भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-६० 311 मद्यं मांसं च जृम्भायां पूतनायां रक्तौदनम् । अर्यम्णि चास्थिमांसं चास्थिमांसं पापराक्षसी ॥ 15 ॥ स्कन्दायां च पशुं मद्यं देव्योऽष्टौ सुप्रदक्षिणाः । आसां पदविधिर्नास्ति पूजां गृह्णन्ति केवलम् ॥ 16 ॥ (इसके अनन्तर बाह्यदेवियों में) चरकी की पूजा अस्थि-मांस-सुरा से तथा विदारी और पिलिपिच्छा की पूजा पीले भोजन और पक्वमांस से करें। जृम्भा की पूजा मद्य और मांस, पूतना की पूजा रक्त और खिचड़ी, अर्यमा की पूजा अस्थि व मांस और पापराक्षसी की पूजा भी इसी प्रकार अस्थि-मांस से करें। स्कन्द की पूजा पशु और मद्य से करें। इन आठों ही देवियों की पूजा भली प्रकार से प्रदक्षिणतः करें। इन देवियों का कोई पद विधान नहीं होता (ये वास्तुपद के बाहर होती हैं अतः) ये केवल पूजा ही ग्रहण करती हैं। दिक्पालक्षेत्रपालश्च बलिं – आच्छाद्यन्ते वस्त्रयुग्मैरम्बिका भद्रकुम्भके । दिक्पालेभ्यो बलिं दद्यात्क्षेत्रपेभ्यो विशेषतः ॥ 17 ॥ अम्बिका और भद्रकुम्भ को दो अलग-अलग वस्त्रों से ढँककर दिक्पालों को बलि प्रदान करें। इसी तरह क्षेत्रपालों को भी बलि प्रदान करनी चाहिए। प्राचीं इन्द्रपूजानिर्देशमाह – ॐ पूर्व्वां दिशायते वज्रहस्त महाबल । ऐरावतस्कन्धारूढ इन्द्रदेव यथाविधि ॥ 18 ॥ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह् गृह् स्वाहा। अष्टगजारूढ क्षेत्रपालैः परिवेष्टित सुराधिराज नमोऽस्तुते ॥ 19 ॥ इन क्षेत्रपालों में पूर्व दिशा के अधिपति इन्द्रदेव जो महाबली है और अपने हाथ में वज्र धारण करते है तथा ऐरावत के स्कन्ध पर सवारी करते हैं, की यथाविधि पूजा करनी चाहिए। इन्द्रदेव के आवाहन का मन्त्र है— हे आठ गजारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित सुराधिराज इन्द्रदेव! हम आपको नमस्कार करते हैं और आपका आवाहन करते हैं कि आप हमारी प्रदत्त बलि पूजा को ग्रहण करें, ग्रहण करें — स्वाहा। आग्नेयां अग्निदेवपूजानिर्देशमाह – ॐ आग्नेय्यां दिशापते श्रुवाहस्त महाबल । मेषं चैव समारूढ अग्निदेव यथाविधि ॥ 20 ॥