अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें310 अपराजितपृच्छा नागे चैव क्षीरपानं श्रीखण्डं तु विश्वाधिपे ॥ 8 ॥ भल्लाटे काञ्चनं देयं सोमे दद्याच्च मण्डकान् । गिरौ तु सक्तुतोयं तु चादितौ लपिकां तथा ॥ 9 ॥ मृग की पूजा नीलयव से, पितृ की पूजा गुलमोदक, दौवारिक की पूजा मातुलिङ्ग अथवा बिजौरा, सुग्रीव की पूजा विविध फलों, पुष्पदन्त की पूजा शतपत्र, अब्धिनायक वरुणदेव की पूजा पद्म, असुर की पूजा सुरा और शोष की पूजा तिल के तेल से करनी चाहिए। राजयक्ष्मा की पूजा पक्वमांस से, रोग की पूजा औषध, नाग की पूजा क्षीरपान कराकर तथा विश्वाधिप की पूजा श्रीखण्ड से करें। भल्लाट की पूजा स्वर्णदान से, सोम की पूजा कसार अथवा फुलका या पतली रोटी से, गिरि की पूजा सक्तु के जल से और अदिति की पूजा लपसी से करनी चाहिए। तथा चान्य देवता: — दितौ कम्बलयुग्मं च ह्यापे दद्यात्तु मालती: । तथा गोदध्यापवत्से त्वर्यम्णि रक्तचन्दनम् ॥ 10 ॥ शतपत्रं सवितरि सावित्रे सर्वपुष्पकम् । विवस्वति मोदकानि हीन्द्रे स्यात्पुष्पमालिका ॥ 11 ॥ चम्पकानि त्विन्द्रजये मित्रे स्यात्तु घृतोदनम् । रुद्रे गन्ध: गुग्गुलानां सिद्धान्नं रुद्रदासके ॥ 12 ॥ पृथ्वीधरे रत्नमाला ब्रह्मण्यमृतकुम्भकम् । फलपुष्ययवाक्षतैः पञ्चगव्यैः पुनर्युतम् ॥ 13 ॥ इसी प्रकार दिति की पूजा कम्बल की जोड़ी से, आप की पूजा मालती पुष्पों, आपवत्स की पूजा गाय के दही तथा अर्यमा की पूजा रक्तचन्दन से करें। सविता की पूजा शतपत्र-कमल से, सावित्री की पूजा सभी प्रकार के पुष्पों, विवस्वान की पूजा मोदकों तथा इन्द्र की पूजा पुष्पमालाओं से करनी चाहिए। इन्द्रजय की पूजा चम्पक पुष्पों से, मित्र की पूजा घृतोदन या घी मिश्रित खिचड़ी, रुद्र की पूजा गुग्गुलु की धूप तथा रुद्रदास की पूजा पके हुए अन्न से करें। पृथ्वीधर की पूजा रत्नमाला से, ब्रह्मा की पूजा अमृतकुम्भ, क्षत की पूजा फलपुष्प से तथा पुनर्युत की पूजा पञ्चगव्य से करें। चरक्यादीनामष्टदेव्यां पूजासम्भाराह — चरक्यां चैव दातव्या अस्थिमांससुरास्तथा । पीतौदनं पक्वमांसं विदारीपिलिपिच्छयोः ॥ 14 ॥