अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें308 अपराजितपृच्छा अस्तु, मर्म, उपमर्मों से सदा रक्षा करनी चाहिए क्योंकि ये महादोष और भय के कारक होते हैं।¹ इसी तरह वंश, उपवंश, सन्धि, रेखाषट्क और लाङ्गलों को भी बचाकर न्यास करना चाहिए। वास्तुपुरुषस्य शिरोखातफलमाह - भूपरिग्रहो वास्तुश्च मर्मादि कथितं तव। पित्रोर्घातो भवेच्चैवं कृते शिरसि खातकै ॥ 17 ॥ (हे अपराजित ! इस प्रकार से) मैंने तुम्हें भूमि परिग्रह करते समय के वास्तु के मर्मों के बारे में सब कह दिया है। अब वास्तुपुरुष के अङ्गों पर खात के विविध भयों को कहता हूँ। वास्तुपुरुष के शिर पर खात, खनन करने से पितृ घात होता है। भुजे स्कन्धे बन्धुनाशो हृदये च महाभयम्। धनधान्यसमृद्धिश्च जायते कुक्षिखातके ॥ 18 ॥ और, उसकी भुजाओं पर खनन करने पर बन्धुनाश होता है। उसके हृदय पर खनन करने से महान् भय उपस्थित हो जाता है जबकि कुक्षि पर खनन से धन- धान्य और समृद्धि प्राप्त होती है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वास्तुमर्मोपमर्मनिर्णयोधिकारो नामैकोनषष्टितमं सूत्रम् ॥ 59 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वास्तुमर्मोपमर्म निर्णय अधिकार नामक उनसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 59 ॥
- समराङ्गणसूत्रधार में आया है कि महावंशों के अतिक्रमण से निश्चय ही स्वामी का वध होता है। वंशों के निपीड़न से वर्षा त्रास व ताप का भय जानना चाहिए। उपमर्मों के निपीड़न से रोग व मर्मों के पीड़न ने अचानक कुल की हानि होती है। शिरा के उत्पीड़न से उद्वेग और अनर्थ उत्पन्न होता है। सन्धि व अनुसन्धियों के पीड़न ने कलह होता है, ऐसा जाने। इस प्रकार इन दोष-फलों को जानकर वास्तुपुरुष के शरीर के शिराओं-अनुशिराओं-नाड़ियों, वंशों-अनुवंशों व मर्मों को समझकर उन्हें पीड़ित न कर वास्तु का निवेशन किया जाना चाहिए क्योंकि वेध रहित निर्माण नित्य निरापद होता है- महावंशसमाक्रान्तौ भवेत् स्वामिवधो ध्रुवम्॥ वर्षेण तपनावृत्तिं वंशानां पीडनाद्विदुः। उपमर्माणि रोगाय मर्माणि कुलहानये॥ उद्वेगायार्थनाशाय शिराश्च स्युः प्रपीडिताः। कलिः स्यात् सन्धिविद्धेषु पीडितेष्वनुसन्धिषु॥ तस्मादेतानि सर्वाणि पीडितान्युपलक्षयेत्। ज्ञात्वा सिराः सानुसिराश्च नाडीर्वंशानुवंशांश्च वास्तुदेहे। यत्नेन मर्माणि फलानि चैषां वेधं त्यजेद्वास्तमुपैति नापत्॥ (समराङ्गण.