भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 347

सूत्र-५८ 301 मूलपदषोडशांशे शेषा बाह्ये प्रकीर्तिताः ॥ 5 ॥ इति पुष्पकवास्तु। अब पुष्पक वास्तु के बारे में कहता हूँ जो चार भुजाओं वाला एवं चतुष्पद वाला होता है। इसके एक पद में ब्रह्मा और एक बाद में ईश्वर अर्यमा आदि स्थित होते हैं। अर्यमा के पद के मान के अनुसार ही आठों कर्ण देवता वहाँ होते हैं। मूल पद षोडश अंश का और शेष बाहर की ओर कहे गये हैं। नन्दे ब्रह्मा पदं चैकं त्रह्यात्र्यंशेन चार्यमा। तत्त्र्यंशैः कर्णदेवाश्च द्वात्रिंशच्च तदर्धतः ॥ 6 ॥ इति नन्दवास्तु। अब नन्द वास्तु के बारे में कहता हूँ। नन्द वास्तु के एक पद में ब्रह्मा और ब्रह्मा के पद के तृतीयांश में अर्यमा और उसके भी तृतीय अंश में कर्ण देवता और बत्तीस देवता उससे आधे आधे भाग में होंगे। षोडशाख्ये पदं ब्रह्मा हार्यमार्थे तु कर्णगाः । कर्णार्धे बाह्यतो देवास्तदर्धार्धे कर्णाष्टकम् ॥ 7 ॥ इति षोडशाख्यवास्तु। षोडशाख्य वास्तु में एक पद का ब्रह्मा और आधे भाग में अर्यमा कर्ण देवता स्थित होते हैं। कर्णार्ध के बाहर देवता उससे भी आधे-आधे भाग में आठ कर्ण देवता होते हैं। ब्रह्मार्थमैकैकपदं तदर्धं कर्णषोडश। चतुर्थांशपदाः सर्वे तद्वास्तु तिलकं भवेत् ॥ 7 ॥ इति कुलतिलकवास्तु। ब्रह्मा का एक पद और उसका आधा सोलह कर्ण देवता के लिए ये सभी चतुर्थांश पद वाले होते हैं। यह तिलक वास्तु होगा। चतुष्पदो भवेद् ब्रह्मा द्विपदाश्चार्यमादयः । कर्णाश्चार्धपदाः सर्वे त्र्यंशोनेषु च शेषकाः ॥ 9 ॥ इति सुभद्रवास्तु। चार पद में ब्रह्मा और दो पदों में अर्यमा आदि देवता कर्ण देवता आधे पद वाले और अन्य सभी शेष देवतागण तृतीयांश के होते हैं। यह सुभद्र वास्तु के लक्षण हैं।