) निवेदित की गई। तदा तत्सूक्ष्मतां याति विद्यारूपं महासनम् । सुरैराक्रम्यते स्मैवमधोवक्त्रं निपातितम् ॥ २३ ॥ (यहाँ वास्तु की उत्पति कही जा रही है) इसके बाद, सूक्ष्मता से यह विद्या विस्तृतविद्या का स्वरूप धारण कर सकी। इस विद्या पर देवताओं ने आक्रमण करके इसे औंधे मुख गिरा दिया। संस्थाप्य मध्यपाताले सुहितैः सुरसङ्घटैः । तद्वच्च संस्थिताः पूज्या ब्रह्माद्या देवतास्तथा ॥ २४ ॥ और, इसे मध्य पाताल में स्थापित करके देवताओं के समूह एवं संगठन का सुहित, भलाई, साधी परन्तु वहाँ संस्थित करके भी इसे ब्रह्मादि सभी देवताओं द्वारा पूज्या ही माना जाता रहा। शिरस्तस्यैवमीशाने पादौ नैर्ऋत्यगोचरौ। अग्निकोणे च वायव्ये प्रकोष्ठजानुसंस्थितिः ॥ २५ ॥ इस वास्तु का शिर ईशानकोण में और पाँव नैर्ऋत्य कोण में और अग्निकोण और वायव्यकोण में इसकी कमर कोहनी और जङ्घाएँ स्थित हैं। पञ्चचत्वारिंशद्देवा₄₅ देव्राष्टकमथापि₈ च। त्रिपञ्चाशच्च₅₃ त्रिदशाः पूज्यास्तत्र क्रमोदिताः ॥ २६ ॥ इसके देह में पैंतालीस देवता और आठ देवियाँ स्थित हुईं। इस प्रकार कुल तिरेपन देवताओं की क्रमोदित पूजा इसमें उदित हुई।¹ इस श्लोक में भृगु के वास्तुशास्त्र का सङ्केत आया है। मत्स्यपुराण में भृगु के वास्तुशास्त्र का विवरण है— भृगुरत्रिवसिष्ठश्च विश्वकर्मा मयस्तथा। नारदो नग्नजिच्चैव विशालाक्षः पुरन्दरः ॥ ब्रह्मा कुमारो नन्दीशः शौनको गर्ग एव च। वासुदेवोऽनिरुद्धश्च तथा शुक्रबृहस्पती ॥ अष्टादशैते विख्याता वास्तुशास्त्रोपदेशका। (मत्स्य. 252, 2-4) शुक्रनीति से यह विवरण मिलता है, किन्तु वह परवर्ती ग्रन्थ है।

  1. वास्तुपुरुष की उत्पत्ति और उसके पूजा विधान की आवश्यकता पर उपरोक्त प्रकाश पड़ता है। मत्स्यपुराण में आया है कि अन्धकासुरवध के समय शिव के ललाट से गिरे स्वेदबिन्दु से विकराल मुख वाले उत्कट प्राणी की उत्पत्ति हुई। उसके क्षुधातुर होने पर शिव ने उस पर अनुग्रह किया। उक्त प्राणी भूमण्डल और आकाश को अवरुद्ध करता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा, देवताओं ने उसे स्तम्भित किया और जो देवता जहाँ था, वहीं पर उस प्राणी की देह पर स्थित हो गया— स्वदेहानान्तरिक्षं च रुन्धानं

