अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें302 अपराजितपृच्छा चतुष्पदो भवेद् ब्रह्मा त्रिपादा अर्यमादयः। कर्णाः सपादाश्चैकोनं कर्णबाह्योऽर्धपादकाः ॥ 10 ॥ षडंशोनपदाः शेषाश्चतुर्विंशतिसङ्ख्यया। मरीचिगणमित्युक्तं सप्तसप्तपदात्मकम् ॥ 11 ॥ चार पाद के ब्रह्मा, तीन पाद का अर्यमादि देवता, कर्ण देवता सवाये पद के और कर्ण देवता के बाहर के देवता आधे पद के, षडंश कम एक पाद के शेष सभी चौबीस संख्या के मरीचिगण सात सात पद वाले कहे गये हैं। चतुः षष्टिपदं वक्ष्ये वास्तु पुरनिवेशने। विभक्तिपदसंस्थानं देवतानामनुक्रमात् ॥ 12 ॥ चतुष्पदो भवेद् ब्रह्मा तत्समा अर्यमादयः। अर्यमार्थे कर्णगाश्च कर्णार्धे चतुर्विंशतिः ॥ 13 ॥ बाह्यकर्णे स्थिताश्चाष्टौ लाङ्गले पदमर्धकम्। ईदृशं भद्रकं प्रोक्तं चतुःषष्टिपदस्थितम् ॥ 14 ॥ इति भद्रकवास्तु। वास्तु पुर निवेशादिक के चौंसठ पदों के बारे में कहता हूँ। उनके देवताओं के नाम भी विभक्ति पद संस्थानों को क्रम वर्ग कहता हूँ। चार पदों में ब्रह्मा और उसी के समान चार पदों में अर्यमादि और अर्यमा से आधे पद के कर्णदेवता और कर्णदेवता के आधे पदों में चौबीस देवता तथा कर्णे देवता के बाहर की और आठ लाङ्गल आधे पद के स्थित करें। इस तरह चौंसठ पद वाला भद्रक वास्तु कहा गया है। ब्रह्मा नवपदो मध्ये षट्पदा अर्यमादयः। द्विपदा मध्यकर्णाद्या द्वात्रिंशदेकपादकाः ॥ 15 ॥ इति कामदवास्तु। ब्रह्मा मध्य के नव पदों में और छह पदों में अर्यमादि दो पदो के मध्यमें कर्णादि और अन्य बत्तीस देवता एक पद वाले कहे गए हैं। ऐसा कामद वास्तु होता है। ततः शतपदं वक्ष्ये पूज्यं प्रासादमण्डपे। ब्रह्माद्याः सकलाश्चैवाष्टपादा अर्यमादयः ॥ 16 ॥ द्विपदा ब्रह्मकर्णेऽष्टौ बाह्येऽष्टौ सार्धपादकाः। शेषाश्चैकपाद ज्ञेयाश्चतुर्विंशतिसङ्ख्यया ॥ 17 ॥ इति शतपदं भद्राख्यवास्तु।