अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६० 309 दिक्पालादिवास्तुदेवपूजाबलिकर्मयुक्तिर्नाम षष्ठितमं सूत्रम् ॥ ६० ॥ विश्वकर्मावाच - अत ऊर्ध्वं पुनश्चान्यत् प्रवक्ष्यामि यथाक्रमम् । वास्तुदेहे स्थिता देवाः सम्पूज्या वृद्धये तथा ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि इसके उपरान्त पुनः अन्य विधि क्रम से बताता हूँ जिससे पूजा करने पर वास्तु के देह में स्थित देवताओं की वृद्धि अर्थात् वे प्रसन्न होकर गृही के लिए अभिवृद्धिकारक होते हैं। घृताक्षतानमीशाने पर्जन्ये चोत्पलोदकम् । जये पीताम्बरं चैव वज्रं पिष्टमयं त्वथ ॥ २ ॥ माहेन्द्रे सर्वरत्नानि सूर्ये धूपप्रवितानकम् । गोधूमाः सघृताः सत्ये भृशे मत्स्यांस्तु दापयेत् ॥ ३ ॥ सङ्गुलिं चान्तरिक्षे तु शुचिं दद्याद्धुताशने । धान्यकल्कं तथा पूष्णि वितथे चणकौदनम् ॥ ४ ॥ गृहक्षते गोरोचनं शमीपत्रं यमे तथा । गन्धर्वे शतपत्रं च भृङ्गराजे तु पीठकम् ॥ ५ ॥ (वास्तुपूजा के अन्तर्गत) ईशान देव की पूजा घृत और अक्षतों से, पर्जन्य की पूजा कमल के फूलों से, जय की पूजा पीताम्बर से और वज्र की पिष्टमय अन्न अर्थात् आटे से करें। महेन्द्र की पूजा सभी प्रकार के रत्नों से, सूर्य की पूजा धूपप्रवितान अर्थात् धूप से, सत्य की पूजा घृत युक्त गेहूँ से और भृश की पूजा मछली भेंट कर करें। अन्तरिक्ष की पूजा सङ्गुलि से, हुताशन (अग्नि) की पूजा शुचि की भेंट, पूष्णि की पूजा धान्य के आटे से और वितथ की पूजा भापे गए चने (वरवा) से करें। गृहक्षत देव की पूजा गोरोचन से, यम की पूजा शमीपत्र, गन्धर्व की पूजा शतपत्र और भृङ्गराज की पूजा पीठक से करनी चाहिए। अन्य देवताः - मृगे नीलयवं ख्यातं पितृषु गुलमोदकाः । दौवारिके मातुलिङ्गं सुग्रीवे विविधं फलम् ॥ ६ ॥ शतपत्रं पुष्पदन्ते पद्मं स्यादब्धिनायके । असुरे तु सुरा देया शोषे तैलं तिलस्तथा ॥ ७ ॥ पक्वमांसं राजयक्ष्माभिधे रोगे तथौषधम् ।