भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 349

सूत्र-५८ 303 अब इसके बाद शतपद वास्तु के बारे में कहता हूँ जो प्रासाद मन्दिरों और मण्डपों में पूज्य होता है। इसमें ब्रह्मादि सभी आठ पद वाले अर्यमादि दो पदों वाले तथा ब्रह्म कर्ण देवता आठ और बाहर के आठ देवता आधे पद के, शेष सभी एकपद वाले चौबीस संख्या में होते हैं। चतुरश्रीकृते क्षेत्रे द्वात्रिंशद्विर्विभाजिते । षट्पञ्चाशतपदैर्युक्तान्येकादश शतानि हि ॥ 18 ॥ चौकोर किये गये क्षेत्र को बत्तीस खण्डों में विभाजित करें। इसी तरह चौकोर किए गए अन्य क्षेत्र को छप्पन खण्डों में तथा एक अन्य को ग्यारह सौ खण्डों में (क्रमशः 32, 56, 1100) विभाजित करें। मध्यस्थाने लिखेत् पद्मं वेदगर्भ इति स्मृतम् । ब्रह्मान्ते च भवेद्वीथी चत्वारिशत्पदैः क्रमात् ॥ 19 ॥ इस क्षेत्र के मध्य में पद्म का चित्र बना दें। इसे वेदगर्भ या ब्रह्मस्थल कहा गया है। ब्रह्म के अन्त में चालीस पदों की एक वीथी क्रम से बनाएँ। अर्यम्णोऽन्ते भवेद्वीथी शतं च द्वादशोत्तरम्। वीथीकर्णे समस्तैवं पदमुक्तिः क्रमोदिता ॥ 20 ॥ सप्तदशमण्डलेषु चाद्ये पद्मं निपातयेत् । तदनन्तरपङ्क्तौ च ब्रह्मा षण्णवतिपदः ॥ 21 ॥ अर्यमा के अन्त में भी एक सौ बारह खण्डों की वीथी बनाएँ और वीथी के समस्त कर्णों पर पदमुक्ति क्रमवार बनाएँ। सत्रह मण्डलों में आदि से पद्म बनाएँ इसके बाद अन्तर पंक्तियों में छानवें पदों में ब्रह्मा बना दें। तदन्ते वीथिका कार्या चत्वारिशत्पदान्विता । अशीतिभिश्च चत्वारोऽर्यमाद्याश्च चतुर्दिशम् ॥ 22 ॥ चत्वारिशत्पदैरर्धैरष्टौ स्युर्ब्रह्मकर्णतः । तदन्तर्वीथिका कार्या शतं च द्वादशोत्तरम् ॥ 23 ॥ इसके अन्त की चालीस पदों की वीथिका बनाएँ तथा अस्सी पदों की भी बनाएँ जिसमें चारों अर्यमादि चारों दिशाओं में बनाएँ। चालीस पदों के अर्धे में आठों ब्रह्मा कर्ण पर बनाएँ। इसके अन्तरवीथिका एक सौ बारह पदों की बनाएँ। तद्बाह्ये च भवेद्वीथी द्वात्रिंशदधिकं शतम् । कोणे लोप्याश्च षट्पादाश्चतुर्षु चतुर्विशतिः ॥ 24 ॥ उसके बाहर की जो वीथी हो वह एक सौ बत्तीस पदों की हों तथा चारों कोणों

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक) · पृष्ठ 349, कुल 535 में से · BharatKosha