भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-५७ 299 षट्क्षेत्राणिवर्णनम् — षट्क्षेत्राणि प्रवक्ष्यामि वास्तुपदनिवासिनाम्। संस्थानोन्मानसूत्रं च वास्तुवेद समुद्भवम् ॥ 18 ॥ अब इन वास्तुपद निवासी देवों के छह क्षेत्रों के बारे में कहता हूँ, उसके संस्थानोन्मान सूत्र को भी कहता हूँ जो कि वास्तु वेद से समुद्भूत स्वीकार्य है। चतुरश्रमायतं च वृत्तं वृत्तायतं तथा। अष्टाश्रं चार्धचन्द्रं च वास्तुसूत्रं तु षड्विधम् ॥ 19 ॥

  1. चतुरस्र, 2. आयत, 3. वृत्त, 4. वृत्तायत, 5. अष्टाश्र और 60 अर्धचन्द्र— ये छह प्रकार के वास्तुसूत्र कहे गए हैं। प्रासादेषु गृहाद्येषु पुरग्रामनिवेशने। क्षेत्राणि चतुरश्राणि चतुरश्रं समर्चयेत् ॥ 20 ॥ इनमें कौन कहाँ उपयुक्त हैं, उनके बारे में बताते हैं। प्रासादों, मन्दिरों में गृहादिकों में, पुर और ग्राम के आवास गृहों में तथा चौकोर क्षेत्रों में चतुरश्र वास्तु सूत्र की अर्चना करनी चाहिए। तथायताश्च प्रासादाः पुष्पाक्षकुलसम्भवाः। यथायतानि क्षेत्राणि पूजयेच्च तथायतम् ॥ 21 ॥ आयत, प्रासाद मन्दिरों में, पुष्पाक्ष कुल से उत्पन्न होने वाले आयत क्षेत्रों में आयत वास्तु सूत्र से पूजन करना चाहिए। वापीकूपक्षेत्रकाणि वृत्तानि प्रतिमास्तथा। कैलासच्छन्दोद्गवाश्च सर्वे वृत्ताः प्रकीर्तिताः ॥ 22 ॥ इसी प्रकार वापी या बावड़ी, कूप कुई जैसे क्षेत्रों में वृत्त वास्तुसूत्र, प्रतिमाओं में तथा सभी कैलाश छन्दोद्भव रचनाओं में वृत्त वास्तुसूत्र से पूजन करना चाहिए। वृत्तायताश्चमणिका अष्टशाला अष्टाश्रकाः । तडागेषु समस्तेषु ह्यर्धचन्द्रं प्रपूजयेत् ॥ 23 ॥ मणिका को वृत्तायत वास्तुसूत्र से तथा अष्टशाला को अष्टाश्रक वास्तुसूत्र से पूजन करना चाहिए। समस्त तालाबों को अर्धचन्द्र वास्तुसूत्र से पूजन करना चाहिए। क्षेत्रषट्कात्मके वास्तौ बाणवेदाश्च₄₅ देवताः । त्रयोदशे₁₃ स्थिता मध्ये द्वात्रिंशद्₃₂ बाह्यतस्तथा ॥ 24 ॥