अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
सूत्र-५८ 303 अब इसके बाद शतपद वास्तु के बारे में कहता हूँ जो प्रासाद मन्दिरों और मण्डपों में पूज्य होता है। इसमें ब्रह्मादि सभी आठ पद वाले अर्यमादि दो पदों वाले तथा ब्रह्म कर्ण देवता आठ और बाहर के आठ देवता आधे पद के, शेष सभी एकपद वाले चौबीस संख्या में होते हैं। चतुरश्रीकृते क्षेत्रे द्वात्रिंशद्विर्विभाजिते । षट्पञ्चाशतपदैर्युक्तान्येकादश शतानि हि ॥ 18 ॥ चौकोर किये गये क्षेत्र को बत्तीस खण्डों में विभाजित करें। इसी तरह चौकोर किए गए अन्य क्षेत्र को छप्पन खण्डों में तथा एक अन्य को ग्यारह सौ खण्डों में (क्रमशः 32, 56, 1100) विभाजित करें। मध्यस्थाने लिखेत् पद्मं वेदगर्भ इति स्मृतम् । ब्रह्मान्ते च भवेद्वीथी चत्वारिशत्पदैः क्रमात् ॥ 19 ॥ इस क्षेत्र के मध्य में पद्म का चित्र बना दें। इसे वेदगर्भ या ब्रह्मस्थल कहा गया है। ब्रह्म के अन्त में चालीस पदों की एक वीथी क्रम से बनाएँ। अर्यम्णोऽन्ते भवेद्वीथी शतं च द्वादशोत्तरम्। वीथीकर्णे समस्तैवं पदमुक्तिः क्रमोदिता ॥ 20 ॥ सप्तदशमण्डलेषु चाद्ये पद्मं निपातयेत् । तदनन्तरपङ्क्तौ च ब्रह्मा षण्णवतिपदः ॥ 21 ॥ अर्यमा के अन्त में भी एक सौ बारह खण्डों की वीथी बनाएँ और वीथी के समस्त कर्णों पर पदमुक्ति क्रमवार बनाएँ। सत्रह मण्डलों में आदि से पद्म बनाएँ इसके बाद अन्तर पंक्तियों में छानवें पदों में ब्रह्मा बना दें। तदन्ते वीथिका कार्या चत्वारिशत्पदान्विता । अशीतिभिश्च चत्वारोऽर्यमाद्याश्च चतुर्दिशम् ॥ 22 ॥ चत्वारिशत्पदैरर्धैरष्टौ स्युर्ब्रह्मकर्णतः । तदन्तर्वीथिका कार्या शतं च द्वादशोत्तरम् ॥ 23 ॥ इसके अन्त की चालीस पदों की वीथिका बनाएँ तथा अस्सी पदों की भी बनाएँ जिसमें चारों अर्यमादि चारों दिशाओं में बनाएँ। चालीस पदों के अर्धे में आठों ब्रह्मा कर्ण पर बनाएँ। इसके अन्तरवीथिका एक सौ बारह पदों की बनाएँ। तद्बाह्ये च भवेद्वीथी द्वात्रिंशदधिकं शतम् । कोणे लोप्याश्च षट्पादाश्चतुर्षु चतुर्विशतिः ॥ 24 ॥ उसके बाहर की जो वीथी हो वह एक सौ बत्तीस पदों की हों तथा चारों कोणों
304 अपराजितपृच्छा पर छह पदों का लोप करके— इस तरह चौबीस पदों का लोप कर दें। ईशाद्या रुद्रदासान्ता लता वीथ्यन्तरे गताः । एवं पदानि जायन्ते षट्त्रिंशदधिकं शतम् ॥ 25 ॥ बाह्यकर्णे तु चत्वारः प्रस्थाप्या नवभिः पदैः । सप्त सप्त तदाश्रिता योज्या अष्टाष्टभिः पदैः ॥ 26 ॥ तन्मानानुक्रमाद्योज्याः शेषा अष्टपदास्तथा । एवं सहस्रपदैर्युक्तं सर्वतोभद्रलक्षणम् ॥ 27 ॥ इति सहस्रपदं सर्वतोभद्रवास्तु। ईशादि से रुद्रदासान्त तक इन वीथियों के अन्तर में लता जाती है। इस प्रकार एक सौ छत्तीस पद बनते हैं। चारों बाह्य कर्णों पर नव पदों की प्रस्थापना करें तथा उनके अश्रित आठ-आठ पदों की सात-सात ओर प्रस्थापित करें। उन्हीं के मानानुक्रम से शेष आठो पदों को भी जोड़े इस तरह हजार पदों वाला सर्वतोभद्र लक्षण का वास्तु बनता है। ईशस्तथा च पर्जन्यो जयो माहेन्द्र एव च। आदित्यः सत्यभृशौ चाऽन्तरिक्षान्ताऽष्ट पूर्वतः ॥ 28 ॥ अग्निः पूषा च वितथो गृहक्षतो यमस्तथा। गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृगान्ताश्चाष्ट दक्षिणे ॥ 29 ॥ पितरो दौवारिकश्च सुग्रीवः पुष्पदन्तकः । वरुणश्चासुरः शोषः पापयक्ष्मा तु पश्चिमे ॥ 30 ॥ रोगोनागस्तुमुख्यश्च भल्लाटः सोम एव च। गिर्यदितिर्दितिश्चैवाष्टावुत्तरदिशि क्रमात् ॥ 31 ॥ इसी प्रकार ईश, पर्जन्य, जय, महेन्द्र, आदित्य, सत्य, भृश और अन्तरिक्ष— ये आठों पूर्व दिशा की ओर; अग्नि, पूषा, वितथ, गृहक्षत, यमगन्धर्व, भृङ्गराज और मृग— ये आठों दक्षिण दिशा की ओर; पितर, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, वरुण, असुर, शोष और पापयक्ष्मा पश्चिम दिशा की ओर; रोग, नाग, मुख्य, भल्लाट, सोम, गिरि, अदिति, दिति— ये आठों क्रम से उत्तर दिशा की ओर होती हैं। ब्रह्मकर्णे तथा चाष्टावीशान्यादि क्रमेण तु। आपश्चैवापवत्सश्च ईशकर्णे तु संश्रितौ ॥ 32 ॥ सविता चैव सावित्री आग्नेय्यां तु समाश्रितौ । इन्द्र इन्द्रजयश्चैव नैर्ऋत्यां ब्रह्मणः स्थितौ ॥ 33 ॥
सूत्र-५९ 305 ब्रह्माकर्ण पर इसी तरह अट्ठाईस क्रमवार इस तरह बनाएँ— ईशान कोण पर आप और आपवत्स संश्रित हों। आग्नेयकोण पर सविता और सावित्री समाश्रित हों। ब्रह्मा की नैर्ऋत्य कोण में इन्द्र और इन्द्रजय स्थित हों। रुद्रश्च रुद्रदासश्च संस्थितौ वायवीदिशि। मरीचिश्च विवस्वांश्च मित्रश्च पृथिवीधरः ॥ ३४ ॥ पूर्वादिक्रमयोगेन संस्थिताश्च चतुर्दिशम्। एवमादिक्रमयोगः सर्वेषां वास्तुमण्डले ॥ ३५ ॥ वायव्य कोण की दिशा में रुद्र और रुद्रदास संस्थित हों। इसी तरह मरीचि, विवस्वान, मित्र और पृथ्वीधर भी पूर्वादिक्रम से योग बनाते हुए चारों दिशाओं में संस्थित हों। इस प्रकार सभी वास्तुमण्डलों में आदि क्रम योग होता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वास्तुपददेवताभिधाननिर्णयाधिकारो नामाष्टपञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ ५८ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वास्तुपद देवता अभिधान निर्णय अधिकार नामक अठावनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥ वास्तुमर्मोपमर्मनिर्णयो नामैकोनषष्टितमं सूत्रम् ॥ ५९ ॥ विश्वकर्मोवाच — चतुःषष्टिपदैः₆₄ क्षेत्रे पुरवास्तु प्रकल्पयेत्। मर्मोपमर्मसन्धींश्च वास्तुदेहसमुद्भवन् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा ने कहा कि चौंसठ पद वाले क्षेत्र में पुर-वास्तु की कल्पना करें तथा उसी में मर्म¹, उपमर्म, सन्धि आदि को वास्तुदेह से समुद्भव होता हुआ देखें। अथ वास्तुमर्मस्थानज्ञानफलयोर्विशेषमाह — पूर्वापरायता वंशा उपवंशाः प्रभेदतः। मर्माणि वंशसम्पाता उपमर्माणि मध्यतः ॥ २ ॥ पूर्व-पश्चिम की ओर आयत में वंश और उपवंशों को उनके भेदों सहित मर्मों, वंश-सम्पातों आदि को उपमर्मों सहित उनके मध्य देखें। इन्द्रादित्यतस्त्रिरेखा वरुणपुष्पदन्तगाः। एते वंशाः समाख्याता उपवंशा याम्योत्तराः ॥ ३ ॥
- यहाँ मर्म विषय पर पुरुषाकारवास्तुरूप की परिकल्पना की गई है।
306 अपराजितपृच्छा इन्द्र आदित्य तक तीन रेखा, वरुण, पुष्पदन्त तक जाती हुई हों, वे सब वंश के नाम से समाख्यात हैं और उपवंश उत्तर-दक्षिण आयत में होते हैं। सोमभल्लाटतस्तिस्रो गृहक्षतयमान्तगाः । पूर्वापरायता रेखाः पुनर्भिन्नाश्च तिसृभिः ॥ ४ ॥ सोम, भल्लाट, तिस्र, गृहक्षत, यम के अन्त तक जाने वाली, पूर्व से पश्चिम की ओर आयत रेखा पुनः तीनों को भिन्न करती अर्थात् काटती हुई होगी। ईशब्रह्मपितृत्तश्च शिरा रोगाग्निमध्यतः । शिरास्त्वेवं विकर्णस्था ईशाग्निपितृरोगतः ॥ ५ ॥ ईश, ब्रह्म और पितृ तक शिरा; रोग, अग्नि के मध्य तक ये शिराएँ- इस प्रकार विकर्ण ईश, अग्नि, रोग तक जाती हैं। जयगन्धर्वसुग्रीवगिरिभिश्च प्रभेदिताः । सत्यमुख्यायता रेखा वितथाच्यासुरान्तगाः ॥ ६ ॥ और, जय, गन्धर्व, सुग्रीव, गिरि आदि को भेदती जाती है तथा सत्य और मुख्य की ओर की आयत रेखा वितथ और असुर के अन्त तक जाने वाली होती है। एते च सूत्रसम्पाता महामर्माणि कीर्तिताः । सूत्रसम्पाताग्रपङ्क्तिषट्कं लाङ्गलमुच्यते ॥ ७ ॥ ये सभी सूत्र सम्पात महामर्म नाम से जाने जाते हैं तथा सूत्र सम्पात के आगे की छह पङ्क्तियाँ- पङ्क्ति षट्क 'लाङ्गल' कहलाती है। शिरासूत्रपातषट्कं तच्चापि लाङ्गलं स्मृतम् । चतुर्विंशति लाङ्गलानि पदार्थेषु ¹त्रिकर्णगा ? ॥ ८ ॥ शिरा सूत्रपात षट्क को भी लाङ्गल कहा जाता है। इस तरह के चौबीस लाङ्गल पदों के आधे भाग करते हुए विकर्ण की ओर जाते हैं। ब्रह्मणश्च चतुःपार्श्वेष्वष्टसूत्राणि पद्मकम्। पक्षेषु लाङ्गलं द्वन्द्वं षड्रेखाभिर्विधीयते ॥ ९ ॥ ब्रह्मा के चारों ओर आठ सूत्रों के पद्मक होते हैं और दोनों पक्षों में दो-दो लाङ्गल षड् रेखाओं से बनते हैं। चतुःकर्णेषु शूलानि षड्रेखाभिश्च वज्रकम्। त्रिशूललाङ्गलपद्म शिरानाडिविवर्जितम् ॥ १० ॥
सूत्र-५९ 307 चारों कर्णों में शूल तथा षड्रेखाओं में वज्र और त्रिशूल लाङ्गल पद्म शिरा, नाड़ी वर्जित होते हैं। उपवंशादीनां मर्मफलमाह - बन्धूच्छेदश्चोपवंशे मर्मणि स्यात्कुलक्षयः । वज्रे च वज्रपाताः स्युस्त्रिशूले च रिपोर्भयम् ॥ 11 ॥ उपवंश के प्रभावित होने पर बन्धुओं में विरोध-विच्छेद तथा मर्मों में कुलक्षय और वज्र में वज्रपात की आशङ्का रहती है और त्रिशूल मर्म हो तो शत्रुओं से भय बना रहता है। पद्मे पतिविनाशश्च लाङ्गलेषु प्रजाक्षयः । कर्णशिरा स्त्रीविनाशः सम्पाते चाग्रजातके ॥ 12 ॥ पद्म से पति का विनाश और लाङ्गल से प्रजा, बाल-बच्चों की क्षय होता है। कर्ण शिरा से स्त्री का विनाश होता है और सम्पात मर्म दोष से अग्रज की मृत्यु होती है। ब्रह्मकर्णेषु महामर्ममाह - चतुर्षु ब्रह्मकर्णेषु महामर्म सुकीर्तितः । धनधान्यविनाशश्च सर्वनाशस्तथैव च ॥ 13 ॥ ब्रह्मा के चारों कर्णों पर महामर्म विख्यात है जिनका वेध होने से धन-धान्य के विनाश के साथ ही सर्वनाश तक हो जाता है। पदव्यास¹षोडशांशो भागो द्वादशकः पुनः । बालाग्रं सन्धिसम्पाते वर्ज्यते मर्मशिल्पिभिः ॥ 14 ॥ पदव्यास के षोडशांश भाग तथा पुनः बारह भाग— ये सब बालाग्र, सन्धि सम्पातों में शिल्पियों ने वर्ज्य माने हैं। अष्टवर्गाः समाख्याताः कर्णपार्श्वश्च कीर्तिताः । ब्रह्मकर्ण च पद्मान्ते² महामर्मचतुष्टयम् ॥ 15 ॥ कर्णों के पार्श्व भाग के अष्टवर्ग नाम से कहे जाते हैं। ब्रह्म कर्ण और पद्म के अन्त में महामर्म चतुष्टय होता है। मर्मोपमर्मणी रक्ष्यै महादोषभयावहे। वंशोपवंशौ सन्धिश्च रेखाषट्कं च लाङ्गलम् ॥ 16 ॥
- 'पादन्यास' स्यात्।
- 'ब्रह्मकर्णे त्रिपद्मान्ते' इति प्रकाशित पाठः ।
308 अपराजितपृच्छा अस्तु, मर्म, उपमर्मों से सदा रक्षा करनी चाहिए क्योंकि ये महादोष और भय के कारक होते हैं।¹ इसी तरह वंश, उपवंश, सन्धि, रेखाषट्क और लाङ्गलों को भी बचाकर न्यास करना चाहिए। वास्तुपुरुषस्य शिरोखातफलमाह - भूपरिग्रहो वास्तुश्च मर्मादि कथितं तव। पित्रोर्घातो भवेच्चैवं कृते शिरसि खातकै ॥ 17 ॥ (हे अपराजित ! इस प्रकार से) मैंने तुम्हें भूमि परिग्रह करते समय के वास्तु के मर्मों के बारे में सब कह दिया है। अब वास्तुपुरुष के अङ्गों पर खात के विविध भयों को कहता हूँ। वास्तुपुरुष के शिर पर खात, खनन करने से पितृ घात होता है। भुजे स्कन्धे बन्धुनाशो हृदये च महाभयम्। धनधान्यसमृद्धिश्च जायते कुक्षिखातके ॥ 18 ॥ और, उसकी भुजाओं पर खनन करने पर बन्धुनाश होता है। उसके हृदय पर खनन करने से महान् भय उपस्थित हो जाता है जबकि कुक्षि पर खनन से धन- धान्य और समृद्धि प्राप्त होती है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वास्तुमर्मोपमर्मनिर्णयोधिकारो नामैकोनषष्टितमं सूत्रम् ॥ 59 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वास्तुमर्मोपमर्म निर्णय अधिकार नामक उनसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 59 ॥