290 अपराजितपृच्छा इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां महेश्वरशुक्रसंवादे वास्तूत्पत्त्यधिकारो नाम चतुःपञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ 54 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में महेश्वर- शुक्र संवाद में वास्तु उद्भव अधिकार नामक चौपनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 54 ॥ वास्तूत्पत्त्यधिकारे देवतान्यासो नाम पञ्चपञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ 55 ॥ विश्वकर्मोवाच — ईशस्तु संस्थितो मूर्ध्नि पर्जन्यः कर्णयोर्दितिः । जयादिती स्कन्धयोश्च ह्युभयोर्वामदक्षिणम् ॥ 1 ॥ (अब वास्तुपुरुष पर देवताओं की न्यास स्थिति बताई जा रही है) विश्वकर्मा बोले कि वास्तुपुरुष के मुँह पर ईश, कानों पर दिति और पर्जन्य तथा दोनों ही वाम- दक्षिण कन्धों पर अदिति और जयादिति का निवास कहा गया है। आपस्तथा च गलके आपवत्सो हृदि स्थितः । मरीचिः पृथ्वीधरश्च संस्थितौ स्तनयोर्द्वयोः ॥ 2 ॥ गले में आप और हृदय स्थान में आपवत्स तथा दोनों स्तनों पर मरीचि और पृथ्वीधर का निवास है। नाभिमध्ये स्थितो ब्रह्मा नाभिपृष्ठानुसंस्थितौ । सावित्री कुक्षिमध्ये तु रुद्रदासो द्वितीयके ॥ 3 ॥ नाभि के मध्य में ब्रह्मा और नाभि के पीठ पर सावित्री तथा काँखों के मध्य रुद्र और रुद्रदास का निवास है। इन्द्र इन्द्रजयश्चैव श्रोणीमध्ये तु संस्थितौ । अङ्गुष्ठाग्रे च पितरौ गुल्फे दौवारिको मृगः ॥ 4 ॥ इन्द्र और इन्द्रजय कुल्हों के मध्य में, अँगूठों के अग्रभाग में पितरगण और टखनों पर दौवारिक का निवास है। अन्तरिक्षः कूर्पराग्रे नागश्चैव द्वितीयके । वामे जानौ स्थितो रोगो दक्षिणे चाग्निदेवता ॥ 5 ॥ प्रपतद् भुवि ॥ भीतभीतैस्ततो देवैर्ब्रह्मणा चाथ शूलिना। दानवासुररक्षोभिरवष्टब्धं समन्ततः ॥ येन यत्रैव चाक्रान्तं स तत्रैवावसत् पुनः। निवासात् सर्वदेवानां वास्तुरित्यभिधीयते ॥ अवष्टब्धेन तेनापि विज्ञाताः सर्वदेवताः। प्रसीदध्वं सुराः सर्वे युष्माभिर्निश्चलीकृतः ॥ (मत्स्य. 252, 12-15)

सूत्र-५५ 291 एक कोहनी पर मृग, अन्तरिक्ष और दूसरी कोहनी पर नाग, बाँयें घुटने पर रोग और दाहिने घुटने पर अग्नि देवता का निवास है। महेन्द्रादित्यसत्यादि भृशान्ता दक्षिणे भुजे। मुख्यभल्लाटसोमादि गिर्यन्ता वामके भुजे ॥ 6 ॥ महेन्द्र, आदित्य, सत्य, भृशान्तगण दाहिनी भुजा पर तथा मुख्य, भल्लाट, सोम, गिर्यन्तगण (शैल) बाँयी भुजा पर वास करते हैं। सविता याम्यतो बाहौ रुद्रश्चैव द्वितीयके। मित्रश्च वामत ऊरौ विवस्वांश्चैव दक्षिणे ॥ 7 ॥ सविता बायीं बाँह पर और रुद्र दूसरी दायीं बाँह पर तथा मित्र बायें उरु भाग पर और विवस्वान दायें उरु भाग पर निवास करते हैं। सुग्रीवः पुष्पदन्तश्च वरुणासुरशोषकाः। पापयक्ष्मा षडेते वै नलके वामके स्थिताः ॥ 8 ॥ सुग्रीव, पुष्पदन्त, वरुण, असुर, शोषका और पापयक्ष्मा- ये छहों बायें नलके में स्थित कहे गए हैं। पूषा च वितथश्चैव गृहक्षतयमो तथा। गन्धर्वभृङ्गा देवाः षड् दक्षिणे नलके स्थिताः ॥ 9 ॥ इसी प्रकार पूषा, वितथ, गृहक्षत, यम, गन्धर्व, भृङ्ग देवता- ये छहों दक्षिण नलके में अवस्थित हैं। ईशोर्ध्वे चरकीं विद्यात् पावकोर्ध्वे विदारिकाम्। निर्ऋत्यूर्ध्वं पूतनां च रोगोर्ध्वं पापराक्षसीम् ॥ 10 ॥ ईश के ऊपर (बाहर) चरकी और अग्नि के ऊपर विदारिका, नैर्ऋत्य के ऊपर पूतना और रोग के ऊपर पापराक्षसी का निवास है। प्राच्यां तु पिलिपिच्छां स्याज्जृम्भा स्याद्याम्यतो दिशि। वारुण्यां विन्यसेत्स्कन्दामर्यमा चोत्तरस्थिता ॥ 11 ॥ पूर्व दिशा की ओर पिलिपिच्छा एवं पश्चिम दिशा में जृम्भा, वारुणी दिशा में स्कन्द तथा उत्तर दिशा में अर्यमा का निवास है। नास्ति चासां पदविधिः पूजां गृह्णन्ति केवलम्। निवासः सर्वदेवानां वास्तु वै स्थानतो विदुः ॥ 12 ॥ इन सभी बाह्य देवताओं की कोई पद विधि नहीं है, ये केवल पूजा ही ग्रहण

