अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 353, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५९ 307 चारों कर्णों में शूल तथा षड्रेखाओं में वज्र और त्रिशूल लाङ्गल पद्म शिरा, नाड़ी वर्जित होते हैं। उपवंशादीनां मर्मफलमाह - बन्धूच्छेदश्चोपवंशे मर्मणि स्यात्कुलक्षयः । वज्रे च वज्रपाताः स्युस्त्रिशूले च रिपोर्भयम् ॥ 11 ॥ उपवंश के प्रभावित होने पर बन्धुओं में विरोध-विच्छेद तथा मर्मों में कुलक्षय और वज्र में वज्रपात की आशङ्का रहती है और त्रिशूल मर्म हो तो शत्रुओं से भय बना रहता है। पद्मे पतिविनाशश्च लाङ्गलेषु प्रजाक्षयः । कर्णशिरा स्त्रीविनाशः सम्पाते चाग्रजातके ॥ 12 ॥ पद्म से पति का विनाश और लाङ्गल से प्रजा, बाल-बच्चों की क्षय होता है। कर्ण शिरा से स्त्री का विनाश होता है और सम्पात मर्म दोष से अग्रज की मृत्यु होती है। ब्रह्मकर्णेषु महामर्ममाह - चतुर्षु ब्रह्मकर्णेषु महामर्म सुकीर्तितः । धनधान्यविनाशश्च सर्वनाशस्तथैव च ॥ 13 ॥ ब्रह्मा के चारों कर्णों पर महामर्म विख्यात है जिनका वेध होने से धन-धान्य के विनाश के साथ ही सर्वनाश तक हो जाता है। पदव्यास¹षोडशांशो भागो द्वादशकः पुनः । बालाग्रं सन्धिसम्पाते वर्ज्यते मर्मशिल्पिभिः ॥ 14 ॥ पदव्यास के षोडशांश भाग तथा पुनः बारह भाग— ये सब बालाग्र, सन्धि सम्पातों में शिल्पियों ने वर्ज्य माने हैं। अष्टवर्गाः समाख्याताः कर्णपार्श्वश्च कीर्तिताः । ब्रह्मकर्ण च पद्मान्ते² महामर्मचतुष्टयम् ॥ 15 ॥ कर्णों के पार्श्व भाग के अष्टवर्ग नाम से कहे जाते हैं। ब्रह्म कर्ण और पद्म के अन्त में महामर्म चतुष्टय होता है। मर्मोपमर्मणी रक्ष्यै महादोषभयावहे। वंशोपवंशौ सन्धिश्च रेखाषट्कं च लाङ्गलम् ॥ 16 ॥
- 'पादन्यास' स्यात्।
- 'ब्रह्मकर्णे त्रिपद्मान्ते' इति प्रकाशित पाठः ।