- समराङ्गणसूत्रधार में आया है कि महावंशों के अतिक्रमण से निश्चय ही स्वामी का वध होता है। वंशों के निपीड़न से वर्षा त्रास व ताप का भय जानना चाहिए। उपमर्मों के निपीड़न से रोग व मर्मों के पीड़न ने अचानक कुल की हानि होती है। शिरा के उत्पीड़न से उद्वेग और अनर्थ उत्पन्न होता है। सन्धि व अनुसन्धियों के पीड़न ने कलह होता है, ऐसा जाने। इस प्रकार इन दोष-फलों को जानकर वास्तुपुरुष के शरीर के शिराओं-अनुशिराओं-नाड़ियों, वंशों-अनुवंशों व मर्मों को समझकर उन्हें पीड़ित न कर वास्तु का निवेशन किया जाना चाहिए क्योंकि वेध रहित निर्माण नित्य निरापद होता है- महावंशसमाक्रान्तौ भवेत् स्वामिवधो ध्रुवम्॥ वर्षेण तपनावृत्तिं वंशानां पीडनाद्विदुः। उपमर्माणि रोगाय मर्माणि कुलहानये॥ उद्वेगायार्थनाशाय शिराश्च स्युः प्रपीडिताः। कलिः स्यात् सन्धिविद्धेषु पीडितेष्वनुसन्धिषु॥ तस्मादेतानि सर्वाणि पीडितान्युपलक्षयेत्। ज्ञात्वा सिराः सानुसिराश्च नाडीर्वंशानुवंशांश्च वास्तुदेहे। यत्नेन मर्माणि फलानि चैषां वेधं त्यजेद्वास्तमुपैति नापत्॥ (समराङ्गण.
सूत्र-६० 309 दिक्पालादिवास्तुदेवपूजाबलिकर्मयुक्तिर्नाम षष्ठितमं सूत्रम् ॥ ६० ॥ विश्वकर्मावाच - अत ऊर्ध्वं पुनश्चान्यत् प्रवक्ष्यामि यथाक्रमम् । वास्तुदेहे स्थिता देवाः सम्पूज्या वृद्धये तथा ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि इसके उपरान्त पुनः अन्य विधि क्रम से बताता हूँ जिससे पूजा करने पर वास्तु के देह में स्थित देवताओं की वृद्धि अर्थात् वे प्रसन्न होकर गृही के लिए अभिवृद्धिकारक होते हैं। घृताक्षतानमीशाने पर्जन्ये चोत्पलोदकम् । जये पीताम्बरं चैव वज्रं पिष्टमयं त्वथ ॥ २ ॥ माहेन्द्रे सर्वरत्नानि सूर्ये धूपप्रवितानकम् । गोधूमाः सघृताः सत्ये भृशे मत्स्यांस्तु दापयेत् ॥ ३ ॥ सङ्गुलिं चान्तरिक्षे तु शुचिं दद्याद्धुताशने । धान्यकल्कं तथा पूष्णि वितथे चणकौदनम् ॥ ४ ॥ गृहक्षते गोरोचनं शमीपत्रं यमे तथा । गन्धर्वे शतपत्रं च भृङ्गराजे तु पीठकम् ॥ ५ ॥ (वास्तुपूजा के अन्तर्गत) ईशान देव की पूजा घृत और अक्षतों से, पर्जन्य की पूजा कमल के फूलों से, जय की पूजा पीताम्बर से और वज्र की पिष्टमय अन्न अर्थात् आटे से करें। महेन्द्र की पूजा सभी प्रकार के रत्नों से, सूर्य की पूजा धूपप्रवितान अर्थात् धूप से, सत्य की पूजा घृत युक्त गेहूँ से और भृश की पूजा मछली भेंट कर करें। अन्तरिक्ष की पूजा सङ्गुलि से, हुताशन (अग्नि) की पूजा शुचि की भेंट, पूष्णि की पूजा धान्य के आटे से और वितथ की पूजा भापे गए चने (वरवा) से करें। गृहक्षत देव की पूजा गोरोचन से, यम की पूजा शमीपत्र, गन्धर्व की पूजा शतपत्र और भृङ्गराज की पूजा पीठक से करनी चाहिए। अन्य देवताः - मृगे नीलयवं ख्यातं पितृषु गुलमोदकाः । दौवारिके मातुलिङ्गं सुग्रीवे विविधं फलम् ॥ ६ ॥ शतपत्रं पुष्पदन्ते पद्मं स्यादब्धिनायके । असुरे तु सुरा देया शोषे तैलं तिलस्तथा ॥ ७ ॥ पक्वमांसं राजयक्ष्माभिधे रोगे तथौषधम् ।
310 अपराजितपृच्छा नागे चैव क्षीरपानं श्रीखण्डं तु विश्वाधिपे ॥ 8 ॥ भल्लाटे काञ्चनं देयं सोमे दद्याच्च मण्डकान् । गिरौ तु सक्तुतोयं तु चादितौ लपिकां तथा ॥ 9 ॥ मृग की पूजा नीलयव से, पितृ की पूजा गुलमोदक, दौवारिक की पूजा मातुलिङ्ग अथवा बिजौरा, सुग्रीव की पूजा विविध फलों, पुष्पदन्त की पूजा शतपत्र, अब्धिनायक वरुणदेव की पूजा पद्म, असुर की पूजा सुरा और शोष की पूजा तिल के तेल से करनी चाहिए। राजयक्ष्मा की पूजा पक्वमांस से, रोग की पूजा औषध, नाग की पूजा क्षीरपान कराकर तथा विश्वाधिप की पूजा श्रीखण्ड से करें। भल्लाट की पूजा स्वर्णदान से, सोम की पूजा कसार अथवा फुलका या पतली रोटी से, गिरि की पूजा सक्तु के जल से और अदिति की पूजा लपसी से करनी चाहिए। तथा चान्य देवता: — दितौ कम्बलयुग्मं च ह्यापे दद्यात्तु मालती: । तथा गोदध्यापवत्से त्वर्यम्णि रक्तचन्दनम् ॥ 10 ॥ शतपत्रं सवितरि सावित्रे सर्वपुष्पकम् । विवस्वति मोदकानि हीन्द्रे स्यात्पुष्पमालिका ॥ 11 ॥ चम्पकानि त्विन्द्रजये मित्रे स्यात्तु घृतोदनम् । रुद्रे गन्ध: गुग्गुलानां सिद्धान्नं रुद्रदासके ॥ 12 ॥ पृथ्वीधरे रत्नमाला ब्रह्मण्यमृतकुम्भकम् । फलपुष्ययवाक्षतैः पञ्चगव्यैः पुनर्युतम् ॥ 13 ॥ इसी प्रकार दिति की पूजा कम्बल की जोड़ी से, आप की पूजा मालती पुष्पों, आपवत्स की पूजा गाय के दही तथा अर्यमा की पूजा रक्तचन्दन से करें। सविता की पूजा शतपत्र-कमल से, सावित्री की पूजा सभी प्रकार के पुष्पों, विवस्वान की पूजा मोदकों तथा इन्द्र की पूजा पुष्पमालाओं से करनी चाहिए। इन्द्रजय की पूजा चम्पक पुष्पों से, मित्र की पूजा घृतोदन या घी मिश्रित खिचड़ी, रुद्र की पूजा गुग्गुलु की धूप तथा रुद्रदास की पूजा पके हुए अन्न से करें। पृथ्वीधर की पूजा रत्नमाला से, ब्रह्मा की पूजा अमृतकुम्भ, क्षत की पूजा फलपुष्प से तथा पुनर्युत की पूजा पञ्चगव्य से करें। चरक्यादीनामष्टदेव्यां पूजासम्भाराह — चरक्यां चैव दातव्या अस्थिमांससुरास्तथा । पीतौदनं पक्वमांसं विदारीपिलिपिच्छयोः ॥ 14 ॥