292 अपराजितपृच्छा करते हैं। इस तरह विद्वान् लोग वास्तुपुरुष में सभी देवताओं के निवास स्थान को जानते हैं और उनमें उनका निवास मानते हैं। अङ्गं सन्धि च सूत्रादिं विद्यात्पश्चाच्च वास्तुनः। समस्तपुण्यस्थानानि वास्तुपूजासु वै विदऊः ॥ 13 ॥ अङ्ग, सन्धि, सूत्रादि जानने के पश्चात् ही वास्तु के समस्त पुण्यस्थानों की वास्तुपूजा विद्वान् लोगों को करनी चाहिए। द्व्यष्टसन्धि तथाष्टाङ्गं द्व्यष्टसूत्रं तथैव च। पञ्चक्षेत्रमिदं वास्तु स्वरूपं पुरुषाकृति ॥ 14 ॥ सोलह सन्धि तथा आठ अङ्ग, सोलह सूत्र वाले वास्तु के पाँच क्षेत्र है और इनका स्वरूप पुरुषाकृति का है। वास्तोत्पत्ति अङ्गमाह — वास्तोत्पत्तिः पूर्वमङ्गं यक्षोत्पत्तिर्द्वितीयकम्। चतुर्थकं तथा सूत्रं तृतीयं भूपरिग्रहः ॥ 15 ॥ पञ्चमं वेश्माधिकारं षष्ठं च सुरसद्मकम्। सप्तमं लिङ्गमूर्त्त्याद्यं प्रतिष्ठाविधिषष्टमम् ॥ 16 ॥ पहला अङ्ग वास्तु की उत्पत्ति है, दूसरा अङ्ग यक्ष की उत्पत्ति है, तृतीय अङ्ग भूपरिग्रह है और चौथा अङ्ग सूत्र है, पाँचवाँ अङ्ग वेश्माधिकार है, छठा अङ्ग सुरसद्म, मन्दिरादि है और सातवाँ अङ्ग लिङ्ग-मूर्त्यादि है और उनकी प्रतिष्ठा विधि ही वास्तु का आठवाँ अङ्ग है। इमान्यष्टाङ्गसूत्राणि वास्तुवेदोदितानि च। वास्तुवेदोद्भवं चाद्यं समस्तं सूत्रनिर्गतम् ॥ 17 ॥ ये आठों ही अङ्गसूत्र वास्तुवेदोदित या वास्तुशास्त्र में कहे गए हैं। अस्तु, वास्तु वेद से ही आद्यादि समस्त सूत्रों का निकास हुआ है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वास्तूत्पत्यङ्गे देवतान्यासाधिकारो नाम पञ्चपञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ 55 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वास्तु उत्पत्ति, अङ्ग अधिकार नामक पचपनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 55 ॥

सूत्र-५६ 293 वास्तुदेवतानिघण्टुर्नाम षट्पञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ ५६ ॥ विश्वकर्मोवाच — निघण्टुः प्रोच्यते नानावास्तुपदनिवासिनाम्। ईशादीनां च देवानां प्रदक्षिणमनुक्रमम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा ने कहा कि वास्तुपदों के निवासी नाना देवताओं के वास्तुपद के निवास को ईशादि देवताओं के प्रदक्षिणा क्रम से निघण्टु को कहा जा रहा है। ईशश्च शङ्करो देवः पर्जन्यो वृष्टिकारकः। जयन्तः काश्यपो देवः स्वयं ¹वृष्टिकरो मुनिः ॥ २ ॥ (निघण्टु के अनुसार) ईश शङ्कर देव है; पर्जन्य वृष्टिकारक देव है; जयन्त काश्यपदेव भी स्वयं वृष्टिकर्ता मुनि है। महेन्द्रश्च सुराधीश आदित्यश्च प्रभाकरः । सत्यश्चैव स्वयं धर्मो भृशो मन्मथ उच्यते ॥ ३ ॥ महेन्द्र सुराधीश इन्द्र है और आदित्य प्रभाकर (सूर्य) है; सत्य तो स्वयं धर्मराज ही है तथा भृश को मन्मथ कामदेव कहते हैं। नमोऽन्तरिक्ष आकाशमग्निस्तेजः समुद्भवः। पूषा मातृगणाश्चैव चाधर्मो वितथाभिधः ॥ ४ ॥ नम, अन्तरिक्ष, आकाश तथा अग्नि को तेज समुद्भव भी कहते हैं; पूषा को मातृगण और अधर्म को वितथ नाम दिया गया है। गृहक्षतो बुधश्चैव यमः प्रेताधिपस्तथा । गन्धर्वो नारदः प्रोक्तो भृङ्गीराण् निर्ऋतेः सुतः ॥ ५ ॥ गृहक्षत को बुध तथा यम को प्रेतों का राजा या प्रेताधिप भी कहते है; गन्धर्व को नारद व भृङ्गिराट् को निर्ऋति सुत कहा है। मृगोऽनन्तः स्वभूर्धर्मो विश्वेदेवास्तु पितरः । दौवारिको भवेन्नन्दी सुग्रीवो मनुदेवता ॥ ६ ॥ मृग को अनन्त; स्वभूः को धर्म; विश्वेदेवों को पितर, दौवारिक को नन्दी, सुग्रीव को मनु देवता कहा है।

