अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें300 अपराजितपृच्छा इस तरह छह क्षेत्रात्मक वास्तु में पैंतालीस देवता हैं, जिसमें तेरह तो मध्य में स्थित हैं और बत्तीस इन क्षेत्रों के बाहर अवस्थित हैं। सूत्रबाह्योऽष्टदेव्यश्च ईशादिषु प्रदक्षिणम्। तासां पदविधिर्नास्ति केवलं पूजनं स्मृतम्॥ २५॥ वास्तुसूत्र के बाहर आठ देवियाँ भी ईशानकोण से प्रदक्षिण क्रम से अवस्थित हैं उनकी कोई पदविधि नहीं है, उनके लिए तो केवल पूजन ही बताया गया है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्यांकापराजितपृच्छायां वास्तुक्षेत्राधिकारो नाम सप्तपञ्चाशत्तमं सूत्रम्॥ ५७॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वास्तुक्षेत्र अधिकार नामक सत्तावनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ॥ ५७॥ वास्तुपददेवताभिधाननिर्णयो नामाष्टपञ्चाशं सूत्रम्॥ ५८॥ विश्वकर्मोवाच — स्वस्तिकं च प्रवक्ष्यामि तच्चैकपदसंश्रितम्। त्रयोदश सुरा मध्ये द्वात्रिंशद् बाह्यतः स्थिताः॥ १॥ तथा कूटं त्रिभिः कृत्वा मध्ये ब्रह्मा नवांशके। तृतीयांशेष्वर्यमाद्या त्र्यंशेषु कर्णदेवताः॥ २॥ तासामूर्ध्वे बाह्यतश्च द्वात्रिंशत्परिधौ क्रमात्। इदं च स्वस्तिकं प्रोक्तं सर्वशान्तिकरं नृणाम्॥ ३॥ इति स्वस्तिकवास्तु। अब मैं एक पद वाले स्वस्तिक वास्तु के बारे में कहता हूँ इसके मध्य में तेरह देवता वास करते हैं और बत्तीस देवता इसके बाहर की ओर स्थित रहते हैं। इसमें तीन कूट बनाएँ और नवांश के मध्य में ब्रह्मा तथा तृतीयांश में ईश्वर अर्यमा आदि और तृतीयांश में कर्ण देवताओं को रखें और उनके ऊपर की ओर, बाहर की तरफ बत्तीस देवताओं को परिधि पर क्रमानुसार स्थित करें। इस तरह स्वस्तिक वास्तु को सभी लोगों के लिए सर्वप्रकार की शान्ति के लिए उपयुक्त कहा गया है। अथातः पुष्पकं वक्ष्ये वेदाश्रं च चतुष्पदम्। ब्रह्मणः पदमेकं तु तत्पादेष्वर्यमादयः॥ ४॥ अर्यम्णः पदमानेन चाष्टौ ताः कर्णदेवताः।