सूत्र-६० 311 मद्यं मांसं च जृम्भायां पूतनायां रक्तौदनम् । अर्यम्णि चास्थिमांसं चास्थिमांसं पापराक्षसी ॥ 15 ॥ स्कन्दायां च पशुं मद्यं देव्योऽष्टौ सुप्रदक्षिणाः । आसां पदविधिर्नास्ति पूजां गृह्णन्ति केवलम् ॥ 16 ॥ (इसके अनन्तर बाह्यदेवियों में) चरकी की पूजा अस्थि-मांस-सुरा से तथा विदारी और पिलिपिच्छा की पूजा पीले भोजन और पक्वमांस से करें। जृम्भा की पूजा मद्य और मांस, पूतना की पूजा रक्त और खिचड़ी, अर्यमा की पूजा अस्थि व मांस और पापराक्षसी की पूजा भी इसी प्रकार अस्थि-मांस से करें। स्कन्द की पूजा पशु और मद्य से करें। इन आठों ही देवियों की पूजा भली प्रकार से प्रदक्षिणतः करें। इन देवियों का कोई पद विधान नहीं होता (ये वास्तुपद के बाहर होती हैं अतः) ये केवल पूजा ही ग्रहण करती हैं। दिक्पालक्षेत्रपालश्च बलिं – आच्छाद्यन्ते वस्त्रयुग्मैरम्बिका भद्रकुम्भके । दिक्पालेभ्यो बलिं दद्यात्क्षेत्रपेभ्यो विशेषतः ॥ 17 ॥ अम्बिका और भद्रकुम्भ को दो अलग-अलग वस्त्रों से ढँककर दिक्पालों को बलि प्रदान करें। इसी तरह क्षेत्रपालों को भी बलि प्रदान करनी चाहिए। प्राचीं इन्द्रपूजानिर्देशमाह – ॐ पूर्व्वां दिशायते वज्रहस्त महाबल । ऐरावतस्कन्धारूढ इन्द्रदेव यथाविधि ॥ 18 ॥ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह् गृह् स्वाहा। अष्टगजारूढ क्षेत्रपालैः परिवेष्टित सुराधिराज नमोऽस्तुते ॥ 19 ॥ इन क्षेत्रपालों में पूर्व दिशा के अधिपति इन्द्रदेव जो महाबली है और अपने हाथ में वज्र धारण करते है तथा ऐरावत के स्कन्ध पर सवारी करते हैं, की यथाविधि पूजा करनी चाहिए। इन्द्रदेव के आवाहन का मन्त्र है— हे आठ गजारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित सुराधिराज इन्द्रदेव! हम आपको नमस्कार करते हैं और आपका आवाहन करते हैं कि आप हमारी प्रदत्त बलि पूजा को ग्रहण करें, ग्रहण करें — स्वाहा। आग्नेयां अग्निदेवपूजानिर्देशमाह – ॐ आग्नेय्यां दिशापते श्रुवाहस्त महाबल । मेषं चैव समारूढ अग्निदेव यथाविधि ॥ 20 ॥
312 अपराजितपृच्छा आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टमेषारूढ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित प्रेतराज नमोऽस्तुते ॥ 21 ॥ इसी प्रकार यथाविधि पूजा-बलि-आवाहन अग्निदेव का भी करें जो आग्नेय कोण के अधिपति है। जो महाबली है और जो अपने हाथ में यज्ञ का स्रुवा धारण किए हुए है और मेष पर सवार हैं। आवाहन मन्त्रों से की गई पूजा और बलि को आप अष्ट मेषारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित हे प्रेतराज! आपको नमस्कार है और आप हमारी प्रदत पूजा-बलि को ग्रहण करें, ग्रहण करें— स्वाहा। दक्षिणदिशायां यमदेवपूजानिर्देशमाह — आँ याम्यायां तु दिशापते दण्डहस्त महाबल। महामहिषामारूढ यमदेव यथाविधि ॥ 22 ॥ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टमहिषारूढ क्षेत्रपेश्च परिवेष्टित प्रेताधिराज नमोऽस्तुते ॥ 23 ॥ दक्षिण दिशा के अधिपति, महाबलवान, हाथ में दण्ड धारक, महामहिष पर आरूढ़ यमराज भी यथाविधि आवाहन मन्त्रों से 'पूजा-बलि ग्रहण करें, ग्रहण करें' ऐसे निवेदन करते हुए कहें कि 'हे प्रेताधिराज आप आठ महिषारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित होकर हमारी पूजा ग्रहण करें स्वाहा, आपको हमारा नमस्कार है।' नैर्ऋत्यायां पूजानिर्देशमाह — आँ नैर्ऋत्या च दिशापते खड्गहस्त महाबल। प्रेतस्कन्धसमारूढ बलिदेव यथाविधि ॥ 24 ॥ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टप्रेतारूढ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित प्रेताधिराज नमोऽस्तुते ॥ 25 ॥ और, नैर्ऋत्य के दिशाधिपति, महाबलवान, हाथ में खड्ग धारण करने वाले प्रेतों के कंधों पर सवारी करने वाले बलिदेव की भी यथाविधि पूजा करें। कहें कि 'हे! अष्टप्रेतारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित प्रेताधिराज ! आपको हमारा नमस्कार है; हम आपको आवाहन मन्त्रों से पूजा-बलि निवेदित कर रहे है; इसे ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा।' परदिशायां जलेश्वरपूजानिर्देशमाह — आँ पश्चिमायां दिशापते पद्महस्त महाबल। नक्रं चैव समारूढ जलेश्वर यथाविधि ॥ 26 ॥