  1. 'सृष्टिकरो मुनिः' स्यात्। विष्णुमार्कण्डेय प्रभृति पुराणान्तर्गते काश्यपीयसृष्टिसर्गादिवर्णनं मिलितौ। कतिपय आलोचकों ने वास्तु के अनेक देवताओं को प्रचलित देवताओं के नामों के अनुसार नहीं मानते हुए कल्पितभर कहा है, ऐसे में यह सूत्र उनके वास्तविक स्वरूप-मान्यताओं को परिभाषित करता है।

294 अपराजितपृच्छा महाजवः पुष्पदन्तो वरुणः सलिलाधिपः । असुरो राहुराख्यातः शोषः सौरिः शनैश्चरः ॥ ७ ॥ महाजव को पुष्पदन्त; वरुण को सलिलाधिप तथा असुर को राहु कहा है और शोष को सौरि या शनैश्चर भी कहते हैं। पापयक्ष्मा क्षयः प्रोक्तो ज्वरो रोगश्च दूषकः । नागस्तु वासुकिः प्रोक्तो मुख्यस्त्वष्टा च विश्वकृत् ॥ ८ ॥ पापयक्ष्मा को क्षय; ज्वर को रोगदूषक, नाग को वासुकी और मुख्य त्वष्टा को विश्वकृत कहा गया है। भल्लाटश्चन्द्र इत्युक्तः सोमश्चैव कुबेरकः । गिरिश्च हिमवान् शैलो ह्यदितिः श्रीः प्रकीर्तिता ॥ ९ ॥ भल्लाट को चन्द्र कहा है और सोम को कुबेर बताया गया है; गिरि को हिमवान् शैल तथा अदिति को श्री के रूप में जानना चाहिए। वृषध्वजो दितिः शर्व आपश्चैव धरार्णवः । आपवत्स उमापत्यं ह्यर्थमा स्यात्तु भास्करः ॥ १० ॥ दिति को वृषध्वज शर्व, आप को पृथ्वीपर का सागर कहा है; आपवत्स को उमापति और अर्यमा को भास्कर सूर्य कहा है। सविता जाह्नवी गङ्गा सावित्री वेदमातृका । विवस्वांस्तु भवेन्मृत्युरिन्द्र उक्तोऽमराधिपः ॥ ११ ॥ सविता को जाह्नवी, गङ्गा और सावित्री को वेदमाता तथा विवस्वान को मृत्यु कहा है। इन्द्र को अमरों (देवताओं) का राजा, अमराधिप कहा है। कालानल इन्द्रजयो मित्रश्च बलभद्रकः । रुद्रं तथेश्वरं विद्याद्रुद्रदासस्तदात्मजः ॥ १२ ॥ कालानल को इन्द्रजय; मित्र को बलभद्रक; रुद्र को ईश्वर जानो और रुद्रदास को रुद्र का पुत्र समझना चाहिए। पृथ्वीधरो भवेद् विष्णुर्हेमगर्भः पितामहः । द्वादश₁₂ ब्रह्मपरिधौ द्वात्रिंशद्₃₂ बाह्यतस्ततः ॥ १३ ॥ पृथ्वीधर को विष्णु और हेमगर्भ को पितामह ब्रह्मा समझो। ये द्वादश तो ब्रह्मा की परिधि पर और बत्तीस परिधि के बाहर रहते हैं। चरकी च विदारी च पूतना पापराक्षसी । पिलिपिच्छा तथा जृम्भा स्कन्दार्यमा दिशां प्रति ॥ १४ ॥

