अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें312 अपराजितपृच्छा आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टमेषारूढ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित प्रेतराज नमोऽस्तुते ॥ 21 ॥ इसी प्रकार यथाविधि पूजा-बलि-आवाहन अग्निदेव का भी करें जो आग्नेय कोण के अधिपति है। जो महाबली है और जो अपने हाथ में यज्ञ का स्रुवा धारण किए हुए है और मेष पर सवार हैं। आवाहन मन्त्रों से की गई पूजा और बलि को आप अष्ट मेषारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित हे प्रेतराज! आपको नमस्कार है और आप हमारी प्रदत पूजा-बलि को ग्रहण करें, ग्रहण करें— स्वाहा। दक्षिणदिशायां यमदेवपूजानिर्देशमाह — आँ याम्यायां तु दिशापते दण्डहस्त महाबल। महामहिषामारूढ यमदेव यथाविधि ॥ 22 ॥ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टमहिषारूढ क्षेत्रपेश्च परिवेष्टित प्रेताधिराज नमोऽस्तुते ॥ 23 ॥ दक्षिण दिशा के अधिपति, महाबलवान, हाथ में दण्ड धारक, महामहिष पर आरूढ़ यमराज भी यथाविधि आवाहन मन्त्रों से 'पूजा-बलि ग्रहण करें, ग्रहण करें' ऐसे निवेदन करते हुए कहें कि 'हे प्रेताधिराज आप आठ महिषारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित होकर हमारी पूजा ग्रहण करें स्वाहा, आपको हमारा नमस्कार है।' नैर्ऋत्यायां पूजानिर्देशमाह — आँ नैर्ऋत्या च दिशापते खड्गहस्त महाबल। प्रेतस्कन्धसमारूढ बलिदेव यथाविधि ॥ 24 ॥ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टप्रेतारूढ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित प्रेताधिराज नमोऽस्तुते ॥ 25 ॥ और, नैर्ऋत्य के दिशाधिपति, महाबलवान, हाथ में खड्ग धारण करने वाले प्रेतों के कंधों पर सवारी करने वाले बलिदेव की भी यथाविधि पूजा करें। कहें कि 'हे! अष्टप्रेतारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित प्रेताधिराज ! आपको हमारा नमस्कार है; हम आपको आवाहन मन्त्रों से पूजा-बलि निवेदित कर रहे है; इसे ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा।' परदिशायां जलेश्वरपूजानिर्देशमाह — आँ पश्चिमायां दिशापते पद्महस्त महाबल। नक्रं चैव समारूढ जलेश्वर यथाविधि ॥ 26 ॥