सूत्र-६० ३१३ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टनक्रसमारूढ क्षेत्रपैः परिवेष्टित जलाधिराज नमोऽस्तुते ॥ 27 ॥ और, पश्चिम दिशाधिपति, महाबलवान, हाथ में कमल धारण करने वाले, मगर पर सवारी करने वाले जलेश्वर वरुणदेव की भी यथाविधि पूजा करें। कहें कि 'हे आठ नक्रों-मगरों पर समारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित जलाधिराज वरुणदेव! हम आवाहन मन्त्रों से आपको बलि-पूजा निवेदित करते हुए नमस्कार करते हैं कि आप इसे ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा। वायव्यकोण्यां वायुदेवपूजानिर्देशमाह – आँ वायव्यां तु दिशापते ध्वजहस्त महाबल। मृगपृष्ठसमारूढ वायुदेव यथाविधि ॥ 28 ॥ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टमृगारूढ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित पवनाधिराज नमोऽस्तु ते ॥ 29 ॥ इसी प्रकार वायव्य दिशाधिपति, महाबलवान, हाथ में ध्वज धारण करने वाले तथा मृगारूढ़ वायुदेव की भी यथाविधि पूजा करें। कहें कि 'हे आठ मृगारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित, पवनाधिराज वायुदेव आपको नमस्कार है। हम आवाहन मन्त्रों से आपको बलि-पूजा निवेदन करते हैं, इसे ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा। उत्तरदिशायां निधिराजपूजानिर्देशमाह – आँ उत्तरस्यां दिशापते निधिहस्त महाबल। हस्तिस्कन्धसमारूढ निधिराज यथाविधि ॥ 30 ॥ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टगजारूढ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित निधिराज नमोऽस्तु ते ॥ 31 ॥ और, उत्तर दिशा के अधिपति, महाबलवान, हाथों में निधि धारण किए हुए, हाथी के कन्धे पर सवारी करने वाले निधिराज कुबेर की भी यथाविधि पूजा करें। कहें. कि 'हे आठ गजारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित निधिराज कुबेरदेव आपको नमस्कार है, आपको हम आवाहन मन्त्रों के साथ बलि-पूजा निवेदन करते हैं, उसे आप ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा। ईशान्यां रुद्रदेवपूजानिर्देशमाह – आँ ईशान्यां तु दिशापते शूलहस्त महाबल। वृषपृष्ठसमारूढ रुद्रदेव यथाविधि ॥ 32 ॥
314 अपराजितपृच्छा आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टवृषारूढ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित भूतराज नमोऽस्तु ते ॥ ३३ ॥ और, ईशानकोण की दिशा के अधिपति, महाबलवान, हाथ में शूल को धारण करने वाले और बैल की पीठ पर सवारी करने वाले रुद्र देव की भी यथाविधि पूजा करे। कहें कि 'हे अष्टवृषारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित भूतराज रुद्रदेव! आपको नमस्कार है; हम आपको आवाहन मन्त्रों से बलि-पूजा निवेदित करते हैं; इसे ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा।' अधस्तात्तु विष्णुदेवपूजानिर्देशमाह - आँ अधस्तात्तु दिशापते चक्रहस्त महाबल। गरुडं च समारूढ विष्णुदेव यथाविधि ॥ ३४॥ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टगरुडस्थ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित जगत्पते नमोऽस्तु ते ॥ ३५ ॥ इसी प्रकार अधस्तात्तु (नीचे स्थित) दिशाधिपति, महाबलवान, हाथ में चक्र को धारण करने वाले गरुड़ की सवारी करने वाले विष्णुदेव की भी यथाविधि पूजा करे। इस अवसर पर कहें कि 'हे आठ गरुड़ों पर सवारी करने वाले क्षेत्रपालों से परिवेष्टित जगत्पते! आपको नमस्कार है; हम आवाहन मन्त्रों से पूजा-बलि आपको निवेदित करते हैं; इसे आप ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा।' अथोर्ध्वायां ब्रह्मदेवपूजानिर्देशमाह - आँ ऊर्ध्वायां तु दिशापते अक्षहस्त महाबल। हंसे चैव समारूढ ब्रह्मदेव यथाविधि ॥ ३६॥ आवाहनमन्त्रैः पूजा बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टहंसारूढ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित सृष्टिराज नमोऽस्तु ते ॥ ३७ ॥ और, ऊर्ध्व दिशा के अधिपति, महाबलवान, हाथ में अक्षमाला धारण करने वाले और हंस सवार ब्रह्मदेव की भी यथाविधि पूजा करें। कहें कि 'हे आठ हंसारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित सृष्टिराज-ब्रह्मदेव! आपको नमस्कार है, हम आपको आवाहन मन्त्रों से बलि-पूजा निवेदन करते हैं; इसे ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा।' अन्यदप्याह - स्थानदेवा जलदेवाः स्थलदेवास्तथैव च। तथाऽन्तरिक्षदेवाश्च भूमिदेवास्तथैव च ॥ ३८ ॥
सूत्र-६१ 315 तथा पातालदेवाश्च अमृतवृक्षदेवताः । तथा प्रासाददेवाश्च गृहदेवास्तथैव च ॥ ३९ ॥ बृहद्देवाः क्षेत्रदेवा दद्यादेभ्यो बलिं बुधः । क्षमापयेन्नमस्कृत्य तथैव सर्वदेवताः ॥ ४० ॥ (इसके अनन्तर इसी क्रम में) स्थानदेव, जलदेव, स्थलदेव, अन्तरिक्षदेव, भूमिदेव, पातालदेव, अमृतवृक्षदेवता, प्रासाददेव, गृहदेव, बृहद्देव, क्षेत्रदेव आदि समस्त देवताओं को समझदार लोगों को बलि प्रदान करते हुए नमस्कार और क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां दिक्पालादिवास्तुदेवपूजाबलिकर्मयुक्त्यधिकारो नाम षष्टितमं सूत्रम् ॥ ६० ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में दिक्पालादिवास्तुदेव पूजा-बलिकर्मयुक्त अधिकार नामक साठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ६० ॥ आचार्यसूत्रधारपूजानिर्णयो नामैकषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६१ ॥ विश्वकर्मोवाच — आचार्य पूजयेत्तत्र वस्त्रालङ्कारभूषणैः । स्वर्णपट्टैः कुण्डलाभ्यां कण्ठाभरणकङ्कणैः ॥ १ ॥ रत्नयुक्तमुद्रिकाभिः कटिसूत्रादिकैस्तथा । पादाभरणकैश्चैव हवेन्द्र ¹साङ्गमालिकाः ॥ २ ॥ विश्वकर्मा बोले कि वास्तुपूजावसर पर आचार्य की वस्त्र, अलङ्कार, आभूषण, स्वर्णपट्ट, कानों के कुण्डलों, गले के आभरण और हाथों के स्वर्ण कङ्कणों, रत्नयुक्त अङ्गूठी, कमरबन्द करधनी, पाँवों के गहने, हवि वस्तु और समस्त अङ्गों में धारण हो सके—ऐसी मालाओं को प्रदान कर पूजन करना चाहिए। परीपट्टैरूर्णवस्त्रैः ²शिखिरोमाश्र्व छत्रकैः । वाहनैर्युक्तमेवाथ यानझम्पानकोत्तमैः ॥ ३ ॥ अश्वो गजो रथो वापि दातव्या भूमिसंयुताः । ग्रामो देशाः पृथगुक्तं गुरुपत्नीं विशेषतः ॥ ४ ॥