सूत्र-५६ 295 चरकी, विदारी, पूतना, पापराक्षसी, पिलिपिच्छा तथा जृम्भा, स्कन्द एवं अर्यमा, दिशा के प्रति, विदिक्षु दिक्षु संस्थाने ह्यष्टौ कुर्याच्च शासनीः । आसां पदविधिर्नास्ति पूजां गृह्णन्ति केवलम् ॥ 15 ॥ विदिशा और दिशा के संस्थानों में— ये आठों ही शासन करते हैं। इनकी कोई पद विधि (इसके अतिरिक्त) नहीं है; ये केवल पूजा ही ग्रहण करते हैं। इत्येवं च समाख्याता देवतानामनुक्रमात् । निघण्टुपरिभाषाश्च वास्तुवेदसमुद्भवाः ॥ 16 ॥ इतने में ही सब देवताओं के अनुक्रम से निघण्टु परिभाषा वास्तुवेद से समुद्भव होने वाली के बारे में कह दिया गया है।¹ एतान् वास्तुपुरुषस्य अङ्गपदेनदेवताः । इत्यमनन्तर ब्रूमोऽथ वास्तुक्षेत्रामरायनम् ॥ 17 ॥² ये समस्त वास्तुपुरुष के अङ्गीय पदों पर स्थापित होने वाले देवताओं का रहस्य है। इसके बाद, मैं वास्तुक्षेत्र में देवतायतन के विषय में कहता हूँ। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वास्तुदेवतानिघण्ट्वधिकारो नाम षट्पञ्चाशं सूत्रम् ॥ 56 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वास्तुदेवता निघण्टु अधिकार नामक छप्पनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 56 ॥


  1. यह वास्तुनिघण्टु समराङ्गणसूत्रधार से प्रेरित है। इन श्लोकों में भी पर्याप्त समानता है। यथा— योऽयं वह्निरिहोक्तः स सर्वभूताहरो हरः। पर्जन्यानामा यश्चार्यं वृष्टिमन्म्बुदाधिपः ॥ जयन्तस्तु द्विनामाख्यः कश्यपो भगवानृषिः । महेन्द्रस्तु सुराधीशो दनुजानां विमर्दनः ॥ आदित्यं पुनरिच्छन्ति विवस्वन्तमहस्करम् । सत्यो भूतहितो धर्मो भृशः कामोऽथ मन्मथः ॥ योऽन्तरिक्षः स्मृतो देवस्तन्नभः समुदाहृतम् । मारुतो वायुरुद्दिष्टः पूषा मातृगणः स्मृतः ॥ अधर्मो वितथाख्यः स्यात् कलेरप्रतिमः सुतः । गृहक्षतः पुनर्योत्र स चन्द्रतनयो बुधः ॥ प्रेताधिपो मतः श्रीमान् यमो वैवस्वतश्च सः। गन्धर्वो भगवान् देवो नारदः परिकीर्तितः ॥ भृङ्गराजमिहेच्छन्ति राक्षसं निर्ऋतेः सुतम् । यो मृगोऽस्मिन्नन्तः स स्वयंभूर्धर्म इत्यपि ॥ आदिः प्रजापतिः स्रष्टा मनुः सुग्रीव ईरितः । पुष्पदन्तस्तु विनतातनयः स्यान्महाजवः ॥ वरुणः पाथसां नाथो लोकपालः स कीर्तितः । असुरो राहुर्केन्दुर्मर्दनः सिंहिकात्मजः ॥ शोषस्तु भगवानेषु सूर्यपुत्रः शनैश्चरः । पापयक्ष्मा क्षयः प्रोक्ता रोगस्तु कथितो ज्वरः ॥ भुजङ्गमानामधिपः श्रीमान् नागस्तु वासुकिः। त्वष्टा स्यान्मुख्यसंज्ञोऽत्र विश्वकर्माभिधश्च सः ॥ चन्द्रो भल्लाट इत्युक्तः कुबेरः सोमसंज्ञितः । चरको व्यवसायाख्यः श्रीरिहादितिसंज्ञिका ॥ दितिरत्रोच्यते शर्वः शूलभृद् वृषभध्वजः । हिमवानाप इत्युक्त आपवत्स उमा स्मृता ॥ आदित्यस्त्वर्यमा वेदमाता सावित्र उच्यते। देवी गङ्गात्र विद्वद्भिः सवितेति प्रकीर्तिता ॥ मृत्युः शरीरहर्तासौ विवस्वानिति स स्मृतः। जयाभिधस्तु वज्रीति स्यादिन्द्रो बलवान् हरिः ॥ मित्रो हलधरो माली रुद्रस्तूक्तो महेश्वरः । राजयक्ष्मा गुहः प्रोक्तः क्षितीशोऽनन्त उच्यते ॥ चरकी च विदारी च पूतना पापराक्षसी । रक्षायोनिभवा ह्येतो देव्तानुचरीर्विदुः ॥ इत्येषु वास्तुदेवानां निघण्टुः परिकीर्तितः । (समराङ्गण. 14, 14-31)
  2. प्रकाशितपाठे नोपलभ्यते ।

