भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 359

सूत्र-६० ३१३ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टनक्रसमारूढ क्षेत्रपैः परिवेष्टित जलाधिराज नमोऽस्तुते ॥ 27 ॥ और, पश्चिम दिशाधिपति, महाबलवान, हाथ में कमल धारण करने वाले, मगर पर सवारी करने वाले जलेश्वर वरुणदेव की भी यथाविधि पूजा करें। कहें कि 'हे आठ नक्रों-मगरों पर समारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित जलाधिराज वरुणदेव! हम आवाहन मन्त्रों से आपको बलि-पूजा निवेदित करते हुए नमस्कार करते हैं कि आप इसे ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा। वायव्यकोण्यां वायुदेवपूजानिर्देशमाह – आँ वायव्यां तु दिशापते ध्वजहस्त महाबल। मृगपृष्ठसमारूढ वायुदेव यथाविधि ॥ 28 ॥ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टमृगारूढ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित पवनाधिराज नमोऽस्तु ते ॥ 29 ॥ इसी प्रकार वायव्य दिशाधिपति, महाबलवान, हाथ में ध्वज धारण करने वाले तथा मृगारूढ़ वायुदेव की भी यथाविधि पूजा करें। कहें कि 'हे आठ मृगारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित, पवनाधिराज वायुदेव आपको नमस्कार है। हम आवाहन मन्त्रों से आपको बलि-पूजा निवेदन करते हैं, इसे ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा। उत्तरदिशायां निधिराजपूजानिर्देशमाह – आँ उत्तरस्यां दिशापते निधिहस्त महाबल। हस्तिस्कन्धसमारूढ निधिराज यथाविधि ॥ 30 ॥ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टगजारूढ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित निधिराज नमोऽस्तु ते ॥ 31 ॥ और, उत्तर दिशा के अधिपति, महाबलवान, हाथों में निधि धारण किए हुए, हाथी के कन्धे पर सवारी करने वाले निधिराज कुबेर की भी यथाविधि पूजा करें। कहें. कि 'हे आठ गजारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित निधिराज कुबेरदेव आपको नमस्कार है, आपको हम आवाहन मन्त्रों के साथ बलि-पूजा निवेदन करते हैं, उसे आप ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा। ईशान्यां रुद्रदेवपूजानिर्देशमाह – आँ ईशान्यां तु दिशापते शूलहस्त महाबल। वृषपृष्ठसमारूढ रुद्रदेव यथाविधि ॥ 32 ॥