भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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306 अपराजितपृच्छा इन्द्र आदित्य तक तीन रेखा, वरुण, पुष्पदन्त तक जाती हुई हों, वे सब वंश के नाम से समाख्यात हैं और उपवंश उत्तर-दक्षिण आयत में होते हैं। सोमभल्लाटतस्तिस्रो गृहक्षतयमान्तगाः । पूर्वापरायता रेखाः पुनर्भिन्नाश्च तिसृभिः ॥ ४ ॥ सोम, भल्लाट, तिस्र, गृहक्षत, यम के अन्त तक जाने वाली, पूर्व से पश्चिम की ओर आयत रेखा पुनः तीनों को भिन्न करती अर्थात् काटती हुई होगी। ईशब्रह्मपितृत्तश्च शिरा रोगाग्निमध्यतः । शिरास्त्वेवं विकर्णस्था ईशाग्निपितृरोगतः ॥ ५ ॥ ईश, ब्रह्म और पितृ तक शिरा; रोग, अग्नि के मध्य तक ये शिराएँ- इस प्रकार विकर्ण ईश, अग्नि, रोग तक जाती हैं। जयगन्धर्वसुग्रीवगिरिभिश्च प्रभेदिताः । सत्यमुख्यायता रेखा वितथाच्यासुरान्तगाः ॥ ६ ॥ और, जय, गन्धर्व, सुग्रीव, गिरि आदि को भेदती जाती है तथा सत्य और मुख्य की ओर की आयत रेखा वितथ और असुर के अन्त तक जाने वाली होती है। एते च सूत्रसम्पाता महामर्माणि कीर्तिताः । सूत्रसम्पाताग्रपङ्क्तिषट्कं लाङ्गलमुच्यते ॥ ७ ॥ ये सभी सूत्र सम्पात महामर्म नाम से जाने जाते हैं तथा सूत्र सम्पात के आगे की छह पङ्क्तियाँ- पङ्क्ति षट्क 'लाङ्गल' कहलाती है। शिरासूत्रपातषट्कं तच्चापि लाङ्गलं स्मृतम् । चतुर्विंशति लाङ्गलानि पदार्थेषु ¹त्रिकर्णगा ? ॥ ८ ॥ शिरा सूत्रपात षट्क को भी लाङ्गल कहा जाता है। इस तरह के चौबीस लाङ्गल पदों के आधे भाग करते हुए विकर्ण की ओर जाते हैं। ब्रह्मणश्च चतुःपार्श्वेष्वष्टसूत्राणि पद्मकम्। पक्षेषु लाङ्गलं द्वन्द्वं षड्रेखाभिर्विधीयते ॥ ९ ॥ ब्रह्मा के चारों ओर आठ सूत्रों के पद्मक होते हैं और दोनों पक्षों में दो-दो लाङ्गल षड् रेखाओं से बनते हैं। चतुःकर्णेषु शूलानि षड्रेखाभिश्च वज्रकम्। त्रिशूललाङ्गलपद्म शिरानाडिविवर्जितम् ॥ १० ॥