वास्तुक्षेत्रात्मकं सप्तपञ्चाशं सूत्रम् ॥ 57 ॥ अथैकादशवास्तुपदानि । विश्वकर्मोवाच — स्वस्तिकं पुष्पकं नन्दं षोडशाक्षं चतुर्थकम्। पञ्चमं कुलतिलकं सुभद्रं षष्ठमेव च ॥ 1 ॥ सप्तमो मरीचिगणो भद्रकं स्यात्तथाष्टमम् । नवमं कामदं प्रोक्तं दशमं भद्रमुच्यते ॥ 2 ॥ सर्वतोभद्रनामाख्यमतऊर्ध्वं न कारयेत्। वास्तून्येकादशैव स्युः प्रोक्तानि परमेश्वरैः ॥ 3 ॥ (अब वास्तुपद के ग्यारह भेदों को कहा जा रहा है) (1.) स्वस्तिक, (2.) पुष्पक, (3.) नन्द, (4.) षोडशाक्ष, (5.) कुलतिलक (6.) सुभद्र, (7.) मरीचिगण, (8.) भद्रक, (9.) कामद, (10.) भद्र और (11.) सर्वतोभद्र। इन ग्यारह वास्तुपदों से ऊपर कोई पद नहीं करने चाहिए¹ क्योंकि इन्हीं एकादश वास्तुपदों को परमेश्वर द्वारा कहा गया है। पदमेकं स्वस्तिकं स्यात्पुष्पकं पञ्चतुष्टयम्। नन्दं नवपदं प्रोक्तं षोडशं षोडशपदैः ॥ 4 ॥ इनमें से स्वस्तिक एक पद का होता है। पुष्पक पाँच पद तथा नन्द नव पद का कहा है और षोडश पदवास्तु सोलह पदों का होता है।

  1. वास्तुशास्त्रों में मय ने बत्तीस वास्तुपदों का उल्लेख किया है। वास्तु उपयोगी पदों में क्रमशः 1. सकल पद विन्यास, 2. पेचक, 3. पीठ, 4. महापीठ, 5. उपपीठ, 6. उग्रपीठ, 7. चण्डित (स्थण्डिल का नाम), 8. मण्डूक, 9. परमशायिक, 10. आसन, 11. स्थानीय, 12. देशीय, 13. उभयचण्डित, 14. भद्र महासन, 15. पद्मगर्भ, 16. त्रियुत, 17. व्रतभोग, 18. कर्णाष्टक, 19. गणित, 20. सूर्य विशालक, 21. सुसंहित, 22. सुप्रतिकान्त, 23. विशाल, 24. विप्रगर्भ, 25. विश्वेश, 26. विपुलभोग, 27. विप्रतिकान्त,
  2. विशालाक्ष, 29. विप्रभक्ति, 30. विश्वेशसार, 31. ईश्वरकान्त और 32. इन्द्रकान्त पद विन्यास कहा गया है—सकलं पेचकं पीठं महापीठमतः परम्॥ उपपीठमुग्रपीठं स्थण्डिलं नाम चण्डितम्। मण्डूकपदकं चैव पदं परमशायिकम्॥ तथासनं च स्थानीयं देशीयोभयचण्डितम्। भद्रं महासनं पद्मगर्भं च त्रियुतं पदम्॥ व्रतभोगपदं चैव कर्णाष्टकपदं तथा। गणितं पादमित्युक्तं पदं सूर्यविशालकम्॥ सुसंहितपदं चैव सुप्रतीकान्तमेव च। विशालं विप्रगर्भं च विश्वेशं च ततः परम्॥ तथा विपुलभोगं च पदं विप्रतिकान्तकम्। विशालाक्षपदं चैव विप्रभक्तिकसञ्ज्ञकम्॥ पदं विश्वेशसारं च तथैवेश्वरकान्तकम्। इन्द्रकान्तपदं चैव द्वात्रिंशत् 32 कथितानि वै॥ (मयमतम् 7, 1-7) मानसार (7, 1-25), शिल्परत्न (पूर्वभाग 6, 1-7) में भी इतनी ही संख्या है। समराङ्गणसूत्रधार में 81 पद, 100 एवं 64 पदीय वास्तु का वर्णन है जो कि प्रधानभेद कहा गया है— एकाशीतिपदो यः स्यात्तथा शतपदश्च यः। चतुःषष्टिपदो यश्च वास्तुरत्नः त्रिधोदितः ॥ (समराङ्गण. 13, 1)