- 'साङ्गमात्रिकाः' इति प्रकाशित पाठः।
- 'शिखरो मात्र ? छत्रकैः' इति प्रकाशित पाठः।
316 अपराजितपृच्छा भूमिस्थानगेहदानमाचन्द्रार्कं च तत्फलम्। वस्त्रालङ्करणैर्युक्तं गुरुं शिष्यस्तु भक्तितः ॥ ५॥ इति गुरुपूजा। इसी तरह सुन्दर रेशमी और ऊनी वस्त्रों से तथा मोरपह्नों से बने हुए छत्रक, पट्टों से युक्त वाहनों से, गाड़ी, ऐसे उत्तम यान झम्पानक अर्थात् जिन यानों से आसानी से किसी बाधा को छलाङ्ग लगाने में सफलता मिलती है; अश्व, गज, रथ, बावड़ी आदि भूमि सहित देनी चाहिए। ग्राम, देश आदि गुरु पत्नी को भी अलग से देने चाहिए। भूमि स्थान, ग्रह दानों को आचन्द्रार्क देना चाहिए अर्थात् ऐसा दान हो जो सूर्य-चन्द्र जब तक रहें तब तक के लिए देने चाहिए, वे वापस नहीं लिए जाए— तभी उनका पुण्यफल मिलता है। इसी तरह गुरु के शिष्य को भी भक्तिपूर्वक वस्त्रालङ्करण युक्त भेंट करनी चाहिए। सूत्रधारप्रशंसामाह – भूमेस्तले सूत्रधारो विश्वाधिपो द्वितीयकः । वेदवेदाङ्गसम्भूतो हविष्याशी ¹क्षिते द्विजः ॥ ६॥ इस भूमितल पर सूत्रधार एक प्रकार से दूसरा विश्वाधिप है। वह वेद-वेदाङ्ग से सम्भूत हविष्य को भोग करने वाला क्षिति पर रहने वाला द्विज है। सूत्रधारं ततः प्राज्ञः सर्वसूत्रादिबन्धकम् । वास्तुवेदप्रववतारं शास्त्रज्ञं प्रियवादिनम् ॥ ७ ॥ माधुर्यालापनोपेतं संसारमोहमुद्रकम् । यस्य नाशात्परे साध्यं धर्मार्थकाममोक्षकम् ॥ ८ ॥ तं शिल्पिनं पूजयेत आर्यदेशसमुद्भवम् । आर्यालापबालबोध्यं संसारार्णवतारणम् ॥ ९ ॥ वाग्मिनं च तथा हेतुज्ञानातर्कितकौशलम् । सर्वशास्त्रज्ञानवन्तं विज्ञानादिसमन्वितम् ॥ १० ॥ इस तरह सूत्रधार सभी प्रकार के सूत्रादि बन्धयुक्त प्राज्ञ एवं वास्तुवेद का प्रवक्ता तथा शास्त्रज्ञ और प्रियवादी होता है। वह मधुर वाणी में बातचीत करने वाला और संसार के मोह की मुद्रा का नाश करना इसके लिए परम साध्य है जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का कारक है। ऐसे ही शिल्पी की पूजा करनी चाहिए
- 'धिते?' इति प्रकाशित पाठः ।
सूत्र-६१ 317 जो आर्यदेश (भारत) में उत्पन्न हुआ हो क्योंकि आर्यों की बोली में बातचीत बालक भी सरलता से समझ सकते है, वह बोली बड़ी सरल एवं संसार सागर से तारने वाली है। ऐसे आर्य देशोत्पन्न शिल्पी वाग्मिन या बृहस्पति के समान वाक्पटु, बुद्धिमान और हेतुज्ञान से तार्किकता के कौशल को जानने वाले, सभी शास्त्रों में ज्ञानवान्, विज्ञानादि से समन्वित होते हैं। शिल्पिनसम्मानह — पूजयेद् दिव्यवस्त्रैश्च दिव्यालङ्कारभूषितैः । पृष्ठपट्टैर्नेत्रपट्टैः सुवर्णैर्दशाङ्ग¹मालिकाः ॥ ११ ॥ पुत्रकलत्रसंयुक्तं भ्रातृयुक्तं तथोत्तमम्। सभृत्यं बलयुक्तं च शैलकर्माधिकारकम् ॥ १२ ॥ ऐसे योग्य शिल्पी को दिव्य वस्त्रों, दिव्य अलङ्कारों और आभूषणों से भूषित करें। पीठ वाला पट्ट, महीन रेशमी कपड़ा (नेत्रपट्ट), सुवर्ण की बनी हुई दशाङ्ग मालाएँ आदि उनके पुत्र-पत्नी तक और भाइयों तक को तथा उनके उत्तम भृत्यबलों तक भी और पाषाण कर्माधिकारी, सलाट, तक्षक गणों को भी भेंट-पूजा करें। कुटुम्बगृहचिन्ताश्च खाद्यपेयादिकोद्भवाः । वस्त्रताम्बूलादि चिन्ता गृहेषु या भवन्ति च ॥ १३ ॥ ताश्चापहारणीया वै कर्मचिन्ता यथा भवेत्। ग्रामं वा भोगभूमिं वा कर्मकारोचितं यथा ॥ १४ ॥ बलीवर्दाश्च वाहिनीयानझम्पानकादिकम्। हलं सकूपं क्षेत्र च पुष्पोद्यानं फलैर्युतम् ॥ १५ ॥ गृहं दिव्यं च भुवनं पञ्चभूम्यादिकं गृहम्। ध्वजाकलशसंयुक्तं कर्त्तव्यं शिल्पिने तथा ॥ १६ ॥ इसी प्रकार खाद्य, पेय आदि के कारण होने वाली कुटुम्ब-गृहचिन्ता, घरों में आवश्यक वस्त्र ताम्बूलादि की चिन्ता जो प्रायः घर-घर होती है, उन सब चिन्ताओं का जो कर्मकारों में भी होती है— उन चिन्ताओं के निवारण हेतु उन कर्मकारों के लिए उचित ग्राम या भोगभूमि, खेती के लिए वलीवर्द अर्थात् बैल, गाड़ी, वाहन, यानादि झम्पादि से युक्त तथा हल² प्रमाण वाली ऐसी भूमि जो कूप, फल-पुष्पोद्यान
- 'मात्रिका: ?' इति प्रकाशित पाठः।
- यहाँ हल से आशय हल के प्रमाण की भूमि से प्रतीत होता है। हल भू-माप की इकाई के रूप में स्वीकृत है। एक हल से जोती गई भूमि के माप को हल-माप कहा जाता है। वासिष्ठीपुत्र पुलुमवि के
