अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५९ 305 ब्रह्माकर्ण पर इसी तरह अट्ठाईस क्रमवार इस तरह बनाएँ— ईशान कोण पर आप और आपवत्स संश्रित हों। आग्नेयकोण पर सविता और सावित्री समाश्रित हों। ब्रह्मा की नैर्ऋत्य कोण में इन्द्र और इन्द्रजय स्थित हों। रुद्रश्च रुद्रदासश्च संस्थितौ वायवीदिशि। मरीचिश्च विवस्वांश्च मित्रश्च पृथिवीधरः ॥ ३४ ॥ पूर्वादिक्रमयोगेन संस्थिताश्च चतुर्दिशम्। एवमादिक्रमयोगः सर्वेषां वास्तुमण्डले ॥ ३५ ॥ वायव्य कोण की दिशा में रुद्र और रुद्रदास संस्थित हों। इसी तरह मरीचि, विवस्वान, मित्र और पृथ्वीधर भी पूर्वादिक्रम से योग बनाते हुए चारों दिशाओं में संस्थित हों। इस प्रकार सभी वास्तुमण्डलों में आदि क्रम योग होता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वास्तुपददेवताभिधाननिर्णयाधिकारो नामाष्टपञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ ५८ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वास्तुपद देवता अभिधान निर्णय अधिकार नामक अठावनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥ वास्तुमर्मोपमर्मनिर्णयो नामैकोनषष्टितमं सूत्रम् ॥ ५९ ॥ विश्वकर्मोवाच — चतुःषष्टिपदैः₆₄ क्षेत्रे पुरवास्तु प्रकल्पयेत्। मर्मोपमर्मसन्धींश्च वास्तुदेहसमुद्भवन् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा ने कहा कि चौंसठ पद वाले क्षेत्र में पुर-वास्तु की कल्पना करें तथा उसी में मर्म¹, उपमर्म, सन्धि आदि को वास्तुदेह से समुद्भव होता हुआ देखें। अथ वास्तुमर्मस्थानज्ञानफलयोर्विशेषमाह — पूर्वापरायता वंशा उपवंशाः प्रभेदतः। मर्माणि वंशसम्पाता उपमर्माणि मध्यतः ॥ २ ॥ पूर्व-पश्चिम की ओर आयत में वंश और उपवंशों को उनके भेदों सहित मर्मों, वंश-सम्पातों आदि को उपमर्मों सहित उनके मध्य देखें। इन्द्रादित्यतस्त्रिरेखा वरुणपुष्पदन्तगाः। एते वंशाः समाख्याता उपवंशा याम्योत्तराः ॥ ३ ॥
- यहाँ मर्म विषय पर पुरुषाकारवास्तुरूप की परिकल्पना की गई है।