सूत्र-५७ 297 पञ्चविंशतिभिः कुलं षट्त्रिंशद्भिः सुभद्रकम्। एकोनपञ्चाशत्पादैर्मरीचिगण उच्यते॥ ५॥ कुलतिलक पच्चीस पदों का और सुभद्रक छत्तीस पदों का तथा मरीचिगण उनचास पद का कहा गया है। भद्रकं तु चतुः षष्टिरेकाशीतिश्च कामदम्। शतपदैस्तु भद्राख्यं सहस्रैः सर्वतोद्भवम् ( सर्वतोभद्रकम् ) ॥ ६ ॥ भद्रक चौसठ पद का और कामद इक्यासी पद तथा सौ पद का भद्र संज्ञक और सर्वतोभद्र पदवास्तु हजार पदों का होता है। इत्यमनन्तर वास्तुस्थानमाह - पदसङ्ख्यास्तु कथिता वास्तुस्थानानि वच्म्यहम्। स्वस्तिकं पदसंस्थाने ध्रुवतः कथ्यते बुधैः ॥ ७॥ इस प्रकार उपर्युक्त प्रकार से इन वास्तुओं की पद संख्या के बारे में बताया गया। अब इन वास्तुओं के स्थानों के बारे में कहता हूँ। स्वस्तिक के पदस्थान को ध्रुवतः विद्वान लोग कहते हैं। श्रीधरं राजगेहानां हर्म्यादीनां ध्रुवं यथा। चतुष्की देवताग्रे या विद्यारम्भे तत्स्वस्तिकम् ॥ ८ ॥ श्रीधर (एक प्रकार के भवन की कोटि या माड) में, राजभवनों में, हर्म्यादि या हवेलियों में भी यही ध्रुव जैसे होता है, वैसे ही देवताओं के आगे रखी जाने वाली चतुष्की बजोट में तथा विद्यारम्भ के समय भी इसी स्वस्तिक को पदस्थान देना चाहिए। दीक्षा विविधयात्रासु कन्यालग्ने च पुष्पकम्। नन्दं प्रपूजयेद्वास्तु वनयात्रादिशोभनम् ॥ ९ ॥ दीक्षा के प्रसङ्ग में, विविध यात्राओं के प्रसङ्ग, कन्या लग्न के प्रसंग में पुष्पक का पदस्थान तथा वनयात्रादि नन्द पदस्थान की वास्तुपूजा शुभ है। लतिने रुचकादीनां मण्डपेषु गृहादिके। जगती वसुधायुक्तं षोडशाख्यं तु पूजयेत् ॥ १०॥ इसी तरह लतिन में, रुचकादि में, मण्डपों और गृहादिकों में जगती वसुधा युक्त में षोडशाख्य अर्थात् षोडश पदवास्तु की पूजा की जानी चाहिए। दक्षिणोत्तरषट्काद्यं 'शक्रध्वजऽब्जोद्भवम्।

  1. 'शक्राद्यं ? कमलोद्भवम्' इति प्रकाशित पाठः।

270 अपराजितपृच्छा श्रीमात्रादिषु दीक्षासु तिलकं तु प्रपूजयेत् ॥ 11 ॥ दक्षिणोत्तर तथा षट्काद्य में और शक्रध्वज (इन्द्रध्वजोत्सव) में, कमलोद्भव ब्रह्मा के लिए श्रीमात्रादिकों में और दीक्षा के अवसर पर तिलक वास्तु की पूजा करनी चाहिए। सुकर्मणि च प्रस्थाने सुभद्रगं च प्रशस्यते। समस्तजीर्णोद्धारेषु मरीचिगणमर्चयेत् ॥ 12 ॥ इसी प्रकार से अच्छे कार्यों के लिए, प्रस्थान करते समय भी सुभद्र वास्तु का पूजन प्रशस्त कहा गया है। समस्त जीर्णोद्धार, पुनर्संस्कार के कार्य हो तो मरीचिगण वास्तुपद की अर्चना करनी चाहिए। ग्रामखेटपुरादा च कूपे च कर्वटादिके। तथा राजनिवेशे च भद्रकं पूजयेत्सदा ॥ 13 ॥ इसी तरह जब ग्राम, खेट, पुर, कूप, कर्वट तथा राजभवन का काम हो तो उसमें भद्रक वास्तु का पूजन करना चाहिए। गृहादिषु समस्तेषु तृणपट्टच्छन्दादिषु। पाण्ड्वश्वपूर्णखण्डेषु कामदं वास्तु पूजयेत् ॥ 14 ॥ सभी गृहों के कार्यों में, तृण से, पट्ट से, छादन से पाण्डवाश्व के पूर्ण खण्डों में कामद वास्तु का पूजन करें। प्रासादा विविधाश्चैव विविधश्चात्र मण्डपाः। जगतीलिङ्गपीठे च भद्राख्यं, राजवेश्मनि ॥ 15 ॥ विविध प्रकार के प्रासादों में, मन्दिरों में, विविध प्रकार के मण्डपों तथा जगती, पीठ, लिङ्गादि में भद्र नामक वास्तु का पूजन करना चाहिए। प्रासादाश्च व मेर्वाद्या लिङ्गं षट्करतः परम्। महार्था देशराष्ट्रे च सर्वतोभद्रमर्चयेत् ॥ 16 ॥ इसी प्रकार राजभवनों में, मन्दिरों में, मेरु आदि प्रासादों में तथा छह हाथ से ऊपर तक के लिङ्गों में, महा अर्थों में, देश एवं राष्ट्रों में सर्वतोभद्र वास्तुपद की अर्चना करें। अधस्तात् सर्वतोभद्राद् भद्राख्योपरि वास्तुकम्। मध्ये च द्वाविंशतिभिर्गुणिता पदकल्पना ॥ 17 ॥ सर्वतोभद्र से नीचे के समस्त वास्तुओं में भद्राख्य, वास्तु के ऊपर तक के मध्य में जो भी वास्तु है उनमें 22 से गुणा करके पदों कल्पना की गई है।