318 अपराजितपृच्छा युक्त हो देनी चाहिए। इसी प्रकार गृह, भुवन दिव्यस्वरूप के, यहाँ तक कि पाँच तलों तक के भवनों, गृहों को ध्वजा-कलश से युक्त सजावट के साथ शिल्पियों के लिए प्रदान करने की व्यवस्था होनी चाहिए। पादापत्यददे तस्या प्रेक्षनादिक्ष सन्तताः ?। तेन तत् ह्रियते चैव गृहचिन्तादि बाह्यतः ॥ 17 ॥ एकचित्ते समाधिष्ठे प्रासादकर्मकौशलम्। परब्रह्मानुष्ठानवत् लीयमानो यथा भवेत्॥ 18 ॥ तस्याहाय्यं वृद्धिहेतु प्रारब्धकृतनिश्चयम्। तेनासौ लभते सिद्धिमिहलोके परत्र च॥ 19 ॥ इसी प्रकार उनके लिए (आपदाओं का निवारण करने वाले निरीक्षक पदादि की व्यवस्था करें) ताकि वे गृह विषयक चिन्ताओं को बाहर ही त्याग दें और एकचित से अर्थात् एकाग्र मन से प्रासाद कर्म कौशल दिखाने में समाधिष्ठ हो सकें। उनकी सांसारिक चिन्ताओं को दूर करने पर वे अपने कर्म-कौशल में इतने लीन हो जाएँ मानों वे परब्रह्मानुष्ठान में ही लीयमान हो गए हों। यह स्मरणीय है कि उन शिल्पियों के कर्म-कौशल दिखलाने में उनकी सहायता में वृद्धि हेतु ही उपर्युक्त तरीकों के प्रारब्ध के उपायों का कृतनिश्चय अर्थात् पूरी व्यवस्था की गई है, जिससे कि ये इस लोक और परलोक में भी सिद्धि का लाभ पा सके। सूत्रधारसम्मुखे प्रार्थनानिवेदनम् — सूत्रधारं तथाचार्यं बद्धहस्तः क्षमापयेत्। पिता च मम त्वष्टा च इह लोके भवान् मतः ॥ 20 ॥ यजमान को चाहिए कि इस सब भेंट-पूजा-सम्मान के बाद वह सूत्रधार तथा आचार्य से हाथ जोड़कर क्षमा याचना करें और कहे कि 'आप ही हे त्वष्टा! मेरे द्वितीय शती के नासिक गुहाभिलेख में यह माप पहली बार देखने में आया है। (सेलेक्टेड इन्सक्रिप्शंस फ्रॉम महाराष्ट्र : एम. जी. दीक्षितार, पूना 1947 ई., भाग 1, पृष्ठ 208) ऐसी भूमि करमुक्त होती थी। कृष्णा-गुण्टूर (आन्ध्रप्रदेश) से प्राप्त तीसरी व चौथी शताब्द के एक अभिलेख से हलवाहा द्वारा हल से जोते जाने योग्य कर-मुक्त भूमि भिक्षुओं को पुण्यवृद्धि के प्रयोजन से दान में दिए जाने का उल्लेख मिलता है— ...हल सतस पदायिस...। (तत्रैव पृष्ठ 238) इतिहासकारों के अनुसार हल का वास्तविक भू-माप क्षेत्र निर्धारित करना कठिन है किन्तु अभिलेखों के अनुसार यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि योग्य भूमि की, एक हल द्वारा वर्ष पर्यन्त जोती गई सारी भूमि का माप 'एक हल भूमि' से लगाया जा सकता है। डॉ. गोपीनाथ शर्मा का मत है कि मेवाड़ में भूमि का माप बीघा व हल से होता आया है जो छोटे और बड़े नाप थे। एक हल में 50 बीघा का प्रमाण होता था। बीघा साधारणतः 25 से 40 बाँस तक आंका जाता था। (राजस्थान के इतिहास के स्रोत, जयपुर 1982 ई. पृष्ठ 237)
सूत्र-६२ 319 पिता है इस लोक में — ऐसा मेरा मत है। परत्र च स्वयं स्रष्टा तथा मम भवान् गुरुः । त्वं माता च पिता चैव त्वं च पितृपितामहः ॥ २१ ॥ संसारपाशच्छेदं च त्वं कुर्या मम योगतः । भूषणार्थैः पूजनीया वस्त्रैश्च खातकारकाः ॥ २२ ॥ आप ही स्वयं सृष्टा है तथा आप ही मेरे गुरु है; आप ही माता और आप ही पिता तथा आप मेरे पितृ, पितामह ही हैं। सुयोग से कृपा करके आपने मेरे संसार पाश रूपी फँदे को काट दिया है और मुझ से बन पड़ी, उतनी मैंने भूषण से, अर्थ और वस्त्र से हे खातकारकगणो ! मैंने आपकी पूजा की। विश्रामस्तद् दिने वास्तो सर्वविघ्नोपशामकः । दीनान्धयाचकेभ्यस्तु तुलादानं समर्पयेत् ॥ २३ ॥ अस्तु, आज के दिन अब आप विश्राम करें; आज के दिन को विश्राम का दिवस समझें जिससे वास्तु सर्व विघ्नों को शमन करने वाला सिद्ध हो सके।' इसके बाद यजमान दीनों को, अन्धों, याचकों को तुलादान¹ की सामग्री को समर्पित कर दें। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छा- यामाचार्यसूत्रधारपूजानिर्णयाधिकारो नामैकषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६१ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में आचार्य- सूत्रधार पूजा निर्णय अधिकार नामक इकसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ६१ ॥ वास्तुपरिभ्रमण॥दिग्गुणदोषनिर्णयो नाम द्वाषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६२ ॥ विश्वकर्मोवाच — अतः परं प्रवक्ष्यामि ज्ञानं च धर्मदुर्लभम् । वास्तुविद्यापूर्वकं च सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि इसके आगे मैं वास्तुविद्यापूर्वक सर्व सिद्धि देने वाले धर्म हेतु परम दुर्लभ ज्ञान के विषय में कहता हूँ।
- तुलादान की सामग्री का वर्णन मत्स्यपुराण, लिङ्गपुराण व अग्निपुराण में आया है। मत्स्यपुराण में तुलापुरुषदान की विधि आई है। आरोहणकाल में राजा खड्ग, ढाल, कवच एवं अन्य समस्त आभरणों से भूषित रहे एवं स्वर्ण निर्मित सूर्य सहित धर्मराज को बँधी मुट्ठी वाले दोनों हाथों से पकड़कर विष्णु के मुख की ओर देखता हुए स्थिर रहे— सखड्गचर्मकवचः सर्वाभरणभूषितः ॥ धर्मराजमथादाय हैमं सूर्येण संयुतम्। कराभ्यां बद्धमुष्टिभ्यामास्ते पश्यन् हरेर्मुखम् ॥ (मत्स्य. 274, 65-66)
320 अपराजितपृच्छा वास्तुदिशामुक्तिमानं रव्यानुसारेण वास्तुमुखस्थितिं — ज्योतिःशास्त्रप्रणेतारं सर्वकामफलप्रदम्। प्रणम्यं तं च पुरुषं राशिमध्ये तथा स्थितम् ॥ २ ॥ रवौकन्यातुलालौच पूर्वे शिरः समाश्रितः। धनोश्च मकरे कुम्भे दक्षिणे तु व्यवस्थितः ॥ ३ ॥ मीने मेषे वृषे चैव पश्चिमे तु समाश्रितः। मिथुने सिंहकर्क च ह्युत्तरेण व्यवस्थितः ॥ ४ ॥ सर्वकालक्रमोऽयं च राशिमध्ये ह्यतः शृणु॥ देवताश्च क्रमयोगेन स वास्तुः सरते महीम् ॥ ५ ॥ यह ज्ञान ज्योतिष शास्त्र के जानकारों के लिए सर्वकाम फल प्रदान करने वाला है। अतः राशियों के मध्य स्थित रहने वाले पुरुष को प्रणाम करें। वृश्चिक, कन्या, तुला (के सूर्य में) पूर्व की ओर सिर रखे हुए; धनु, मकर कुम्भ को दक्षिण की ओर सिर किए हुए; मीन, मेष और वृष को पश्चिम की ओर सिर किए हुए; मिथुन, सिंह और कर्क का उत्तर दिशा की ओर सिर किए हुए— इस समस्त काल क्रम को राशियों के मध्य चलता हुआ समझें। अतः इसके बारे में सुनें कि देवता भी अपने क्रमानुसार ही इस भूमि पर वास्तु में आते हैं। यत्र भानुस्तत्र शिरं लक्षितव्यं रविक्रमात्। अन्यथा कुरुते दुःखं शिरो वास्तावलङ्कृतम् ॥ ६ ॥ उक्त विधि से जहाँ सूर्य की स्थिति हो वहीं वास्तु का सिर लक्षित करके सूर्य के ही क्रम से वास्तु का अलङ्करण करना चाहिए, यदि वास्तु के सिर का इसके अतिरिक्त अलङ्करण किया जाएगा तो दुःख का कारण बनेगा। देवागारं गृहं यत्र न कुर्याच्छिरः सम्मुखम्। मृत्युरोगभया नित्यं शस्तं च कुक्षिसन्मुखम् ॥ ७ ॥ वहाँ देवागार, देवता के मन्दिर तथा घर वास्तुपुरुष के सिर के सम्मुख कभी भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर नित्य ही रोग और मृत्यु का भय बना रहता है अस्तु, वास्तुदेव की कुक्षि के सन्मुख ही देवागार, गृहादिक बनाने चाहिए, यही प्रशस्त माना गया है। इत्यमनन्तर एषां फलमाह — कन्यातुलावृश्चिके च भास्करो यदि संस्थितः। पूर्वे मुखं न कर्तव्यं गृहं भवति निष्फलम् ॥ ८ ॥
सूत्र-६२ 321 यदि सूर्य कन्या, तुला और वृश्चिक राशि पर हो तब कभी भी घरों को पूर्व की . ओर मुख किए हुए नहीं बनाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर ये भवन गृह निष्फल हो जाएंगे। मकरे चैव धनुषि कुम्भे वा च दिवाकरे। याम्यादिशि मुखं कुर्याद्राजचौराग्निजं भयम्॥ ९॥ यदि सूर्य धनु, मकर, और कुम्भ राशि पर स्थित हो तो भवनादिक का मुख दक्षिण दिशा की ओर नहीं बनाएँ क्योंकि ऐसा करने पर राज्य की ओर से, चोर- तस्कर तथा अग्नि से होने वाला भय बना रहेगा। मीने मेषे वृषे चैव पश्चिमा दिग् च दूषिता। स्त्रीणां रोगं महाघोरं भवति ह्यतिदारुणम्॥ १०॥ यदि सूर्य मीन, मेष और वृष राशि पर स्थित हो तब भवनादिक का मुख पश्चिम दिशा की और नहीं रखें क्योंकि ऐसा करने पर घर की स्त्रियों में महाघोर रोग अतिदारुण रूप से बढ़ने का भय बना रहता है। मिथुने सिंहकर्कै च वेश्म नैवोत्तराननम्। दोषशोकभयं तत्तु न कुर्याच्च विचक्षणैः॥ ११॥ इसी प्रकार यदि सूर्य मिथुन, सिंह और कर्क राशिस्थ हो तो घरों को उत्तराभिमुखी कभी नहीं बनाएँ। इसे विद्यावान् लोगों ने दोषपूर्ण बताया है और शोक तथा भय का कारक कहा है। तत्र ना सर्पति वास्तु ¹भ्रमतेरग्निमध्यतः। पूर्वदक्षिणतश्चैव पश्चिमोत्तरतो मुखम्॥ १२॥ अग्नि कोण के मध्य से सर्प-वास्तु नहीं चलता है अथवा नहीं फिरता। अस्तु, पूर्व-दक्षिण तथा उत्तर-पश्चिम की ओर मुख से भवन बना सकते हैं। शिरो नेत्रे च बाहू च उदरं कटिजङ्घया। वेध्यन्ते गृहे मर्म पूजाहानिर्महद्भयम्॥ १३॥ यदि वास्तुपुरुष के सिर, नेत्र, बाहू, उदर, कटि, जङ्घा को गृह के मर्म वेधते हों तो पूजा की हानि और महद्भय की उत्पत्ति होगी। कन्यादिसङ्क्रान्तियोगे प्राच्यादिक्रमतो दिशि। न कुर्वीतं शिरो वास्तोर्न कार्यं तन्मुखं गृहम्॥ १४॥
- 'भ्रमणै?' इति प्रकाशित पाठः।
322 अपराजितपृच्छा कन्यादि संक्रान्ति योगों में प्राच्यादि दिशा क्रम से वास्तु का सिर नहीं करना चाहिए और उस सिर की ओर गृह का मुख भी नहीं रखना चाहिए। क्षपाकरेणैव गृहं पुरस्तात् कुर्यान्न वास्तु न च यातु कर्ता। पतन्ति खन्या न च दृष्टिसंस्थिता तस्मात्प्रयत्नेन त्विदं विचिन्त्यताम् ॥ 15 ॥ इति वास्तुदिशामुक्तिमानम्। पिशाचों (प्रवृत्तिवालों या चन्द्रमा) के अनुसार गृह नहीं बनवाएँ क्योंकि उनके बनाए गए गृह, वास्तु तथा वे पिशाच वास्तुकर्त्ता¹ सभी खड्डे में पड़ते हैं परन्तु जिनके सही-सही शास्त्र बुद्धि की आँखें हैं, वे खड्डे में नहीं पड़ते। अतएव इस बात पर पूरे प्रयत्न के साथ ध्यान देना और इनको हमेशा मनन करते रहना चाहिए। अथ दिक्विदिक् वास्तुवेधमाह — दिशायां विदिशायां च वास्तुवेधविशोधनम्। जीर्णे नवतरे वापि वेधदोषं विवर्जयेत्॥ 16 ॥ दिशाओं और विदिशाओं में जो वास्तुवेध पड़ते हों, उनका विशोधन अवश्य करना चाहिए परन्तु जीर्ण वास्तु को पुनः उद्धार करके नवीन बनाया जाता हो तो कोई वेध दोष का चिन्तन नहीं करें। वेधा नः कथिता पूर्व दोषांश्चैव ततः श्रृणु। एकपादादिकं वास्तु पर्यन्तं सहस्रान्तिकम्॥ 17 ॥ अब तक मैंने वेधों के बारे में नहीं कहा है। अस्तु, अब वेधों के दोषों को सुनो जो एक पादादिक वास्तु से सहस्र पादादिक वास्तु पर्यन्त पाए जाते हैं। सुरस्थानं यदा शून्यं पदं पूजां विना यदा। विघ्नोत्कटं महाघोरं कुरुते दारुणं भयम्॥ 18 ॥ जिस वास्तु में यदि सुरस्थान बिना पूजा के और बिना पद के शून्य ही रह जाए तो ऐसे वास्तु को 'विघ्नोत्कटवास्तु' कहते है जो महाघोर दारुण भय कारक बनता है। वीथिकान्तरबाह्येषु पदमेकं सुरैर्विना। विरोधं गोत्रकलहं मुक्तकोणस्य तत्फलम्॥ 19 ॥
- पिशाच से आशय सम्भवतः पिशाचपद भी हो सकता है। मयमतं में पैशाचपद का वर्णन हुआ है। नारदसंहिता में भी पिशाचांश का वर्णन है। इक्यासीपद वास्तुचक्र में मध्य के नौ कोष्ठकं ब्रह्मस्थान के होने से त्याज्य हैं, चक्र के चारों ही ओर 32 कोष्ठकों को छोड़कर समीप के 24 कोष्ठक पिशाचांश कहे जाते हैं। इसमें यदि गृहारम्भ, शिलान्यासादि किया जाता है तो दुःख, शोक तथा भयप्रद होता है— मध्ये नवपदं ब्रह्मस्थानं तदतिनिन्दितम्। द्वात्रिंशदंशाः प्राकाराः समीपांशाः समन्ततः॥ पिशाचांशा गृहारम्भे दुःखशोकभयप्रदाः। शेपास्युर्गृहनिर्माणे पुत्रपौत्र धनप्रदाः॥ (नारद. 31, 20-21)