सूत्र-५७ 299 षट्क्षेत्राणिवर्णनम् — षट्क्षेत्राणि प्रवक्ष्यामि वास्तुपदनिवासिनाम्। संस्थानोन्मानसूत्रं च वास्तुवेद समुद्भवम् ॥ 18 ॥ अब इन वास्तुपद निवासी देवों के छह क्षेत्रों के बारे में कहता हूँ, उसके संस्थानोन्मान सूत्र को भी कहता हूँ जो कि वास्तु वेद से समुद्भूत स्वीकार्य है। चतुरश्रमायतं च वृत्तं वृत्तायतं तथा। अष्टाश्रं चार्धचन्द्रं च वास्तुसूत्रं तु षड्विधम् ॥ 19 ॥

  1. चतुरस्र, 2. आयत, 3. वृत्त, 4. वृत्तायत, 5. अष्टाश्र और 60 अर्धचन्द्र— ये छह प्रकार के वास्तुसूत्र कहे गए हैं। प्रासादेषु गृहाद्येषु पुरग्रामनिवेशने। क्षेत्राणि चतुरश्राणि चतुरश्रं समर्चयेत् ॥ 20 ॥ इनमें कौन कहाँ उपयुक्त हैं, उनके बारे में बताते हैं। प्रासादों, मन्दिरों में गृहादिकों में, पुर और ग्राम के आवास गृहों में तथा चौकोर क्षेत्रों में चतुरश्र वास्तु सूत्र की अर्चना करनी चाहिए। तथायताश्च प्रासादाः पुष्पाक्षकुलसम्भवाः। यथायतानि क्षेत्राणि पूजयेच्च तथायतम् ॥ 21 ॥ आयत, प्रासाद मन्दिरों में, पुष्पाक्ष कुल से उत्पन्न होने वाले आयत क्षेत्रों में आयत वास्तु सूत्र से पूजन करना चाहिए। वापीकूपक्षेत्रकाणि वृत्तानि प्रतिमास्तथा। कैलासच्छन्दोद्गवाश्च सर्वे वृत्ताः प्रकीर्तिताः ॥ 22 ॥ इसी प्रकार वापी या बावड़ी, कूप कुई जैसे क्षेत्रों में वृत्त वास्तुसूत्र, प्रतिमाओं में तथा सभी कैलाश छन्दोद्भव रचनाओं में वृत्त वास्तुसूत्र से पूजन करना चाहिए। वृत्तायताश्चमणिका अष्टशाला अष्टाश्रकाः । तडागेषु समस्तेषु ह्यर्धचन्द्रं प्रपूजयेत् ॥ 23 ॥ मणिका को वृत्तायत वास्तुसूत्र से तथा अष्टशाला को अष्टाश्रक वास्तुसूत्र से पूजन करना चाहिए। समस्त तालाबों को अर्धचन्द्र वास्तुसूत्र से पूजन करना चाहिए। क्षेत्रषट्कात्मके वास्तौ बाणवेदाश्च₄₅ देवताः । त्रयोदशे₁₃ स्थिता मध्ये द्वात्रिंशद्₃₂ बाह्यतस्तथा ॥ 24 ॥